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सचित्र ज्योतिष शिक्षा (प्रारम्भिक ज्ञान खण्ड) भाग १

सचित्र ज्योतिष शिक्षा (प्रारम्भिक ज्ञान खण्ड) भाग १

Sachitra Jyotisha Shiksha (Prarambhika Gyan Khand) Vol 1

बाबूलाल ठाकुर द्वारा

स्रोत: Motilal Banarsidass Edition · Motilal Banarsidass, Delhi (उद्गम)

DevanagariHindipublished288 पृष्ठ

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९६ : सचित्र ज्योतिष शिक्षा, प्रारम्भिक ज्ञान खण्ड

जितने घड़ी पल होते हैं यही दिनमान में दिया रहता है। ६० घटी से दिनमान घटाने से राशि मान होता है।

(८) चन्द्र—आगे चन्द्र की स्थिति दी रहती है। प्रत्येक राशि में चन्द्र कब आता है और कब तक रहता है यह दिया रहता है। पञ्चांग में चौथ शनिवार को वृ. २९-२५ ( चन्द्र ) दिया है। इसका अर्थ यह है कि वृषराशि पर चन्द्र २९ घं. २५ पं. के उपरान्त आवेगा। यहाँ जो घड़ी पल राशि के आगे दिया रहता है उससे समझना कि उस राशि पर उतने घड़ी पल के उपरान्त चन्द्र आयगा। रविवार को वृष पर दिन और रात्रि भर चन्द्र रहा, इसलिए पञ्चांग में केवल वृष दिया है। या कोई राशि का नाम भी नहीं देते, इससे समझना अभी ऊपर बताई राशि पर ही चन्द्र है। सोमवार को मि० १९-२० लिखा है अर्थात् सोमवार को १९-२० तक वृष का ही चन्द्र रहेगा, उसके उपरान्त उसी समय से मिथुन राशि पर चन्द्र आवेगा। इसमें राशि के नाम संकेताक्षर से कभी-कभी दिये रहते हैं जिनसे ही राशि का नाम जान लेना। पहिले का और आगे का संकेताक्षर पढ़ लेने से बीच का संकेताक्षर समझ में आ जाता है।

(९) सूर्यस्पष्ट—इसके उपरान्त मिथकालीन या प्रातः कालीन स्पष्ट सूर्य दिया रहता है। उस दिन प्रातः काल या मिश्र काल पर सूर्य की स्थिति दी रहती है, अर्थात् सूर्य उस समय ठीक किस स्थान पर ( किस राशि, अंश, कला, विकला पर ) है दिया रहता है। इसके आगे सूर्य की प्रतिदिन की गति दी रहती है। प्रतिदिन ६० घड़ी में कितने कला विकला चलता है यह गति दी रहती है। जैसे सूर्य ६-१२-१-५-२८ दिया है तो ६ राशि, १२ अंश, १८ कला, २८ विकला पर सूर्य उस समय है ऐसा समझना। गति ६०-७ दी है तो सूर्य की दिन रात्रि को गति ६० कला ७ विकला समझना। ग्रहों की गति प्रायः कला विकला में दी रहती है।

किसी पञ्चांग में मिश्र मान दिया रहता है और प्रातः काल का सूर्य न देकर मिश्र कालीन सूर्य दिया रहता है।

मिश्रकाल—यह पञ्चांग में दिए हुए ग्रहों का इष्ट काल है जो प्रायः अर्द्ध रात्रि समय का दिया रहता है।

अर्द्ध रात्रि का इष्ट जानना = (३० + दिनमान २) या (६० - रात्रिमान २) मान लो दिनमान ३४-४ है तो दिनार्द्ध = १७.८ हुआ + ३० = ४७ घड़ी २ पल या (६० - ३४-४ दिनमान) = २५-५६ रात्रिमान = रात्रि अर्द्ध १२-५८. ६० - (१२-५८ रात्रि अर्द्ध) = ४७ घड़ी २ पल।

इसीलिए रात्रि अर्द्ध का इष्ट = ४७-२ हुआ, यही साधारण प्रकार से मिश्रमान हुआ। पञ्चांग में उस दिन का ठीक मिश्रमान गणित से निकाल कर दिया रहता है। किसी पञ्चांग में प्रतिदिन का मिश्रमान नहीं दिया रहता।

अर्द्ध रात्रि के लक्षण (मिश्रकाल) में जो सूर्य की ठीक स्थिति होगी वह मिश्र कालीन सूर्य स्पष्ट किसी-किसी पञ्चांग में दिया रहता है। प्रातः काल या मिश्रकाल