भारतकोश
सचित्र ज्योतिष शिक्षा (प्रारम्भिक ज्ञान खण्ड) भाग १

सचित्र ज्योतिष शिक्षा (प्रारम्भिक ज्ञान खण्ड) भाग १

Sachitra Jyotisha Shiksha (Prarambhika Gyan Khand) Vol 1

बाबूलाल ठाकुर द्वारा

स्रोत: Motilal Banarsidass Edition · Motilal Banarsidass, Delhi (उद्गम)

DevanagariHindipublished288 पृष्ठ

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राशियाँ और कालांग : १२७

राशि के सम्बन्ध से विचार करने में उस राशि पर कोई पाप या शुभ ग्रह प्रभाव करता है तो उस राशि के सम्बन्ध से वैसा अच्छा या बुरा फल होता है, जैसे वृष राशि पर कोई पाप ग्रह हो, पाप ग्रह होने से कंठ-विकार उत्पन्न करेगा क्योंकि वृषराशि कंठ आदि पर प्रभाव डालती है। पाप ग्रह उन राशियों के सम्बन्धी अंग में अपनी दशा में अपने पदार्थ द्रव्य आदि से रोग उत्पन्न करते हैं। ग्रहों के पदार्थ द्रव्य आदि आगे दिये हैं।

मान लो मिथुन राशि पर जन्मसमय चन्द्र या सूर्य है, उस पर शनि या मंगल की दृष्टि हो या वहाँ पर ये ग्रह हों तो छाती फेफड़ा सम्बन्धी रोग बमा आदि उत्पन्न करेंगे। कर्क का प्रभाव दोनों छाती पेट पाचन-इन्द्रिय पर भी होता है और स्त्रियों के शरीर में दुग्ध उत्पन्न करने के स्थान पर भी प्रभाव करता है। कर्क स्त्री राशि है, तो यह स्त्रियों के उस अंग सम्बन्ध से सब प्रकार की नैसर्गिक दुर्बलता उत्पन्न करता है। वहाँ कोई पाप ग्रह होने से रोग उत्पन्न कर देता है। सिंह का प्रभाव पेट में आहार-विहार पर भी होता है, पाप ग्रह के प्रभाव से पेट में रोग उत्पन्न करेगा। इस राशि वाले को गरम पदार्थ चाय शराब आदि त्यागना चाहिए और आहार-विहार नियमित रखना चाहिए। इसी प्रकार कन्या राशि के सम्बन्ध से संग्रहणी अंब, बड़कोष्ठ और पेट मूला उत्पन्न होता है। तुला मूत्राशय का विकार मधु मेह सब प्रकार के प्रमेह आदि उत्पन्न करती है। इस राशि से त्वचा सम्बन्धी रोग भी उत्पन्न होते हैं। वृश्चिक के सम्बन्ध से साथी का रोग इसे जल्दी लगता है। बुरे ग्रह का प्रभाव इस पर होने से गुणोद्भिन्न सम्बन्धी रोग होते हैं। धन में पाप ग्रह का प्रभाव होने से जाँघों में खून के विकार होते हैं। मकर राशि पर बुरा प्रभाव होने से सर्दी का विकार रक्ताभिषरण सम्बन्धी दोष संधि बात, बड़कोष्ठ का त्वचा रोग उत्पन्न होते हैं। कुम्भ में पाप ग्रह हो तो घुटना पैर मज्जा तंतु आदि पर प्रभाव डालता है। यह नेत्र विकार और रक्त दोष भी उत्पन्न करता है। मीन राशि पर पाप ग्रह का प्रभाव हो तो आंत के रोग, संधिवात ठंड के विकार, पेट या दबे भी उत्पन्न होते हैं।

ऊपर जो एक राशि के या भाव के अंग बतलाये हैं उसमें १ से १५° तक दाहिना भाग अंग का समझना और उपरान्त ३०° तक बायां भाग समझना। जब इन अंगों में दाहिने या बायें से किसी भाग पर ग्रह प्रभाव डालेगा, यह जानना है तो उस राशि के अंशों के २ भाग कर दो, आधा भाग पूर्वदिर्घ को दाहिना और उत्तरार्द्ध को बायं भाग समझना।