रुद्रयामल तन्त्र (उत्तर तन्त्र - हिन्दी व्याख्या सहित)
Rudrayamala Tantra (Uttara Tantra) with Hindi Commentary
भगवान भैरव / पं. रामचरण शर्मा द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास · खेमराज श्रीकृष्णदास · 1950 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंहिन्दीटीकासहितम २३ जले निक्षिप्य तं चैव रात्रौ स्तंभो भविष्यति ।। लवणक्षेपणाच्चैव पुनर्वहति वै जलम् ।। ९८ ।। रात्रीको जलमें छोड़े तो जल रुके और लोन छोड़े तो फिर बहे ।।९८।। मंत्रः । ॐनमो भगवते रुद्राय ठः ठः ठः ठः ठः ठः । मगरशिवानौगहा एषां गृह्णाति वै शवम् ।। सर्पस्य च फणं तैले पाचयेन्मध्यमाग्निना ।। ९९ ।। यह मंत्र पढ़ मगर शिव और नौगहा इन जीवोंकी लाश लेकर और साँपकी फणा ले तेलमें मध्यम अग्निसे पचावे ।।९९।। स्वशिरसि नासिकायां कर्णयोरपि लेपयेत् ।। तदा गच्छति जले वै यथा गच्छति सर्पराट् ।। १०० ।। और अपने शिरमें नाशिकामे कानमें लगावे तो सांपके सरीखा जलमें चला जाय ।।१००।। दिक्सहस्रं जपेन्मंत्रमुपोष्य च चतुर्दिनम् ।। शिवपूजां ततो कृत्वा सिद्धं यातं च मंत्रकम् ।। १०१ ॥ मंत्रका दश हजार जप करे, चार दिन व्रत करे और शिवकी पूजा करे तो मंत्र सिद्ध होय ।।१०१।। प्रथमं च वशीकर्णं ततः स्तंभनकारकम् ।। मंत्रा उक्ताश्चौषधीश्च सर्वसिद्धिकरीस्तथा ।। १०२ ।। इति श्रीअवस्थीप्रयागदत्तसुतरामचरणविरचिते रुद्रयामलशाबरतंत्रे प्रथमः पटलः ।। १ ।। इस पटलमें प्रथम वशीकरण फिर स्तंभन फिर मंत्र और फिर औषधी कही है ।।१०२।। इति भाषाटीकायां प्रथमः पटलः ।।१।।