सचित्र ज्योतिष शिक्षा (प्रारम्भिक ज्ञान खण्ड) भाग १
Sachitra Jyotisha Shiksha (Prarambhika Gyan Khand) Vol 1
बाबूलाल ठाकुर द्वारा
स्रोत: Motilal Banarsidass Edition · Motilal Banarsidass, Delhi (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें११८ : सचित्र व्योतिष शिक्षा, प्रारंभिक ज्ञान खण्ड
कहाँ पर है और वह नक्षत्र किस राशि का है। किसी एक नक्षत्र पर से राशि जान कर देखो वह किस भाव में है, जिस भाव में वह राशि हो लिख कर क्रम पूर्वक भेष राशियाँ भर दो तो लग्न स्थान में जो राशि आवे वही लग्न होगी। यदि सब नक्षत्रों की अच्छी तरह पहचान हो गई हो तो कौन नक्षत्र उदय हो रहा है, कौन उदय हो चुका है उन नक्षत्रों की राशि पर से उनके ठीक-ठीक स्थान का अनुमान कर उपर्युक्त रीति से कुंडली बना कर जान लो।
परन्तु स्मरण रहे कि यह सब स्थूल मान से है। जैसे कोई पुखे कि इस समय क्या वजा होगा तो सूर्य की ओर देखकर अनुमान किया जा सकता है कि इस समय ३ बजा होगा। यदि उस समय घड़ी देखते हैं तो विधित होता है कि ३ बज कर ३० मिनट ४० सेकेण्ड हुआ है या ३ बजने को १४ मिनट बाकी हैं। इसी प्रकार उपर्युक्त रीति भी स्थूल है। इससे कुछ सूक्ष्म और शुद्ध लग्न पञ्चाङ्ग में दिये हुए दैनिक लग्न पत्र से जानी जा सकती है।
दैनिक लग्न होरा सारिणी
यह प्रत्येक पञ्चाङ्ग में नहीं दिया रहता, परन्तु काशी, जवलपुर आदि कई स्थानों के पञ्चाङ्ग में अवश्य दिया रहता है। यद्यपि इसके विषय में पहिले बता चुके हैं परन्तु यहाँ और भी उदाहरण देकर समझाते हैं। उदाहरण के लिए जवलपुर का लोक विजय पञ्चाङ्ग सम्बत् २००० का लेते हैं।
पञ्चाङ्ग के तिथिपत्र के नीचे उस पक्ष भर की तिथियाँ और बार ऊपर लिखा है। बाईं ओर खड़ी पंक्ति में लग्न के नाम दिये हैं और आगे वह लग्न कब तक रहेगी उसका घंटा मिनट दिया है।
जन्म समय ठीक क्या वजा है देखो, यदि लड़ाई के समय का नया समय* (१ घंटा बढ़ा हुआ) है तो १ घंटा घटाकर पुराना समय बनालो और लग्नपत्र में उस तिथि और बार के नीचे अपना इष्ट समय खोजो। इष्ट समय सारिणी में दिये हुए जिस समय के भीतर मिले उसके बाईं ओर जो लग्न लिखी हो वही लग्न उस समय होगी।
मान लो किसी का जन्म वैशाख शुक्ल ३ शुक्रवार के रात्रि के ९-४० बजे का है। लग्न पत्र के नीचे शुक्ल पक्ष की ३ तिथि शुक्रवार के नीचे ७-७ तक तुला और ९-२४ तक वृश्चिक लग्न है। अपना समय बढ़ा हुआ समय होने से एक घंटा घटा कर लिया तो (९-४०)-(१०)=८-४० यह पुराना समय हुआ। ९-२४ के भीतर यह ८-४० है। इस कारण उस समय वृश्चिक लग्न हुई। यही जन्म लग्न हुई। वृश्चिक लग्न को लग्न स्थान में रखकर कुण्डली बना लो।
*लड़ाई के समय तारीख १-९-१९४२ ई० से ता० १५-१०-१९४५ तक गर्वनेमेंट की आज़ा से भारतवर्ष में घड़ियाँ १ घंटा आगे बढ़ा दी गई थीं। जिसके कारण उस समय १ घंटा बढ़ा हुआ समय प्रचलित था।