रुद्रयामल तन्त्र (उत्तर तन्त्र - हिन्दी व्याख्या सहित)
Rudrayamala Tantra (Uttara Tantra) with Hindi Commentary
भगवान भैरव / पं. रामचरण शर्मा द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास · खेमराज श्रीकृष्णदास · 1950 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंहिन्दीटीकासहितम् ४१ राईसमायाः पुष्पं च तूलेनैवचवर्तिकाम् ॥ तैलेप्रज्वालयेद्दीपंदर्शनाद्यांति मत्कुणाः ॥ ७९ ॥ राई समाके फूल और रुईकी बत्ती बनाके राईके तेलमें भिगोय दीपक बारे तो देखकर खटमल भाग जाँय ॥ ७९ ॥ अर्जुनस्य च पुष्पं च फलं लाक्षा च वारिजम् ॥ गुग्गुलुः शुक्लसर्पंखामूलं भल्लातकं तथा ॥ ८० ॥ अर्जुनके पुष्प और फल तथा लाख, कमल, गूगल सफेद सरफोकाकी जड और भिलावा ले ॥ ८० ॥ विडंगं त्रिफला लाक्षा चार्कदुग्धेन धूपयेत् ॥ तदा गेहे न तिष्ठंति मूषका वृश्चिकास्तथा ॥ ८१ ॥ वायविडंग त्रिफला लाख और अर्कदूधका धूप दे तो गृहमें मूसे विच्छू न रहें ॥ ८१ ॥ मुस्तासर्षपभल्लातकेवाक्षस्य च पुष्पकम् ॥ गुडार्को चैव निर्यासो धूपयेच्चैव मंदिरे ॥ ८२ ॥ मुस्ता सर्षप भिलावा केवाचके फूल गुड अकउड और रार इनकी धूप गृहमें देवे तो सब मसे विषकीट भाग जांय ॥ ८२ ॥ तदा सर्वे पलायंते मूषका विषकीटकाः ॥ अमिल्ताशं च पर्य्यंके बंधयेद्यांति मृत्कुणाः ॥ ८३ ॥ अमिलतासको पलंगमें लगावे तो खटमल भाग जाँय ॥ ८३ ॥ लाक्षानिर्यासमाषं च सर्षपां चैव रंडकम् ॥ भल्लातकं विडंगं च ह्यर्कबीजंच पुष्करम् ॥ ८४ ॥