रुद्रयामल तन्त्र (उत्तर तन्त्र - हिन्दी व्याख्या सहित)
Rudrayamala Tantra (Uttara Tantra) with Hindi Commentary
भगवान भैरव / पं. रामचरण शर्मा द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास · खेमराज श्रीकृष्णदास · 1950 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें६२ रुद्रयामलतन्त्रम् शस्य पूजनात् ॥ १६ ॥ अथ पूजनविधिं च होमस्य च विधिं तथा धूपं दीपं च नैवेद्यं दधिघृततिलं तथा ॥ १७ ॥ हवन- स्याष्टगुणं च मंत्रं पठेच्च स्वाहया ॥ तदन- तरं जपं च कुर्याच्चैव विंशति ॥ १८ ॥ यह मंत्र ११०८ बार जपे सब कार्यसिद्धि होय, द्यूतमें जय होय, राजा वश होय, राजाओंमें मान्य होय, संग्राममें जय होय, पृथ्वी वश होय, मन वश होय, लक्ष्मी वश होय, दास्यभाव दूर होय, बुद्धिप्राप्ति होय और चित्त शुद्ध होय यह सब गणेशके पूजनसे तथा मंत्र के जपनेसे होय ॥ १४ ॥ ॥ १५ ॥ १६ ॥ १७ ॥ १८ ॥ मंत्रः । जिभ्या आग अमृत वशै सो काम दृष्टि आगू हनुमत वसै सभा मोहु श्रीरामचंद्रं . मंत्रेणानेन विधिना मोहितं च जगत्त्रयम् ॥ तस्मात्सर्वप्रयत्नेन जपेन्मंत्रं समाहितम् ॥ १९ :। इति श्रीअवस्थीप्रयागदत्तसुतरामचरणविरचिते रुद्रयामले चतुर्थः पटलः ॥ ४ ॥ इन मंत्रोंको सावधान होकर जपे तो तीनों लोक वश होंय ॥ १९ ॥ इति हिन्दीटीकायां चतुर्थः पटलः ॥ ४ ॥