रुद्रयामल तन्त्र (उत्तर तन्त्र - हिन्दी व्याख्या सहित)
Rudrayamala Tantra (Uttara Tantra) with Hindi Commentary
भगवान भैरव / पं. रामचरण शर्मा द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास · खेमराज श्रीकृष्णदास · 1950 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें४२ रुद्रयामलतन्त्रम् कौहापुष्पं समं सर्वं धूपयेच्च गृहे तथा ॥ भूता कीटाश्चडाकिन्योपलायन्तेनसंशयः ॥ ८५ ॥ लाख रार उर्द सरसों रंड भिलावा विडंग अर्कबीज कमल और अर्जु- नके फूल सब लेकर गृहमें धूप देय तो भूत प्रेत डाकिनी भाग जाँय इसमें संशय नहीं ॥ ८४ ॥ ।।८५ ॥ बबूलपत्रधूपेन पिशुकीटो पलायते ॥ ८६ ॥ बबूल के पत्रीकी धूप देवे तो पिशुवा भागे ॥ ८६ ॥ अंकोलबीजं चूर्णयित्वासप्ताहेनपुटंन्यसेत् ॥ ८७ ॥ तैले तस्य च यत्नेन कांस्यपात्रे समान्यसेत् ॥ प्रचंडधर्मस्पर्शाच्च तैलं निस्सरति यत्नतः ॥ ८८ ॥ अंकोलके बीज चूर्ण कर सात दिन तेलमें पुट दे यत्नसे कांसेके पात्रमें धर तेज घाममें रखे और तेल चुवावे ।। ८७ ।। ८८ ।। मुंडयेन्मनुजं चैव तस्य मुंडे च लेपयेत् ॥ यदा केशाः प्ररोहंति तदातैलंप्रसिद्धयति ॥ ८९ ॥ एक आदमीका मूंड मुडाके उस मूंडमें तेल लगावे जो केश तुरंत जमें और बढ जाँय तो जाने तेल सिद्ध भया ॥ ८९ ॥ आम्रशाखां तदा गृह्य निखनेच्च तदा भुवि ॥ तैलेन स्पर्शायेच्छाखां फलं पुष्पं च दृश्यते ॥ ९० ॥ आम्रकी डार ले भूमिमें गाडे और ऊपरसे तेल लगावे तो उसमें फल फूल जरूर करके देख पडें ॥ ९० ॥ प्रक्षिप्य तैले बीजं च कमलस्यचमर्दयेत् ॥ तत्तैलं च जले क्षिप्त्वा जलेपुष्पंचदृश्यते ॥ ९१ ॥