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सचित्र ज्योतिष शिक्षा (प्रारम्भिक ज्ञान खण्ड) भाग १

Sachitra Jyotisha Shiksha (Prarambhika Gyan Khand) Vol 1

बाबूलाल ठाकुर द्वारा

स्रोत: Motilal Banarsidass Edition · Motilal Banarsidass, Delhi (उद्गम)

DevanagariHindipublished288 पृष्ठ

तारीख से तिथि निकालना : ११७

पूर्णमासी की तारीख जानना

इष्ट सन के बाद मासिक को ३० में से घटा दो, शेष १५ रहे तो ३० तारीख को पूर्णिमा होगी। शेष १५ से अधिक हों तो १५ से जितने अधिक हों वही अधिक तारीख होगी। १५ से कम हों तो उसमें १५ और जोड़ना तो योग फल पूर्णिमा की तारीख होगी।

जैसे सन् १९४३ का शेषांक ६ है। जून के नीचे और ६ शेषांक के आगे जून का मासांक २९ दिया है। ३०-२९ मासांक=शेष १ यह १५ से कम है। इस कारण १+१५=१६ तारीख १६ को पूर्णिमा होगी।

इस रीति में भी १ का कभी कभी का अन्तर आ जाता है।

\frac{\text{सन् } १९४६ + १}{१९} = \frac{१९४७}{१९} = ९ \text{ शेषांक इसके आगे और मई के नीचे १ मासांक है।}

३०—१=२९ यह १५ से अधिक है। २९—१५ शेष=१४ तारीख को मई में पूनम होगी।

तिथि से तारीख निकालना

\text{तारीख} = \left( \frac{\text{शुक्ल पक्ष तिथि} + ३०}{\text{कृष्ण पक्ष तिथि} + १५} \right) - \left( \begin{array}{l} \text{चैत्र से १ गिनकर} \\ \text{इष्टमास तक संख्या} \end{array} \right) + \text{सन् विशेषांक}

सायन शेष संक्रान्ति को चैत्र जानो और इससे १ गिनो।

रीति—शुक्ल पक्ष की तिथि होतो ३० और कृष्ण पक्ष की तिथि हो तो १५ जोड़ना। योग फल को तिथि संख्या जानो।

मास संख्या—जिस मास में सायन शेष संक्रान्ति हो उसे चैत्र जानो और चैत्र को १ गिन कर इष्ट मास तक संख्या गिनो गिनने से जो संख्या आवे वह मासांक हुआ।

यहाँ नक्षत्र मान से जहाँ महीना पूरा हो उसे मास मानना आवश्यक नहीं है। केवल एक सायन शेष संक्रमण वाले मास को चैत्र मान कर इसी चैत्र से गिनना।

सन ईस्वी का सुवर्णांक और विशेषांक निकालना पहले बता चुके हैं। विशेषांक को माससंख्या में जोड़ो और इस योग को तिथि संख्या में घटाओ, जो शेष बचे वही तारीख होगी।

हिन्दी मास में जो अंग्रेजी महीना पड़ता है उस अंग्रेजी महीने की तारीख इस प्रकार निकालना। यदि ३० से अधिक तारीख आवे तो ३० दिन घटा देना। घटाने से जो बचे वह अगले महीने की तारीख होगी।

हिन्दी महीने में लगभग ये अंग्रेजी महीने पड़ते हैं।

चैत्र वैशाख जेठ आषाढ़ सावन भादो कुम्हार कार्तिक अग्रहन पूस माघ फाल्गुन मार्च अप्रैल मई जून जुलाई अगस्त सितम्बर अक्टू० नव० दिस० जन० फर० कभी इन महीनों में कुछ अन्तर पड़ जाता है।

१९८ : सचित्र उद्योतिष शिक्षा, आरम्भिक ज्ञान खण्ड

उदाहरण (१)

सन् १९४३ ज्येष्ठ शुक्ल १४ की तारीख जाननी है—

(१९४३ + १) = १३३९ = शेष सुवर्णांक, इसका विशेषांक २५ इसी के नीचे दिया है।

तारीख = (शुक्ल १४ + ३०) — (चैत्र से ज्येष्ठ मास + ३ विशेषांक २५) = ४४-२८ = १६ तारीख हुई। इस तारीख में भी कभी-कभी १ का अन्तर पड़ जाता है। क्योंकि तिथि की हानि-वृद्धि होती है और कभी कभी एक तारीख में २ तिथि हो जाती हैं।

दूसरा उदाहरण—चैत्र कृष्ण १३ सन १८१० को तारीख जानना है— १८३० + १ = १८३१ = शेष १०, १० सुवर्णांक के नीचे ९ विशेषांक दिया है।

