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सचित्र ज्योतिष शिक्षा (प्रारम्भिक ज्ञान खण्ड) भाग १

सचित्र ज्योतिष शिक्षा (प्रारम्भिक ज्ञान खण्ड) भाग १

Sachitra Jyotisha Shiksha (Prarambhika Gyan Khand) Vol 1

बाबूलाल ठाकुर द्वारा

स्रोत: Motilal Banarsidass Edition · Motilal Banarsidass, Delhi (उद्गम)

DevanagariHindipublished288 पृष्ठ

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१५० : संचित्र ज्योतिष शिक्षा. प्रारम्भिक ज्ञान खण्ड

कालात्मक दृष्टि=६०' = १° पूर्ण, ४५' = ३/४, ३०' = ३/४, १५' = ३/४ दृष्टि ।

इन चारों प्रकार की दृष्टि में केवल पूर्ण दृष्टि का ही विचार होता है, क्योंकि उसका फल पूर्ण रूप से अनुभव में आता है । शेष दृष्टि उपयोगी नहीं हैं, क्योंकि उनका फल निश्चित नहीं होता । प्रहों का दृष्टिवल निकालने में चारों प्रकार की दृष्टि का काम पड़ता है ।

दीप्तांश Orbs of the planets

जब ब्रह्मा ग्रह ( देखने-वाला ) और दृश्यग्रह ( जिसपर दृष्टि पड़ रही हो ) इन दोनों में थोड़ा ही अंश का अन्तर हो या अंश साम्य हो तो उनकी दृष्टि होना समझी जायगी । जैसे वृष के २ अंश पर कोई ग्रह हो और दूसरा ग्रह उससे सातवें घर में वृश्चिक राशि के २° पर हो, अर्थात् दोनों में पू०=६०° का अन्तर हो तो कहेंगे कि वह ग्रह पूर्ण दृष्टि से देखता है । परन्तु दूसरा ग्रह वृश्चिक के २८° पर हो तो पूर्ण दृष्टि है ऐसा कहना ठीक नहीं, क्योंकि दोनों में २०६° का अन्तर पड़ जाता है । वृष राशि के किसी भी अंश पर ब्रह्मा ग्रह हो और दृश्य ग्रह सप्तम स्थान में जहाँ वृश्चिक राशि है उसके कितने ही अंश पर हो तो भी पूर्ण दृष्टि से देखता है ऐसा कहना ठीक नहीं है । किसी भाव या ग्रह पर दृष्टि करने वाला ग्रह उसी अंश साम्य पर देखना चाहिए तब पूर्ण दृष्टि समझी जायेगी चाहे वह ब्रह्मा ग्रह भाव के बीच में क्यों न हो । आगे पीछे दृष्टि हुई तो निष्फल होती है ।

इस कारण दोनों ब्रह्मा और दृश्य ग्रह की दृष्टि किसी विशेष अंश के भीतर होना चाहिए जिससे वह दृष्टि प्रभावशाली होती है । प्रत्येक ग्रह की दृष्टि का कुछ विशेषअन्तर नियुक्त है जिसके भीतर दृष्टि रहने से वह दृष्टि प्रभावशाली समझी जाती है और इस अन्तर का विचार अंशों में होता है । इन अंशों के अन्तर को दीप्तांश कहते हैं । अर्थात् दो या अधिक ग्रह जो एक दूसरे पर दृष्टि योग करते हैं तब वे ग्रह, दृष्टि योग करने के पूर्व किसी विशेष अंशों के भीतर एक दूसरे पर प्रभाव डालने में समर्थ होते हैं उस अन्तर को दीप्तांश कहते हैं । दीप्तांश चक्र—

ग्रहसूर्यचंद्रमंगलबुधशुक्रशुक्रशनि
दीप्तांश१५१२

ब्रह्मा ग्रह की दृष्टि इन दीप्तांशों के भीतर ही दृश्य ग्रह पर उसके आगे पीछे हो तो कहेंगे कि दृष्टि दीप्तांश के भीतर है । ऐसी दृष्टि का विशेष फल होता है । यदि इन दीप्तांशों के अधिक आगे या पीछे दृश्य ग्रह हो तो फल मध्यम होगा । इसका उदाहरण देकर समझाते हैं ।