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सचित्र ज्योतिष शिक्षा (प्रारम्भिक ज्ञान खण्ड) भाग १

सचित्र ज्योतिष शिक्षा (प्रारम्भिक ज्ञान खण्ड) भाग १

Sachitra Jyotisha Shiksha (Prarambhika Gyan Khand) Vol 1

बाबूलाल ठाकुर द्वारा

स्रोत: Motilal Banarsidass Edition · Motilal Banarsidass, Delhi (उद्गम)

DevanagariHindipublished288 पृष्ठ

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१६८ : सचित्र ज्योतिष शिक्षा, प्रारम्भिक ज्ञान खण्ड

८ अन्योन्य आश्रय योग—दो भाव के स्वामी जब एक दूसरे के भाव में हों तब यह योग होता है, जैसे लगनेश लाभ स्थान में हो और लाभेश लग्न में हो तो यहाँ लगनेश और लाभेश का अन्योन्य आश्रय योग हुआ। इसे परिवर्तन योग भी कहते हैं।

९ युति—जब दो भावेश एक ही राशि के एकही अंश पर हों तो उसे युति कहते हैं।

१० षड्भांतर या प्रति योग—जब एक भावेश एक दूसरे से ६ राशि के अंतर पर हो अर्थात् एक दूसरे के सम्मुख हो तब यह योग होता है।

इन योगों का वर्णन दृष्टि विचार में भी हो चुका है, परन्तु भाव से सम्बन्ध होने के कारण यहाँ दिया है। यहाँ केवल मुख्य-मुख्य योग ही दिये हैं, क्योंकि योग अनेक हैं।

योग—ग्रहों का ऐसी परिस्थिति में आ जाना जिससे वह दूसरे ग्रह, भाव या राशि से किसी प्रकार सम्बन्धित होकर ऐसी परिस्थिति उत्पन्न कर देवे जिससे कोई विशेष फल उत्पन्न होने की सम्भावना हो। ऐसे अनेक योगों का वर्णन फलित ज्योतिष में दिया है।

यहाँ इन्ही योगों को उदाहरण देकर समझाते हैं :—

इस कुण्डली में षष्ठ भाव का स्वामी मंगल और अष्टमेस बुध है, ये त्रिक भाव के स्वामी हैं। मंगल सहज भाव में है और मंगल से दूसरा स्थान चतुर्थ भाव है जिसमें बुध है। यहाँ मंगल और बुध का (६) द्विर्दिक्ष्य योग हुआ। क्योंकि मंगल से बुध दूसरा और बुध से मंगल बारहवाँ है। यह योग द्रविष्टा सूचक है। इस पर भी त्रिक भाव के स्वामियों का इस प्रकार योग होना अनिष्ट कारक है।

यहाँ चन्द्र सप्तम भाव में है, मंगल से यह गिनने पर पंचम स्थान होता है, इस कारण मंगल से नवम पंचम (३) त्रिकोण योग हुआ। यह योग अच्छा है, परन्तु यह त्रिकोण के स्वामियों का योग नहीं हुआ।

शनि लाभ स्थान में है वह चतुर्थ्या (केन्द्र का स्वामी) है, इससे पंचम स्थान में शुक्र तृतीय भाव में है तो शनि और शुक्र का नवम पंचम होने से (३) त्रिकोण योग हुआ। यहाँ शुक्र सप्तमेस (केन्द्र स्वामी) है, इस कारण यहाँ केन्द्र के अधिपतियों का (शनि और शुक्र का) त्रिकोण योग हुआ। यह योग अच्छा है।

लाभ भाव का स्वामी बुध (चतुर्थ) केन्द्र में है। धर्म का भाव स्वामी चंद्र भी केन्द्र (सप्तम) में है। यहाँ दोनों भावेश केन्द्र में हैं और एक दूसरे के केन्द्र में भी हैं तो यह (४) केन्द्र योग हुआ। यह अच्छा योग है।