सचित्र ज्योतिष शिक्षा (प्रारम्भिक ज्ञान खण्ड) भाग १
Sachitra Jyotisha Shiksha (Prarambhika Gyan Khand) Vol 1
बाबूलाल ठाकुर द्वारा
स्रोत: Motilal Banarsidass Edition · Motilal Banarsidass, Delhi (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंतारीख से तिथि निकालना : ११७
पूर्णमासी की तारीख जानना
इष्ट सन के बाद मासिक को ३० में से घटा दो, शेष १५ रहे तो ३० तारीख को पूर्णिमा होगी। शेष १५ से अधिक हों तो १५ से जितने अधिक हों वही अधिक तारीख होगी। १५ से कम हों तो उसमें १५ और जोड़ना तो योग फल पूर्णिमा की तारीख होगी।
जैसे सन् १९४३ का शेषांक ६ है। जून के नीचे और ६ शेषांक के आगे जून का मासांक २९ दिया है। ३०-२९ मासांक=शेष १ यह १५ से कम है। इस कारण १+१५=१६ तारीख १६ को पूर्णिमा होगी।
इस रीति में भी १ का कभी कभी का अन्तर आ जाता है।
\frac{\text{सन् } १९४६ + १}{१९} = \frac{१९४७}{१९} = ९ \text{ शेषांक इसके आगे और मई के नीचे १ मासांक है।}
३०—१=२९ यह १५ से अधिक है। २९—१५ शेष=१४ तारीख को मई में पूनम होगी।
तिथि से तारीख निकालना
\text{तारीख} = \left( \frac{\text{शुक्ल पक्ष तिथि} + ३०}{\text{कृष्ण पक्ष तिथि} + १५} \right) - \left( \begin{array}{l} \text{चैत्र से १ गिनकर} \\ \text{इष्टमास तक संख्या} \end{array} \right) + \text{सन् विशेषांक}
सायन शेष संक्रान्ति को चैत्र जानो और इससे १ गिनो।
रीति—शुक्ल पक्ष की तिथि होतो ३० और कृष्ण पक्ष की तिथि हो तो १५ जोड़ना। योग फल को तिथि संख्या जानो।
मास संख्या—जिस मास में सायन शेष संक्रान्ति हो उसे चैत्र जानो और चैत्र को १ गिन कर इष्ट मास तक संख्या गिनो गिनने से जो संख्या आवे वह मासांक हुआ।
यहाँ नक्षत्र मान से जहाँ महीना पूरा हो उसे मास मानना आवश्यक नहीं है। केवल एक सायन शेष संक्रमण वाले मास को चैत्र मान कर इसी चैत्र से गिनना।
सन ईस्वी का सुवर्णांक और विशेषांक निकालना पहले बता चुके हैं। विशेषांक को माससंख्या में जोड़ो और इस योग को तिथि संख्या में घटाओ, जो शेष बचे वही तारीख होगी।
हिन्दी मास में जो अंग्रेजी महीना पड़ता है उस अंग्रेजी महीने की तारीख इस प्रकार निकालना। यदि ३० से अधिक तारीख आवे तो ३० दिन घटा देना। घटाने से जो बचे वह अगले महीने की तारीख होगी।
हिन्दी महीने में लगभग ये अंग्रेजी महीने पड़ते हैं।
चैत्र वैशाख जेठ आषाढ़ सावन भादो कुम्हार कार्तिक अग्रहन पूस माघ फाल्गुन मार्च अप्रैल मई जून जुलाई अगस्त सितम्बर अक्टू० नव० दिस० जन० फर० कभी इन महीनों में कुछ अन्तर पड़ जाता है।