भारतकोश
रुद्रयामल तन्त्र (उत्तर तन्त्र - हिन्दी व्याख्या सहित)

रुद्रयामल तन्त्र (उत्तर तन्त्र - हिन्दी व्याख्या सहित)

Rudrayamala Tantra (Uttara Tantra) with Hindi Commentary

भगवान भैरव / पं. रामचरण शर्मा द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास · खेमराज श्रीकृष्णदास · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished68 पृष्ठ

पृष्ठ 42, कुल 68 में से

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४० रुद्रयामलतन्त्रम् हरतालं खरलं कृत्वा लेपयेत्काष्ठपुत्रिकाम् ॥ द्वारेनिवेशयेत्तां च धूपयेद्यांति मक्षिकाः ॥ ७३ ॥ हरताल लेकर खरल कर काष्ठकी पुतली बनवाकर हरताल लगा द्वारपर टांगे और धूप दे तो गृहकी मक्षिका भागे ॥ ७३ ॥ अर्कदुग्धं च माषं च तिलं गुणसमन्वितम् ॥ कारयेद्गुटिकां तां च कोष्ठे चैवाभि धारयेत् ॥ अर्कपत्रविधानेन चौसरा च पलायते ॥ ७४ ॥ अर्कदुग्ध माष तिल गुड़ इनकी वटी बनाके कोठेमें अर्कपत्रके ऊपर घरे तो चौसरा भागे ॥ ७४ ॥ बिडालविड्र्हरतालं मूषकं गृह्ययत्नतः ॥ ७५ ॥ तस्य देहे लिपेच्चैव प्रमुञ्चेच्चमूषकम् ॥ तदासर्वेपलायंते ये गृहेमूषकाःस्थिताः ॥ ७६ ॥ बिडालकी विष्ठा तथा हरताल ले यत्नसे मूसा पकड़े और उस मूसेकी देहमें लगावे और छोड़ दे तौ सब गृहके मूसे भागे ॥ ७५ ॥ ॥ ७६ ॥ मघार्क्षे चैव गृह्णाति मधूकस्थ च बांदकम् ॥ क्षेत्रे चैव निखनेत्तं न खादेत मूषकः ॥ ७७ ॥ मघानक्षत्रमें महुवेका बांदा ले खेतमें गाडे तो मूषकादिक न खाय ॥ ७७ ॥ कुंभीमूलं समादाय खट्वापांचैवबंधयेत् ॥ मत्कुणा नाशमायांतितदासर्वेनसंशयः ॥ ७८ ॥ कुंभीकी जड लेकर खटियामें बाँधे तो सब खटमल कीडे नष्ट हो जाँय ॥ ७८ ॥

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