सचित्र ज्योतिष शिक्षा (प्रारम्भिक ज्ञान खण्ड) भाग १
Sachitra Jyotisha Shiksha (Prarambhika Gyan Khand) Vol 1
बाबूलाल ठाकुर द्वारा
स्रोत: Motilal Banarsidass Edition · Motilal Banarsidass, Delhi (उद्गम)
पृष्ठ 142, कुल 288 में से
संदर्भ में पढ़ें१२४ : सचित्र ज्योतिष शिक्षा, प्रारम्भिक ज्ञान खण्ड
राशि पर ही लिखना पड़ेगा। इस प्रकार सब ग्रह लिख देने पर अपनी लग्नकुंडली तैयार हो गई।
लग्न कुंडली
चन्द्र कुंडली
अब चन्द्रकुंडली तैयार करना है। चन्द्र मिथुनराशि का है। इस कारण चन्द्र की राशि मिथुन, लग्न स्थान में लिखो और शेष राशियाँ क्रमानुसार भर कर, लग्नकुंडली के अनुसार ही ग्रह भर दो तो चन्द्रकुंडली बन जायगी। अर्थात् लग्न ८ की जगह चन्द्र की राशि ३ लिख कर शेष सब राशियाँ ग्रह सहित लग्नकुंडली के अनुसार ही लिख देना पड़ता है। चन्द्र कुंडली में केवल राशियों के स्थान में परिवर्तन हुआ है और कोई अंतर नहीं पड़ता जैसा ऊपर बताया है।
चन्द्रकुंडली को राशिकुंडली भी कहते हैं। मनुष्य के शरीर से जैसा लग्न का सम्बन्ध है उसी प्रकार चन्द्र का भी सम्बन्ध है। विशेष कर चन्द्रग्रह मन का चोतक है। जन्म के चन्द्र से गर्भाधान काल का लग्न से विशेष सम्बन्ध रहता है। इस कारण लग्नकुंडली के साथ-साथ चन्द्रकुंडली भी स्थापित की जाती है।
ऊपर जो कुंडली बनाने की रीति समझाई गई है यह कुंडली, जन्म (जन्म पत्र बनाना), वर्ष (वर्ष फल बनाना), प्रश्न (किसी प्रश्न के निर्णय करने के समय) इत्यादि के सम्बन्ध से जहाँ जैसी आवश्यकता हो बनाई जाती है और उस पर से फल कथन किया जाता है। इस कारण यह कुंडली बहुत महत्व की होती है, यह जितनी शुद्धता पूर्वक बनाई जा सके उतना ही शुद्ध फल होगा।
अध्याय २३
राशियाँ और कालाङ्क
कालाङ्क (काल पुरुष का अंग)
प्रत्येक राशियाँ का प्रभाव अंग के विशेष भाग में पड़ता है। काल पुरुष के किस अंग के विभाग में कौन राशि विशेष प्रभाव डालती है यह जानना चाहिये। कालपुरुष