सचित्र ज्योतिष शिक्षा (प्रारम्भिक ज्ञान खण्ड) भाग १
Sachitra Jyotisha Shiksha (Prarambhika Gyan Khand) Vol 1
बाबूलाल ठाकुर द्वारा
स्रोत: Motilal Banarsidass Edition · Motilal Banarsidass, Delhi (उद्गम)
पृष्ठ 102, कुल 288 में से
संदर्भ में पढ़ें८४ : सचित्र ज्योतिष शिक्षा, प्रारम्भिक ज्ञान खण्ड
देखना चाहिये। जब मूल की शान्ति करने का समय हो जावे तब शान्ति कराकर मुख देखने का विधान है। इसका विचार फलित और मूहूर्त खण्ड में विशेष प्रकार से मिलेगा।
भद्रा
विशिष्ट करण को भद्रा कहते हैं यह शुभ कार्य में वर्जित है। विष, घात, तान्त्रिक कार्य में भद्रा में कार्य करने का विचार होता है। युद्ध, राजदर्शन, दैव बुलाना, जल तरना, शत्रु उच्चाटन, स्त्री सेवन, यज्ञ कार्य में इसका विचार करना पड़ता है।
इन तिथियों में भद्रा होती है—
| पक्ष | शुक्ल पक्ष | कृष्णपक्ष |
|---|---|---|
| तिथि | ८, १५ | ४, ८ |
| पूर्वाह्न | पराह्न |
तिथि के आधे भाग में ही भद्रा होती है। इसका मोटा प्रमाण ३० घटी का होता है। भद्रा के आरम्भ और अन्त समय [ घटी पल ] पंचाङ्ग में दिया रहता है।
अंग में भद्रा का वास इस प्रकार समझा जाता है।
| अंग | मुख | कंठ | छाती | नाभि | कटि | पुच्छ |
|---|---|---|---|---|---|---|
| घटी | ५ | १ | ११ | ४ | ६ | ३ |
| फल | कार्यनाश | सरण | धननाश | बुद्धिनाश | कलह | विजय |
वृश्चिकी भद्रा=शुल्क पक्ष की भद्रा=कोई रात्रि की भद्रा को ही वृश्चिकी कहते हैं।
सर्पिणी " =कृष्ण " = ' दिन " " सर्पिणी "
आवश्यक कार्य में सर्प का मुख और वृश्चिक की पूँछ का एक भाग त्याग कर कार्य कर सकते हैं।
चन्द्र की राशि के अनुसार भद्रा का वास
| चन्द्रराशि | लोक | फल | विशेष |
|---|---|---|---|
| १, २, ३, ८, | स्वर्ग | शुभ | धन धान्य मिले |
| ६, ७, ९, १० | पाताल | शुभ | धन प्राप्ति |
| ४, ५, ११, १२, | मृत्यु | अशुभ | कार्य सिद्ध नहीं हो। |