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सचित्र ज्योतिष शिक्षा (प्रारम्भिक ज्ञान खण्ड) भाग १

सचित्र ज्योतिष शिक्षा (प्रारम्भिक ज्ञान खण्ड) भाग १

Sachitra Jyotisha Shiksha (Prarambhika Gyan Khand) Vol 1

बाबूलाल ठाकुर द्वारा

स्रोत: Motilal Banarsidass Edition · Motilal Banarsidass, Delhi (उद्गम)

DevanagariHindipublished288 पृष्ठ

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अध्याय २

ज्योतिष शास्त्र में विश्वास

इस ग्रन्थ में फलित ज्योतिष का अध्ययन करने के लिए ही प्रारम्भिक बातें बताई गई हैं। फलित ज्योतिष में कई मनुष्य विश्वास करते हैं कई नहीं करते और कहते हैं कि यह इतने दूर होते हुए पृथ्वी पर किस प्रकार प्रभाव पहुँचा सकते हैं। इस कारण प्रारम्भ में ही संक्षेप में ग्रहों के प्रभाव के विषय में थोड़ा बता देना अनावश्यक न होगा।

यह निर्विवाद सिद्ध है कि सूर्य के आस-पास पृथ्वी आदि कई ग्रह परिक्रमा करते हैं और समस्त ग्रह आदि एवं सूर्य अन्ततः विश्व के अन्तरिक्ष में निराधार लटके हुए निरन्तर नियमित रूप से गतिशील रहते हैं। सूर्य के आस पास चन्द्र सहित पृथ्वी एवं बुध, शुक्र, मंगल, गुरु, शनि आदि ग्रह घूम रहे हैं। इन सबों के समुदाय को सौर जगत् या सूर्य का परिवार कहते हैं।

ये सब ग्रह सूर्य की आकर्षण शक्ति के वशीभूत होकर विशेष नियम के अनुसार सूर्य के आस पास घूम रहे हैं। इनमें प्रत्येक ग्रहों की भी पृथक-पृथक आकर्षण शक्ति है जिसे पृथ्वी का उपग्रह चन्द्रमा, पृथ्वी की आकर्षण शक्ति के प्रभाव से खिंचा हुआ पृथ्वी के आस पास घूम रहा है और सूर्य की आकर्षण शक्ति से खिंचे हुए चन्द्र और पृथ्वी सूर्य की परिक्रमा कर रहे हैं। इसी प्रकार शनि आदि ग्रहों के भी उपग्रह हैं जो उन ग्रहों के आकर्षण के प्रभाव से इन ग्रहों की परिक्रमा करते हुए सूर्य के आकर्षण से प्रभावित होकर सूर्य की भी परिक्रमा कर रहे हैं।

पृथ्वी से १.३६ लाख मील दूर होते हुए भी जब समस्त पृथ्वी पर सूर्य की आकर्षण शक्ति का प्रभाव पड़ता है तो पृथ्वी में रहने वाले जड़ एवं चैतन्य पशु-पक्षी, मनुष्य आदि भी सूर्य के प्रभाव से प्रभावित होने से कैसे बच सकते हैं।

प्रत्यक्ष देखने में आता है कि जब सूर्य विशेष राशियों में आता है तो किस प्रकार जाड़ा, गर्मी, बरसात आदि ऋतुओं में परिवर्तन होता है जिसका प्राणी मात्र पर प्रभाव पड़ता है। सूर्य के ही कारण प्रकाश, उष्णता, ग्रह गति होती है। सूर्य न हो तो प्राणी मात्र का जीना असम्भव हो जाय। आज कल सूर्य की किरणों से चिकित्सा भी होने लगी है।

प्रातः काल सूर्य की किरणें तिरछी पड़ती हैं। मध्याह्न में सीधी पड़ती है और रात्रि में किरणों का अभाव रहता है। इस प्रकार जैसे समय में जिस बालक का जन्म हो उस समय का प्रभाव उसके स्वभाव में परिणत हो जाता है। अर्थात् समय के अनुसार ही स्वभाव पड़ जाता है। भीष्म में ( वृष और मिथुन के सूर्य में ) सूर्य की किरणें सीधी पड़ती हैं। हेमन्त ऋतु में ( वृश्चिक-धनु के सूर्य में ) तिरछी पड़ती