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सचित्र ज्योतिष शिक्षा (प्रारम्भिक ज्ञान खण्ड) भाग १

सचित्र ज्योतिष शिक्षा (प्रारम्भिक ज्ञान खण्ड) भाग १

Sachitra Jyotisha Shiksha (Prarambhika Gyan Khand) Vol 1

बाबूलाल ठाकुर द्वारा

स्रोत: Motilal Banarsidass Edition · Motilal Banarsidass, Delhi (उद्गम)

DevanagariHindipublished288 पृष्ठ

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भाव परिचय : १६९

जब कोई ग्रह एक दूसरे से चतुर्थ या सप्तम में हो तो एक दूसरे से केन्द्र में होते हैं, क्योंकि जो एक के चतुर्थ है वह दूसरे से दशम में पड़ता है और जो एक दूसरे से सप्तम में है वह दूसरे से भी सप्तम होता है। लग्नकुण्डली में १, ४, ७, १० स्थान में रहने वाले ग्रह केन्द्र में कहलाते हैं, परन्तु एक ग्रह से दूसरे ग्रह के स्थान का अन्तर भी ४, ७, १० स्थान की दूरी पर होने से पहिले ग्रह के केन्द्र में दूसरा ग्रह है ऐसा कहेंगे।

यहाँ शनि जो तृतीयेश और चतुर्थेश होकर लाभ स्थान में है, इससे तीसरे स्थान में लगनी (लग्न का १) गुड बैठता है जो धनेश और पंचमेश है। इन दोनों ग्रहों का (५) तृतीय एकादश योग है, क्योंकि शनि से गुड तीसरा और गुडसे शनि ग्यारहवाँ है। यह सम्पत्तिदाता योग हुआ।

षष्ठेश मंगल तृतीय भाव में है। मंगल से षष्ठ स्थान में सूर्य अष्टम भाव में बैठता है यह सूर्य दशमेश है। यहाँ षष्ठ और दशम भाव स्वामी और मंगल और सूर्य का (७) षड्पटक योग हुआ जो कष्टदायक है।

गुरु लग्न में वृश्चिक के १०° पर है और चन्द्र सप्तम भाव में वृष के १०° पर है तो गुरु और चन्द्र का (१०) षड्मान्तर योग या प्रतियोग हुआ।

मंगल भकर के २२° पर है और शुक्र भी भकर के २५° पर है तो मंगल और शुक्र की (९) युति हुई। यदि शुक्र भी भकर के २२° पर होता तो पूर्ण युति होती। परन्तु दोनों के अंशों में केवल ३° का अन्तर है अर्थात् दीप्तांश के भीतर है तो यह भी युति कहलायगी।

इस कुण्डली में लाभ भाव में बुध के स्थान में शनि बैठता है और चतुर्थ में शनि के स्थान में (कुंभ राशि में) बुध बैठता है यह (८) अत्योन्म आश्रय योग हुआ। इसे परिवर्तन योग भी कहते हैं। इसी प्रकार और भी ग्रहों का योग विचारना।

अध्याय ३३

भाव विचार

जब कोई ग्रह किसी भाव में जाता है तो उस भाव के सम्बन्ध से ग्रह के फल का विचार होता है, इस कारण इन भावों से क्या-क्या विचार किया जाता है यहाँ बतलाते हैं।

१ प्रथम भाव—इसे लग्न, सूर्य, उदय या पूर्व भी कहते हैं। इस स्थान का नाम सनु है। इस स्थान से स्वभाव, प्रकृति, मन, स्वरूप, आगुण्य और इतर शारीरिक