तारीख = (कृष्ण १३ + १५) — (चैत्र से चैत्र मास ४ + विशेषांक ९) = २८-१० = १८ तारीख आई। मार्च की १८ तारीख हुई।

अभावस्या की तारीख जानना

तारीख = ३० — (सन का विशेषांक + चैत्र से इष्ट मास तक मास संख्या) जैसे सन १९४२ के दिसम्बर में अभावस्या कौन तारीख पड़ेगी जानना है। १३३२ + १ = १३३३ = शेष ५ सुवर्णांक के नीचे १४ विशेषांक दिया है। तारीख = ३० — (विशेषांक + मार्च से दिसम्बर तक) = ३० - २४ = ६ तारीख।

१४ महीना १०

इसमें भी कभी कभी १ दिन का अन्तर पड़ जाता है। पंचांगों में ७ तारीख को अभावस्या दी है।

विशेष विचार—संक्रान्ति मान में वृद्धि

संक्रान्ति मान ७२ वर्ष में १ दिन आगे बढ़ता है। जनवरी और फरवरी की तिथि निकालने को इष्ट वर्ष के पिछले वर्ष का विशेषांक निकालो और इन दोनों महीनों की अभावस्या निकालने के लिए गत वर्ष का विशेषांक लो।

अभावस्या निकालने का विशेषांक और महीने का योग ३० से अधिक हो तो ३० से घटा देना; जहाँ ० शेष रहे उसे ३० तारीख समझना। तिथि की क्षय वृद्धि से कभी-कभी तारीख में १ दिन का अन्तर पड़ जाता है। इस कारण इष्ट बार पर से शुद्ध तारीख निकाल कर मिलान कर लेना चाहिए। बार से तारीख निकालने की रीति आगे दी है।

तारीख से दिन निकालना

यदि तिथि से तारीख निकालनी है और दिन भी मालूम करना है तो यह निश्चय कर लेना चाहिए कि उस दिन वह तारीख पड़ती है या नहीं। जानने की रीति आगे दी है।

तारीख से तिथि निकालना : १९९

मासांक और वारांक

अंक
मासजनवरीमईलीप-फरवरीजूनसितम्बरलीप--जनवरी
अक्टूबरफरवरीमार्चदिसम्बरअप्रैल
अगस्तनवम्बरजुलाई

दिन रविवार सोमवार मंगलवार बुधवार गुरुवार शुक्रवार शनिवार

इस चक्र में महीने के ऊपर जो अंक दिए हैं वे मासांक हैं और दिन के ऊपर के अंक वारांक हैं।

रीति सन् ईस्वी का उत्तरार्द्ध अर्थात् इकाई और दहाई को लेकर उस उत्तरार्द्ध का चतुर्थांश भी उसी में जोड़ दो। चतुर्थांश निकालते समय आधा या पौन अंक मिले उसे जोड़ते समय छोड़ देना चाहिए। उस योग फल में तारीख और अंग्रेजी महीने का अंक ( मासांक ) भी जोड़ दो और ७ का भाग दो जो शेष बचे वही बार उपर्युक्त क्रम से होगा।

जैसे सन् १९४३ में २३ मई का दिन जानना है, सन् १९४३ का उत्तरार्द्ध ४३ हुआ=४३ + ४३=४३ + १०३=५३ (यहाँ जोड़ते समय ३ छोड़ दिया)=५३+तारीख २३+मई का मासांक २=७५। ७५+७=शेष १ रविवार। यहाँ मई के ऊपर २ अंक लिखा हैं इससे मई का मासांक २ हुआ। सब का योग ७५ था, ७ का भाग देने से १ बचा, १ के नीचे इतवार लिखा है। इससे प्रकट हुआ कि २३ मई सन् १९४३ को इतवार का दिन था।

बीसवीं सदी में उपर्युक्त नियम से तारीख का दिन निकालना है। परन्तु इसके पहिले की गत सदी की तारीख जानने के लिए प्रति सदी में २ अधिक जोड़ना और भविष्य की सदी में २ अंक घटा देना होगा, तब ठीक तारीख निकलेगी।

लीप फरवरी हो तो लीप वर्ष में जनवरी और फरवरी की तारीख से दिन निकालने में कुछ सावधानी की आवश्यकता है। ऊपर चक्र में लीप फरवरी और लीप जनवरी जहाँ लिखा है उस वर्ष उसके ऊपर लिखा मासांक को अर्थात् लीप जनवरी का निकालने को लीप जनवरी का विशेषांक ० या ७ लेना और लीप फरवरी के लिए मासांक ३ लेना। क्योंकि लीप फरवरी के ऊपर ३ अंक लिखा है। यदि लीप वर्ष न हो तो साधारण जनवरी का अंक १ और फरवरी का साधारण अंक ४ लेना जैसा पहिले चक्र में बता चुके हैं।

