सचित्र ज्योतिष शिक्षा (प्रारम्भिक ज्ञान खण्ड) भाग १
Sachitra Jyotisha Shiksha (Prarambhika Gyan Khand) Vol 1
बाबूलाल ठाकुर द्वारा
स्रोत: Motilal Banarsidass Edition · Motilal Banarsidass, Delhi (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंभाव परिचय : १६७
इसी प्रकार लगन से या किसी भाव विशेष से दूसरे भाव या ग्रह कितने स्थानान्तर पर हैं विचार कर भाव संज्ञा ऊपर बताए अनुसार निश्चित करना ।
भाव स्वामी Lord of the house
जिस भाव में जो राशि है उस राशि का जो स्वामी होगा वही ग्रह भावस्वामी कहलाता है । भाव स्वामी को भावेश्वर, भुवन पति, भावेश या भाव अधिपति भी कहते हैं ।
भाव स्वामी का भाव सम्बन्ध से भी पृथक्-पृथक् नाम होता है, जैसे:—लगन का स्वामी-लगनेश, द्वितीय भाव का स्वामी-द्वितीयेश या धनेश, ११वाँ लाभ स्थान है उसका स्वामी लाभेश इत्यादि ।
भाव स्वामी के विशेष योग Special aspects of the Lords of the houses ( अध्याय २८ का दृष्टि योग भी देखो )
१ भावेश योग—जब दो या अधिक भावेश ( भाव स्वामी ) का योग होता है तो भावेश योग कहते हैं ।
जब कोई त्रिकोण ( त्रिक ६-८-१२ भाव के स्वामी ) जब-जब दूसरे भावों से योग करते हैं तो अनिष्ट फल देते हैं ।
केन्द्रेश ( केन्द्र भाव का स्वामी ) व त्रिकोणेश ( त्रिकोण भाव का स्वामी ) का योग शुभ फल देता है । ये स्थान के अनुसार फल देते हैं । ( त्रिक ) ६, ८, १२ भाव में भावेश निर्बल होता है ।
२ भावेश दृष्टि योग—जब दो या अधिक भावेश एक दूसरे पर पूर्ण दृष्टि सं देखते हैं तो भावेश पर दृष्टि योग करते हैं । त्रिक भाव का स्वामी, जिस भावेश पर दृष्टि करता है उस भावेश के फल को निर्बल कर देता है ।
३ त्रिकोण योग—जब दो भावेश एक दूसरे के त्रिकोण ( नवम पंचम स्थान ) में हों तो उसे त्रिकोण योग कहते हैं । ये योग लक्ष्मी, राज वैभव, विभूति, कीर्ति देने वाला होता है । केन्द्रेश और त्रिकोणेश का त्रिकोण योग श्रेष्ठ होता है ।
४ केन्द्र योग—दो भावेश परस्पर केन्द्र में हों तो केन्द्र योग होता है। यह योग महत्व सूचक है । एक ग्रह के केन्द्र स्थान से दूसरा ग्रह भी केन्द्र में हो तब यह योग होता है ।
५ लाभ योग—दो भावेश एक दूसरे पर तृतीय एकादश योग करते हों तो उसे लाभ योग कहते हैं । यह बहुत सम्पत्ति देने वाला होता है । एक ग्रह जहाँ हो उससे दूसरा ग्रह ग्यारहवें स्थान में हो तो दूसरे ग्रह से पहिला ग्रह तीसरे स्थान में पड़ता है । इस प्रकार जब एक ग्रह से गिनने पर दूसरा ग्रह ग्यारहवें स्थान में हो तब यह योग होता है ।
६ द्विद्विधा योग—जब दो भावेश एक दूसरे से दूसरे या बारहवें स्थान में हों तो यह योग होता है । यह योग दरिद्रता सूचक है ।
७ षड्पत्क योग—दो भावेश एक दूसरे से छठे या आठवें स्थान में हो तो यह योग होता है । यह दुःख और कष्ट देता है ।