सचित्र ज्योतिष शिक्षा (प्रारम्भिक ज्ञान खण्ड) भाग १
Sachitra Jyotisha Shiksha (Prarambhika Gyan Khand) Vol 1
बाबूलाल ठाकुर द्वारा
स्रोत: Motilal Banarsidass Edition · Motilal Banarsidass, Delhi (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंकुण्डली विचार : १०५
यह स्थूल रीति है। सूक्ष्म रीति से नाक्षत्र काल अंग्रेजी पंचांग में दिया रहता है। किसी पुराने अंग्रेजी पंचांग में जिस तारीख महीने का नाक्षत्र काल चाहिए उसी तारीख और महीने में जो नाक्षत्र काल मिले उससे काम चल जायगा, क्योंकि नाक्षत्र काल में अधिक अन्तर नहीं पड़ता, प्रायः मिलता-बुलता समय रहता है।
अध्याय २०
कुण्डली विचार
आकाश में जो राशियाँ और ग्रहों की स्थिति है उसका ही नक्शा कुंडली है। अर्थात् कुंडली आकाश का नक्शा है और उससे प्राप्त होता है कि कौन ग्रह उस समय कहाँ ये।
केवल कुंडली चक्र देखने से ही समय, तिथि, पक्ष, मास, वर्ष आदि जन्म समय का या इष्ट समय का (जिस समय की वह कुंडली बनी हो,) जाना जा सकता है। इसी कारण जन्म की तिथि आदि एवम् स्थान भी निश्चित कर उसके अनुसार ठीक गणित करके शुद्ध कुण्डली चक्र बनाया जाता है। इस कुंडली चक्र पर से जीवन की घटनाएँ और जीवन सम्बन्ध से विविध ज्ञान प्राप्त किया जा सकता है। इस कारण कुंडली क्या है और कैसे बनती है, अच्छी तरह समझ लेना चाहिए।
जैसे पृथ्वी का नक्शा बनाने में उत्तर सदैव ऊपर की ओर रहता है वैसे कुंडली में नहीं होता। आकाश के नक्शे (कुंडली) में पूर्व दिशा ऊपर को रखते हैं, क्योंकि पूर्व दिशा बहुत महत्व की है। यही लग्न का स्थान है जो कुंडली में मुख्य बस्तु है।
जब पूर्व दिशा ऊपर रहती है तो पश्चिम दिशा नीचे की ओर रहेगी। सूर्य जहाँ उदय होता है वह पूर्व और जहाँ अस्त होता है वह पश्चिम दिशा होती है।
आकाश के नक्शे में ठीक १२ विभाग किये गये हैं। इस प्रकार पूरे ३६०° के चक्र के १२ विभाग करने से प्रत्येक विभाग ३० का होता है। इस प्रकार पूर्व दिशा (लग्न) से आरम्भ होकर जो स्थान सिर पर आता है वह दशम स्थान या दशम भाव कहलाता है, जैसे चित्र संख्या ६३ में बताया है। दशम स्थान को दक्षिण दिशा समझो। पाताल अर्थात् पैर के नीचे का स्थान चतुर्थ स्थान कहलाता है उसे उत्तर दिशा समझो।
साधारण प्रकार से पूर्व दिशा ऊपर को रखो तो चित्र संख्या ६४ के अनुसार बनता है। इस चित्र में दिशाओं के विभाग करने से जिस प्रकार दिखाएँ होती हैं वह