लीप वर्ष ( Leap year )=प्लुत वर्ष। जिस वर्ष में सन् ईस्वी में ४ का पूरा २ भाग चला जाय या पूर्ण सदी हो तो उसमें ४०० का भाग पूरा २ चला जाय अर्थात् भाग देने से शेष कुछ न बचे तो वह लीप इयर (प्लुतवर्ष) कहलाता है। जैसे ४, ८, १२, ८८, १२, १६ में ४ का भाग पूरा २ चला जाता है। शेष कुछ नहीं बचता ता ये सब लीप वर्ष होंगे। और ४००, ८००, १२००, १६००, २०००, इत्यादि इन ईस्वी में जिसमें सदी शेष कुछ नहीं बचता तो ये सब लीप वर्ष कहलायेंगे,

२०० : सचित्र ज्योतिष शिक्षा, प्रारम्भिक ज्ञान खण्ड

सन् १९०० ईसवी यह पूरी सदी तो है (अर्थात् सैकड़ा के २ शून्य इसमें तो हैं) परन्तु ४०० का भाग पूरा पूरा नहीं जाता, ४०० का भाग देने से शेष बचता है। इससे यह लीप वर्ष नहीं है। १९१६ में ४ का भाग देने से कुछ नहीं बचता, इस कारण लीप वर्ष होगा।

लीप वर्ष में फरवरी २६ दिन की होती है। साधारण फरवरी में २८ दिन होते हैं शेष महीनों में कोई ३० दिन का कोई ३१ दिन का होता है। जनवरी, मार्च, मई, जुलाई, अगस्त, अक्टूबर और दिसम्बर में ३१ दिन, शेष महीनों में ३० दिन होते हैं।

आगे इसी को सरल अंश अनन्त वर्षों की बनाई गई है, जिससे किसी भी सन् की तारीख से दिन या दिन से तारीख सरलता से जान सकते हो।

अनन्त वर्षों की जन्त्री

अंग्रेजी महीनासन् ईस्वी का नम्बर
लीप जनवरी, अग्रेल, जुलाई
सितम्बर, दिसम्बर
जून
फरवरी, मार्च, नवम्बर
लीप फरवरी अगस्त
मई
जनवरी, अक्टूबर
१०
११
१२
१३
१४

तारीख

दिन

जन्त्री रखने की रीति

इस जन्त्री से किसी भी सन् की तारीख या दिन जान सकते हो। जिस सन् ईस्वी की तारीख खोजना हो उसका नम्बर आगे बताई हुई रीति से निकालो। साल में एक बार सन् का नम्बर खोज लेने से वह नम्बर वर्ष भर काम देता है।

जिस महीने की तारीख जाननी है वह अंग्रेजी महीना बाईं ओर खोजो। ऊपर अंग्रेजी महीना लिखा है, उसके नीचे छप्ट महीना मिलेगा। उस महीने के सीध में

तारीख से तिथि निकालना : २०१

दाहिनी ओर प्रथम सप्त् भा नम्बर खोजो । सन् ईस्वी का नम्बर जहाँ लिखा है उसो के नीचे सन् ईसवी भा नम्बर मिलेगा । जहाँ सन् ईस्वी का नम्बर निचे उसके नीचे उसी खड़ी पंक्ति में दिन की पंक्ति है । उसी दिन की पंक्ति में सबसे ऊपर कौन बार है इसका ध्यान रखो । क्योंकि अपनी तारीख इसी बार पंक्ति के अनुसार निकलेगी । दिन पंक्ति के बाई ओर तारीख की पंक्तियाँ हैं । जहाँ तारीख लिखा है उसके ऊपर तारीखें दी हैं और जहाँ दिन लिखा है उसके ऊपर दिन की पंक्तियाँ हैं ।

दिन की प्राप्त पंक्ति के बाई ओर जो तारीखें दी हैं उनमें से इष्ट दिन की तारीख या इष्ट तारीख का दिन खोज लो । दिन की प्राप्त पंक्ति का उपयोग करते समय शेष दी हुई दिन की पंक्तियों पर कोई ध्यान मत दो । यह पंक्ति महीना भर काम देगी । दूसरे महीने की उसी सप्त् के नम्बर के नीचे दूसरी पंक्ति निकलती है ।

