भारतकोश
रुद्रयामल तन्त्र (उत्तर तन्त्र - हिन्दी व्याख्या सहित)

रुद्रयामल तन्त्र (उत्तर तन्त्र - हिन्दी व्याख्या सहित)

Rudrayamala Tantra (Uttara Tantra) with Hindi Commentary

भगवान भैरव / पं. रामचरण शर्मा द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास · खेमराज श्रीकृष्णदास · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished68 पृष्ठ

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हिन्दीटीकासहितम् २५ छछूंदरं कृष्णसर्पशिरं वृश्चिकटंककम् ॥ सायं प्रधूपयेदंगं मोहनं च भवेत्तदा ॥ ७ ॥ छछूंदर कृष्णसर्पकी फणा और विच्छूका टाकु ले संध्यामें अंगको धूपित करे तो मोहन होय ॥७॥ उच्चाटनम् । मंत्रः । ॐ विस्वाय नाम गंधर्वलोचनी नामी लौसतिकरनै तस्मै विश्वाय स्वाहा । मंत्रेदं च जपेच्चैव जले स्थित्वा सहस्रकम् ॥ दशांशं हवनं कार्यं मारणोच्चाटनं भवेत् ॥ ८ ॥ यह मंत्र उच्चाटनका है, इस मंत्रका प्रथम जलमें खड़े होकर १ हजार जप करे और दशांश हवन करे तो मारण और उच्चाटन होय ॥८॥ चितावरस्य काष्ठं च चतुरंगुलमानकम् ॥ पुनर्वसौ च नक्षत्रे गृह्णीयात्सुसमाहितः ॥ ९ ॥ सप्तवारं च मंत्रेण मंत्रयित्वा विधानतः ॥ भूमौ निखनेच्चैव पलायेत्तु न संशयः ॥ १० ॥ चितावरका चार अंगुल काठ पुनर्वसु नक्षत्रमें ले सात वार मंत्र पढ़कर विधानसे भूमिमें गाडे तो शत्रु भागे ॥९॥१०॥ मंत्रः । ॐ लोहितामुख स्वाहा । स्वात्यूक्षे च गृहीत्वा च वेदांगुलप्रमाणकम् ॥ उम्बरीवृक्षस्य काष्ठं यस्य गृहे च खानयेत् ॥ सोपि सद्यो पलायेच्च नात्र कार्या विचारणा ॥ ११ ॥