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सचित्र ज्योतिष शिक्षा (प्रारम्भिक ज्ञान खण्ड) भाग १

सचित्र ज्योतिष शिक्षा (प्रारम्भिक ज्ञान खण्ड) भाग १

Sachitra Jyotisha Shiksha (Prarambhika Gyan Khand) Vol 1

बाबूलाल ठाकुर द्वारा

स्रोत: Motilal Banarsidass Edition · Motilal Banarsidass, Delhi (उद्गम)

DevanagariHindipublished288 पृष्ठ

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अध्याय १

ज्योतिष शास्त्र के भेद

ज्योतिष शास्त्र का अध्ययन करने से पूर्व यह जान लेना आवश्यक है कि ज्योतिष शास्त्र के कितने भेद हैं। इसके मुख्य दो भेद हैं—

( १ ) गणित ज्योतिष Astra-Nomy ( एस्ट्रा नमी ) = जिससे पंचाङ्ग आदि बनाये जाते हैं।

( २ ) फलित ज्योतिष Astra-logy ( एस्ट्रा लजी ) = जिससे ग्रहों के फल का विचार होता है।

इनके भी कई भेद हो गये हैं जो नीचे समझाये जाते हैं:—

१ गणित ज्योतिष—इससे ग्रहों का स्वरूप अवस्था गति आदि का निश्चय किया जाता है। इसके तीन भेद हैं—

( १ ) सिद्धान्त—जिसमें कल्प ( सूक्ति के आदि ) से ग्रह आदि स्पष्ट करने के लिए गणित करने की रीति दी है।

( २ ) तन्त्र—जिसमें युग ( वर्तमान कलियुग ) से गणित करने की रीति दी है।

( ३ ) करण—जिसमें इष्ट शाका से गणित करने की रीति दी है।

गणित ज्योतिष के अन्तर्गत वह गणित भी है जिसमें जोडना, घटाना, गुणा, भाग वर्गमूल आदि निकालना तथा भूमि, आकाश आदि के नापने की विधि बतलाई गई है। इसी गणित द्वारा ग्रहों की स्थिति आदि निकाली जाती है।

२ फलित ज्योतिष ( नजूम )—ग्रहों की स्थिति पर से शुभाशुभ फलों का विचार इससे होता है। इसके भेद इस प्रकार हैं—

( १ ) होरा अर्थात् जातक—आधान कुंडली से दुःख सुख का विचार।

( २ ) ग्रहूत—कार्य आरम्भ करने में ग्रह, तिथि, नक्षत्र, वार आदि के प्रमाण से शुभाशुभ फल का विचार।

( ३ ) ताजिक—वर्ष प्रवेश, मास प्रवेश, दिन प्रवेश आदि बनाकर वर्ष भर के शुभाशुभ फल का विचार।

( ४ ) प्रश्न ज्योतिष—किसी भी समय इष्टकाल पर से किसी भी प्रश्न का तत्सम्बन्धी दुःख सुख आदि के परिणाम का विचार।

( ५ ) मेदनीय किंवा राष्ट्र ज्योतिष—किसी देश या राष्ट्र की उन्नति-अवन्ति दुःख सुख आदि का विचार।

( ६ ) संहिता खण्ड—किसी सम्बत का शुभाशुभ, भूकम्प, इन्द्र धनुष, केतु उदय आदि का फल, शुभाशुभ शकुन, शरीर बिल्ह द्वारा मरण होने का ज्ञान, स्वरोदय, पल्लीपतन, सामुद्रिक, अङ्ग स्फुरण आदि का विचार।