उदाहरण—सन् १९४३ का नम्बर ५ है (सन् का नम्बर निकालना आगे बताया है) जून के महीने की तारीख और दिन देखना है । बाई ओर ऊपर अंग्रेजी महीनों के नीचे तीसरी पंक्ति में जून दिया है, उसके आगे सन् के नम्बर के नीचे सन् का नम्बर ५ खोजा (क्योंकि इष्ट सन् का नम्बर ५ है) यह तीसरी खड़ी पंक्ति में मिला, इसके ठीक नीचे दिन की पंक्ति में दिन खोजने से दिन की पंक्ति मिलेगी । उसमें सबसे ऊपर मंगल लिखा है तो मंगलवार को पहली तारीख होगी । दिन के बाई ओर इष्ट दिन की तारीख खोज लो । उसी दिन की पंक्ति से जिसमें वादित्यवार मंगलवार है दिन से तारीख या इष्ट तारीख का दिन निकाल लेना चाहिए । जैसे ३० तारीख कौन दिन पड़ेगा देखना है तो ३० के सीध में बुधवार है । इससे प्रगट हुआ ३० तारीख को बुधवार होगा । इसी प्रकार जून की १० तारीख गुस्वार को पड़ेगी । तारीख १७थी गुस्वार को होगी । सोमवार की तारीख देखनी है तो सोमवार के आगे ७, १४, २१ और २८ तारीखें दी हैं इनमें से जिस तारीख की आवश्यकता हो ले लेना । यहाँ तारीख २१ तक दी है, परन्तु जून महीने में केवल ३० दिन होते हैं । इस कारण ३० तारीख तक इस महीने में लगे बाकी छोड़ देंगे ।

सन् का नम्बर जानने का चक्र

सन् का नम्बरशेषसदी पंक्ति
सन्
का
नम्बर

२०२ : सचित्र ज्योतिष शिक्षा, प्रारम्भिक ज्ञान खण्ड

शेष वर्ष ( सन् के इकाई वहाई के अंक )

सन् ÷ ४००
१०११शेष जो बचे
१२१३१४१५१६=शेष सदी ।
१७१८१९२०२१२२शेष सदी की
२३२४२५२६२७२८इकाई वहाई
२८२९३०३१३२३३=शेष वर्ष ।
३४३५३६३७३८३९संकड़ा का
४०४१४२४३४४अंक + १ =
४५४६४७४८४९५०पंक्ति ।
५१५२५३५४५५५६पंक्ति के साथ
५६५७५८५९६०६१में और शेष
६२६३६४६५६६६७वर्ष के ऊपर
६८६९७०७१७२सन् का
७३७४७५७६७७७८नम्बर
७९८०८१८२८३८४मिलेगा ।
८५८६८७८८८९
९०९१९२९३९४९५
९६९७९८९९१००

शेष वर्ष ( सन् के इकाई वहाई के अंक )

सन् ईसवी का नम्बर निकालने की रीति ।

सन् ÷ ४०० = शेष सदी । सन् ईसवी यदि ४०० से अधिक हो तो ४०० का भाग दो जो शेष बचे उसे लो । जो इस प्रकार का शेष बचता है उसे शेष सदी कहते हैं । यदि ४०० से कम सन् हो तो चक्र के अनुसार ही पंक्ति का नम्बर होगा, जैसे:—

  • शेष ० से ९९ तक = पंक्ति १
  • शेष १०० से १९९ तक = पंक्ति २
  • शेष २०० से २९९ तक = पंक्ति ३
  • शेष ३०० से ३९९ तक = पंक्ति ४

४०० का भाग देने पर जो शेष सदी मिले उसमें फिर १०० का भाग दो जो शेष बचे वह = शेष वर्ष हुआ । और उसमें जितने बार १०० का भाग जाय वह लम्बि हुई । इस लम्बि में १ और जोड़ना तो वह पंक्ति का नम्बर होगा । अर्थात् उस सदी के इकाई वहाई के अंक शेष वर्ष कहलाये जो शेष वर्ष चक्र में दिया है और उस संकड़ा के अंक में १ और जोड़ो तो वह पंक्ति का नम्बर होगा ।

तारीख से तिथि निकालना : २०३

ऊपर चक्र में पंक्ति का नम्बर अन्त में १ से ४ तक दिया है। अपने इष्ट सन् के शेष वर्ष के ऊपर और इष्ट पंक्ति में जो सन् का नम्बर मिले वही इष्ट सन् का नम्बर होगा।

वर्तमान सदी की पंक्ति ४ है। इस कारण वर्तमान सदी में सबसे नीचे की पंक्ति ४ के सन् का नम्बर लेना।

