रुद्रयामल तन्त्र (उत्तर तन्त्र - हिन्दी व्याख्या सहित)
Rudrayamala Tantra (Uttara Tantra) with Hindi Commentary
भगवान भैरव / पं. रामचरण शर्मा द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास · खेमराज श्रीकृष्णदास · 1950 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंहिन्दीटीकासहितम् १५ रजस्वला स्वरुधिरं गोरोचनसमन्वितम् ।। तिलकं कृत्वा दर्शनात्पुरुषो याति वश्यताम् ।। ६० ।। रजस्वलास्त्री अपने रुधिरमें गोरोचन मिलाकर तिलक कर जिसकी ओर चितवे सो पुरुष वश होय ।।६०।। मंत्रः ।। चामुंडे तरुततु अमुकाय कर्षय आकर्षय स्वाहा मंत्रेदं दिनसप्तं च त्रिगुणं प्रत्यहं तथा ।। ६१ ।। जपेत्सहस्रं पुरुषो स्त्रीनामग्रहणात्तथा ।। मनसा च समाधाय ध्रुवेण याति वै गृहे ।। ६२ ।। यह मंत्र आकर्षणका इक्कीस रोज हजार हजार जपे और दिनदिन पुरुष स्त्रीका नाम लेकर मनमें ध्यान करे तो निश्चय स्त्री वश होय ।।६१।।६२।। रक्तवस्त्रे लिखेद्यंत्रं रक्तचंदनलाक्षया ।। उत्तराभिमुखो भूत्वा पूजयेत्सुसमाहितः ।। ६३ ।। रक्तचंदन वा लाखसे उत्तरमुख होकर रक्तवस्त्रमें यंत्र लिखे और पूजे ।।६३।। निखनेत्तं पृथिव्यां वै दितानि चैकविंशतिम् ।। तस्योपरि च सिंचयेत्तंडुलोदकवारिणा ।। तदायाति मानिनी च वैरिणी चापि दूरतः ।। ६४ ।। और पृथिवीमें गाड़ इक्कीस दिनतक चावलके धोवनके जलसे सींचे तो मानवती वैरिणीभी दूरसे आ जाय ।।६४।। कौहावृक्षस्य वांदां च गृहीत्वाहिरभे विशेषतः ।। ६५ ।। अजामूत्रेण संपिष्ट्वा यस्याः शिरसि निक्षिपेत् ।। पुरुषस्य स्त्रियो चापि वश्यतां याति क्षेपणात् ।। ६६ ।।