भारतकोश
रुद्रयामल तन्त्र (उत्तर तन्त्र - हिन्दी व्याख्या सहित)

रुद्रयामल तन्त्र (उत्तर तन्त्र - हिन्दी व्याख्या सहित)

Rudrayamala Tantra (Uttara Tantra) with Hindi Commentary

भगवान भैरव / पं. रामचरण शर्मा द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास · खेमराज श्रीकृष्णदास · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished68 पृष्ठ

पृष्ठ 54, कुल 68 में से

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५२ रुद्रयामलतन्त्रम् गोदुग्धमें रक्त सरसों तिल डार पीस शनके बीज तिसमें छोडकर लेपन करे तो जहाँ स्थिर होय तहाँही वस्तुज्ञान होय, यह अन्यथा नहीं ॥ ३५ ॥ ॥ ३६ ॥ अदृष्टकरणम् चतुर्लक्षं जपेन्मंत्रं नग्नो भूत्वा स्मशानके ॥ प्रातःकाले यक्षिणी च वस्त्रैकं च ददाति तम् ॥ ३७ ॥ नग्न होकर स्मशानमें चार लक्ष मंत्र जपे तो प्रातः-समय यक्षिणी एक वस्त्र देय सो ॥ ३७ ॥ वस्त्रमाच्छाद्य गच्छंतं तं न पश्यंति केचन ॥ गृहे तिष्ठन्सदा द्रव्यं स पश्यति न संशयः ॥ ३८ ॥ वस्त्र ओढकर जहाँ जाय तहाँ कोई न देखे, वह गृहमें बैठे सबको देखे और सब द्रव्य देखे इसमें संदेह न करना ॥ ३८ ॥ मंत्रः । ॐ ह्रीं ह्रीं स्मशानवासिनी स्वाहा । कार्तिकस्य कृष्णपक्षे चतुर्दश्यां विशेषतः ॥ स्मशानेषु जपेन्मंत्रं बलिं पूजां तथाकरोत् ॥ ३९ ॥ इस मंत्रको कार्तिककृष्णपक्षकी चतुर्दशीको स्मशानमें जपे, बलिदान पूजन करे ॥ ३९ ॥ अंकोलतैले प्रज्वाल्य दीपं कज्जलमाचरेत् ॥ कपाले स्थाप्य तं चापि नेत्रयोर्यदि ह्यंजयेत् ॥ केपि न पश्यंति तं च महादेवप्रसादतः ॥ ४० ॥ अंकोलके तेलमें दीप बारे, कज्जल करे और कपालमें धर नेत्रोंमें लगावे त े उसको महादेवके प्रसादसे कोई न देखे ॥ ४० ॥

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