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सचित्र ज्योतिष शिक्षा (प्रारम्भिक ज्ञान खण्ड) भाग १

सचित्र ज्योतिष शिक्षा (प्रारम्भिक ज्ञान खण्ड) भाग १

Sachitra Jyotisha Shiksha (Prarambhika Gyan Khand) Vol 1

बाबूलाल ठाकुर द्वारा

स्रोत: Motilal Banarsidass Edition · Motilal Banarsidass, Delhi (उद्गम)

DevanagariHindipublished288 पृष्ठ

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१७० : सचित्र ज्योतिष शिक्षा, प्रारम्भिक ज्ञान खण्ड

दुःख सुख का विचार होता है। शरीर की दुर्बलता, पुष्टता, शरीर का रंग, शील, आकृति, शरीर के लहसन, मत्ता, तिल आदि चिह्न, आरोग्य, शरीर लक्षण आदि का विचार होता है। इसका मुख्य प्रभाव मस्तक पर है।

२ द्वितीय भाव—इसे घन स्थान कहते हैं। इससे जातक ( जिसका जन्म हुआ है और जिसके सम्बन्ध में विचारना है ) की सम्पत्तिक स्थिति का बोध होता है। इस भाव से कोष ( खजाना ), सोना, रत्न आदि की प्राप्ति, मित्र, वस्त्र, कुटुम्ब व स्त्री पुत्र का सुख और पूर्व अर्जित घन, अब्ध कार्य, विहृत्ता, लेखन, पट्टुच, वाणी, नेत्र और खाद्य पदार्थ आदि का विचार होता है। इसका प्रभाव कण्ठ, नेत्र और मुख पर होता है।

३ तृतीय स्थान—इसे सहज ( साथ में उत्पन्न हुए ) स्थान या प्रातःस्थान व पराक्रम-स्थान भी कहते हैं। इससे आई बहिन, भाइयों का सुख, पास के सम्बन्धियों का सुख या थोड़ी यात्रा रेल, बैल गाड़ी आदि की, पराक्रम ( साहस ), सेवक, चाचा, मामा, दासी, हाथ कान सम्बन्धी रोग, कान के गहने आदि का विचार होता है। इसका मुख्य प्रभाव हाथ, बाहू, कन्धा और कान पर होता है।

४ चतुर्थ स्थान—इसे सुदृढ़, पाताल और सुख स्थान भी कहते हैं। इस भाव से सुख-दुःख का, माता का, स्थावर सम्पत्ति का, आयुष्य के दिन का, क्षेत्र, गृह ( घर ) भूमि, वगीचा, तालाब, चौपाया, मित्र, सुख, वन्धु, उद्यम, ससुर, नानी और छाती का विचार होता है। इसका प्रभाव छाती और पेट पर होता है।

५ पंचम स्थान—इसे सुत भाव कहते हैं। इससे संतति, गर्भ, विद्या, शील-स्वभाव, मन्त्र, उपासना, सट्टा, लाटरी या इसी प्रकार के व्यवहार में यश, अपयश, आनन्द और बुद्धि का विचार होता है। इसका प्रभाव हृदय और पीठ व कुक्षि पर होता है।

६ षष्ठ भाव—इसको रिपु स्थान भी कहते हैं। इससे शत्रु, मामा, मौसी, होने वाला रोग, सेवक, अपने अधीन कार्य करने वाले, ऊंट, घोड़े, भैंस आदि पशु चोर भय, संग्राम, क्रूर कर्म, वधन भय, सौतेली माँ, अपयश, हात्ति, रोग, चिन्ता और शङ्का आदि का विचार होता है। इसका प्रभाव कमर, अंत, नाभि और पेट पर होता है।

७ सप्तम भाव—इसे अस्त या कलत्र या जाया-स्थान कहते हैं। इससे स्त्री, स्त्री-सुख, विवाह, व्यापार, गमन, अश्लीली झगड़े, साक्षीदार, प्रगट शत्रु या प्रतिद्वन्दी, संग्राम, विवाद, वाणिज्य, प्रवास या स्थानान्तर, जारकर्म, कलह आदि का विचार होता है। स्त्री का पति या पतिसुख का भी विचार इसी से होता है। इसका प्रभाव वस्ति, मूषपिंड और कमर पर भी होता है।