रुद्रयामल तन्त्र (उत्तर तन्त्र - हिन्दी व्याख्या सहित)
Rudrayamala Tantra (Uttara Tantra) with Hindi Commentary
भगवान भैरव / पं. रामचरण शर्मा द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास · खेमराज श्रीकृष्णदास · 1950 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें५४ रुद्रयामलतन्त्रम् कंदुर्य्यामलयोर्मूलं पिष्ट्वा चांकोलतैलके ॥ पादलेपेन गच्छंति मनुजाः शतयोजनम् ॥ ४५ ॥ कंदुरी और आंवलेकी जड ले अंकोलके तेलमें पीसकर तलुवोंमें लगावे तो सौ योजन चले ॥ ४५ ॥ मंत्रः । ॐ नमः चंडिकायै गगनं गमय गमय चालय वेंगवाहिनी ॐ ह्रीं स्वाहा । कृष्णकाकस्य हृन्नेत्रे जिह्वां चैव मनःसि- लम् ॥ सिंदूरं गैरिकं चैवामरवल्लीं च मालतीम् ॥ ४६ ॥ रुद्रजटां मस्तकीं च मूलमेकत्र कारयेत् ॥ पादयोलेपयेच्चैव सहस्रं स च गच्छति ॥ ४७ ॥ काले काकका हृदय अर्थात् करेजा नेत्र और जिह्वा तथा मनशिल सिंदूर गैरिक अमरवेलि मालती रुद्रजटामस्तकीकी जड़ ये सब एकत्र कर पांवके तलुवोंमें लेप करके एक सहस्र वार मंत्र जप करे तो सिद्धि होय ॥ ४६ ॥ ॥ ४७ ॥ मंत्रः । ॐ नमो भगवते रुद्राय नमो हरि- तगदाधराय त्रासय त्रासय क्षोभय क्षोभय चलने बलने स्वाहा । पारदं च त्रयं टंकं चिल्हनीडे निधापयेत् ॥ यस्मिन्नीडे भवे- डंडास्तस्मिन् समवधारयेत् ॥ ४८ ॥ दीर्घ-