भारतकोश
रुद्रयामल तन्त्र (उत्तर तन्त्र - हिन्दी व्याख्या सहित)

रुद्रयामल तन्त्र (उत्तर तन्त्र - हिन्दी व्याख्या सहित)

Rudrayamala Tantra (Uttara Tantra) with Hindi Commentary

भगवान भैरव / पं. रामचरण शर्मा द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास · खेमराज श्रीकृष्णदास · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished68 पृष्ठ

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२४ रुद्रयामलतन्त्रम् भाषाग्रंथं च दृष्ट्वा हि संस्कृतं कृतवानहम् ॥ नंदरामस्य प्रेरणा चास्माकं प्रचोदयति ॥ १ ॥ भाषाग्रंथ हमने देखा सोही संस्कृत किया, नंदरामका कहना हमको प्रेरित कर रहा है ॥१॥ अथातः संप्रवक्ष्यामि मोहनं च विशेषतः ॥ धत्तूरस्य च पंचांगं चूर्णयेत्सुसमाहितः ॥ २ ॥ महिषीसर्परुधिरे चार्च्यं तं चापि यत्नतः ॥ संध्यायां धूपयेद्देहभवलोकाच्च मोहति ॥ कृष्णवृश्चिकचूर्णं च धूपयेन्मोहनं भवेत् ॥ ३ ॥ अब इसके उपरांत मोहन कहते हैं । धतूरेका पंचांग चूर्ण कर महिषीका रुधिर और सर्पका रुधिर उसमें मिलाकर संध्यामें अपने अंगमें धूप दे तो जो देखे सो मोहित होय ॥२॥३॥ इंदोरंनि चितावारिं समानीय मनःसिलम् ॥ एषां धूपेन च भवेन्मोहनं नात्र संशयः ॥ ४ ॥ इंदोरनि चितावरि और मनःशिल इनका अंगमें धूप दे तो देखेसे मोहन होय इसमें संदेह नहीं है ॥४॥ धत्तूरस्य च बीजानि हरतालं च गृह्य वै ॥ ५ ॥ खादयेच्चैव यं शत्रुं वातरोगी तदा भवेत् ॥ दुग्धशर्करपानेन वातरोगाद्विमुच्यते ॥ ६ ॥ धतूरेके बीज और हरताल जिस शत्रुको खवावे वह वातरोगी होय और दुग्ध शक्कर पिलावे तो वात रोगसे छूटे ॥५॥६॥

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