सचित्र ज्योतिष शिक्षा (प्रारम्भिक ज्ञान खण्ड) भाग १
Sachitra Jyotisha Shiksha (Prarambhika Gyan Khand) Vol 1
बाबूलाल ठाकुर द्वारा
स्रोत: Motilal Banarsidass Edition · Motilal Banarsidass, Delhi (उद्गम)
पृष्ठ 139, कुल 288 में से
संदर्भ में पढ़ेंअध्याय २२ : १२१
है। गणित द्वारा इससे भी सूक्ष्म रूप से मुद्रा लग्न कला विकला तक निकाली जा सकती है। प्रत्येक स्थान के अनुसार लग्न प्रमाण में कुछ अन्तर पड़ जाता है, परन्तु काम चलाने की यह सारिणी बहुत उपयोगी है, इससे लग्न तो अवश्य ठीक निकल आती है। आरम्भ में इसका उपयोग जान लेने से नया विद्यार्थी काम चला सकता है। अपने स्थान की लग्नसारिणी बनाना और लग्न निकालने का पूरा गणित, गणित खण्ड में मिलेगा।
जिस दिन की लग्न निकालनी हो उस दिन के सूर्य की राशि और अंश पञ्चांग से देख लो। जैसे वैशाख शुक्ल ३ सम्बत् २००० शुक्रवार को पंचांग में प्रातः रवि स्पष्ट ० २२-१५-१ दिया है। अर्थात् मीनराशि गत होकर मेघराशि के २२°-१५-'१" पर प्रातः काल सूर्य था।
अब लग्नसारिणी देखो। वार्ड और खड़ी पंक्ति में राशि दी है और ऊपर आड़ी पंक्ति में अंश दिये हैं। अपनी सूर्य की राशि ० रा २२° है ( मेघ के २२ अंश ) यहाँ कला विकला छोड़ दिया। अब खड़ी पंक्ति में देखो जहाँ मेघ वृष आदि राशियाँ लिखी हैं वहाँ ० मेघ, वृष १, मिथुन २ इत्यादि दिया है अर्थात् दिये हुए अंक की राशि गत हो गई और अक्षरों में बताई राशि वर्तमान है। जैसे मेघ ० दिया है इसका अर्थ यह है कि ० ( मीन ) राशि तो गत राशि है और मेघराशि वर्तमान राशि है। सूर्य मेघ ० का है इससे मेघ ० के सीध में दाहिनी ओर, और सूर्य मेघ के २२° पर है, इससे २२° के नीचे देखा ( ऊपर की पंक्ति में २२° खोजो )। २२° के नीचे मेघ की सीध मे ५-५६-० लिखा हुआ मिला। इसमें अपना इष्ट काल जोड़ो। मान लो अपना इष्ट काल ८-४० बजे रात का है। उस, दिन सूर्योदय ५-३१ पर था तो ८-४० में १२ घंटा जोड़ के सूर्योदय घटाया और उसके घड़ी पल बनाये तो इष्ट ३७-५२-३० हुआ। इसमें ऊपर का प्राप्त सारिणी अंक ५-५६-० जोड़ो तो ४३-४८-३० घड़ी हुई। अब
| चं० मि० | च० प० |
|---|---|
| ८-४० | १५ घण्टा = ३७-३० |
| + १२ - ० | ९ मिनट = ०-२२-३० |
| जन्म=२०-४० | = इष्ट = ३७-५२-३० |
| सूर्योदय ५-३१ | + सारिणी अंक ५-५६-० |
| मेघ=१५-१९ | = ४३-४८-३० |
सारिणी के भीतर खोजो इस अंक के समीप का अंक कहाँ है, सारिणी में इसके समीप का ४३-५२-० मिला। अपना इष्ट युक्त सारिणी अंक ४३-४८-३० है। इनके समीप का यही ४३-५२-० मिलता है। इसके आगे / ४४-१०-२० अंक है वह बहुत अधिक है, इस कारण ४३-५२-० को ही लिया। अब इस अंक के वार्ड और देखा दृषिचक राशि है और ऊपर अंश देखा तो २२° मिला। इससे प्रगट हुआ कि दृषिचक लग्न २२° भुक्त हुए हैं। या लग्न ७ रा० २२° है।