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सचित्र ज्योतिष शिक्षा (प्रारम्भिक ज्ञान खण्ड) भाग १

सचित्र ज्योतिष शिक्षा (प्रारम्भिक ज्ञान खण्ड) भाग १

Sachitra Jyotisha Shiksha (Prarambhika Gyan Khand) Vol 1

बाबूलाल ठाकुर द्वारा

स्रोत: Motilal Banarsidass Edition · Motilal Banarsidass, Delhi (उद्गम)

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१४० : सचित्र ज्योतिष शिक्षा, प्रारम्भिक ज्ञान खण्ड

  • मैत्री सम्बन्ध सूचक चक्र

जहाँ परस्पर मैत्री में कोई अन्तर नहीं है

ग्रहका मित्र शत्रु सम

१ रवि का चं. मं. गु. . श. शु. रा. -

२चंद्रका रवि राहु लट

३ मंगल का र. गु. राहु शुक्र

४ बुध का शु. रा. न —

४५ गुरुका र. मं. — ण. रा.

६ णुक्रकाबु.श- रा. रवि मं

७3 शनि का शु. रा: रवि गुरु

८ राहु का बु. शु. श. चं. मं. र. गुरु

नैसर्गिक मैत्री की उत्पत्ति

ग्रहों की नैसगिक मैत्री मूल त्रिकोण के सम्बन्ध से स्थापित हुई है । मूल त्रिकोण

मुल त्रिकोण चक्र

जहाँ मैत्री में भिन्नता है ।

ग्रहका मित्र शत्रु सम

१रविका -- वुध

२चंद्रका वुध -- मं.गु.शु.श.

३ मंगल का चंद्र बुध शनि

४बुध का र. चं. ` चन्द्रम. गु. श.

शगुरुका चन्द्र बु.शु. --

६ शुक्रका -- ! चन्द्र गुरु

७शनिका वुध चं.मं. --

८राहुका 7 = `>

के स्थान से २-१२,५-९,४-८ स्थान पर

और उच्च के स्थान पर उस ग्रहका

अच्छा प्रभाव पड़ता है, इस कारण उस

स्थान के स्वामी से मित्रता होती है और

शेष स्थान पर विरुद्ध प्रभाव पड़ता है ।

इस कारण शेष स्थान के स्वामी से शत्रुता

होती है । यदि एक प्रकार से मित्र भाव

और दूसरे प्रकार से शत्रुभाव आवे तो

उसे सम समझना । जहाँ दोनों प्रकार से मित्र-भाव आवे वहाँ मित्र समझना नीचे चक्र में यही समझाया गया है।

रवि, चन्द्र मित्र १ वार-मित्र, शेप ग्रह

चिल्ल ‡= २ वार मित्र = मित्र `

%५=१वार, =,

० = मित्र शन्रु=सम

Ee पल

[ मित्र ‡- मित्र-मित्र मित्र + शत्रुच्सम