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सचित्र ज्योतिष शिक्षा (प्रारम्भिक ज्ञान खण्ड) भाग १

सचित्र ज्योतिष शिक्षा (प्रारम्भिक ज्ञान खण्ड) भाग १

Sachitra Jyotisha Shiksha (Prarambhika Gyan Khand) Vol 1

बाबूलाल ठाकुर द्वारा

स्रोत: Motilal Banarsidass Edition · Motilal Banarsidass, Delhi (उद्गम)

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८४ : सचित्र ज्योतिष शिक्षा, प्रारम्भिक ज्ञान खण्ड

देखना चाहिये। जब मूल की शान्ति करने का समय हो जावे तब शान्ति कराकर मुख देखने का विधान है। इसका विचार फलित और मूहूर्त खण्ड में विशेष प्रकार से मिलेगा।

भद्रा

विशिष्ट करण को भद्रा कहते हैं यह शुभ कार्य में वर्जित है। विष, घात, तान्त्रिक कार्य में भद्रा में कार्य करने का विचार होता है। युद्ध, राजदर्शन, दैव बुलाना, जल तरना, शत्रु उच्चाटन, स्त्री सेवन, यज्ञ कार्य में इसका विचार करना पड़ता है।

इन तिथियों में भद्रा होती है—

पक्षशुक्ल पक्षकृष्णपक्ष
तिथि८, १५४, ८
पूर्वाह्नपराह्न

तिथि के आधे भाग में ही भद्रा होती है। इसका मोटा प्रमाण ३० घटी का होता है। भद्रा के आरम्भ और अन्त समय [ घटी पल ] पंचाङ्ग में दिया रहता है।

अंग में भद्रा का वास इस प्रकार समझा जाता है।

अंगमुखकंठछातीनाभिकटिपुच्छ
घटी११
फलकार्यनाशसरणधननाशबुद्धिनाशकलहविजय

वृश्चिकी भद्रा=शुल्क पक्ष की भद्रा=कोई रात्रि की भद्रा को ही वृश्चिकी कहते हैं।

सर्पिणी " =कृष्ण " = ' दिन " " सर्पिणी "

आवश्यक कार्य में सर्प का मुख और वृश्चिक की पूँछ का एक भाग त्याग कर कार्य कर सकते हैं।

चन्द्र की राशि के अनुसार भद्रा का वास

चन्द्रराशिलोकफलविशेष
१, २, ३, ८,स्वर्गशुभधन धान्य मिले
६, ७, ९, १०पातालशुभधन प्राप्ति
४, ५, ११, १२,मृत्युअशुभकार्य सिद्ध नहीं हो।
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