उदाहरण—

(१) सन् १९०० ÷ ४०० = ४ \frac{300}{400} = \text{शेष } ३०० हुआ। शेष ३०० ÷ १०० = ३ वार भाग गया—लब्धि ३+१=४ पंक्ति हुई, शेष ० बचा तो शेष वर्ष ० हुआ। अब शेष वर्ष चक्र में ० के ऊपर और ४ पंक्ति की सीध में देखा तो सन् का नम्बर १ मिला। सन् का नम्बर १ हुआ।

(२) सन् २०० ÷ ४०० = \frac{300}{400} = \text{शेष } २०० ÷ १००+लब्धि २+१=३ पंक्ति, शेष, शेष वर्ष ० पंक्ति ३। यहाँ इकाई दहाई में शून्य है १०० का भाग देने से शेष ० रहेगा। इस कारण शेष वर्ष ० हुआ। शेष वर्ष चक्र में ० के ऊपर पंक्ति ३ के सीध में खोजने से सन् का नम्बर ३ मिला।

(३) सन् १९४८ ÷ ४०० शेष सदी ३४४ हुई। इसमें इकाई दहाई में ४४ है तो शेष वर्ष ४४ हुए। शेष ३४४ के सैकड़ा के स्थान में ३ हैं ३+१=४ पंक्ति या ३४४ ÷ १००=३ लब्धि+१=४ पंक्ति। शेष ४४=शेष वर्ष ४४ हुए। शेष वर्ष ४४ के ऊपर और पंक्ति ४ के सीध में सन् का नम्बर ७ मिला।

(४) सन् १८०१ ÷ ४००=शेष सदी २०१, इकाई दहाई में ०१ है तो शेष वर्ष ०१ अर्थात् १ हुआ। २०१ में सैकड़ा के स्थान में २ है। २+१=३ पंक्ति हुई। या २००+१००=लब्धि+१=३ पंक्ति। शेष १=शेष वर्ष १ हुआ। शेष वर्ष १ के ऊपर पंक्ति ३ के सीध में खोजा तो सन् का नम्बर ४ मिला।

यहाँ ४०० का भाग देने के उपरान्त जो शेष सदी प्राप्त होती है उसमें फिर १०० का भाग देना बताया है, परन्तु यदि ऊपर पंक्ति का चक्र देखो तो वहाँ ही लिखा है कि शेष कितने से कितने के बीच में बचने पर कौन पंक्ति होती है। इस कारण सुविधा के लिए ऊपर ही चक्र के दाहिनी ओर लिख दिया है। सन् में केवल ४०० का भाग देकर शेष सदी निकाल लो। शेष सदी के इकाई दहाई के अंक शेष वर्ष होते हैं। उसी शेष वर्ष के ऊपर इष्ट पंक्ति की सीध में सन् का नम्बर मिल जाता है। वर्ष में केवल १ वार सन् का नम्बर निकालना पड़ता है और वह नम्बर उसी वर्ष भर काम देता है।

२०४ : सचित्र ज्योतिष शिक्षा, प्रारम्भिक ज्ञान खण्ड

कुछ निकाले हुए सन्‌ के नम्बर

सन्‌ के नं. १ २ ३

१७९८ १७९९ १८००

१८०४ १८०५ १५०६

१८१० १८११ +

  • १८१६ १24

१८२१ १८२२ १८२३

१२२७ + १८२८

१८३२ १८३३ १८३४

१८३८ १५३९ +

  • १८४४ १८४५

१८४९ १८५० १८५१

१८५५ -F- १८५६

१८६० १८६१ १८६२

१८६६ १८६७ +

पे + १८७२ १८७३

FE १८७७ १८७८ | पृ८७९

[प्र 1००३ + १८८४

१८८८ १८८९ १८९०

१८९४ १८९५ +

१९०० १९०१ १९०२

१९०६ १९०७ +

  • १९१२ १९१३

१९१७ १९१८ १९१९

१९२३ + १९२४

१९२८ १९२९ १९३०

१९३४ १९३५ पः

  • १९४० १९४१

१९४५ १९४६ १९४७

१९५१ + १९५२

१९५६ १९५७ १९५३

१९६२ १९६३ +

तारीख से तिथि निकालना : २०५

सप्ताह सं. क्र. सं.
सप्ताह सं. क्र. सं.+१९६८१९६९१९७०१९७१+१९७२
१९७३१९७४१९७५+१९७६१९७७१९७८
१९७९+१९८०१९८११९८२१९८३+
१९८४१९८५१९८६१९८७+१९८८१९८९
१९९०१९९१+१९९२१९९३१९९४१९९५
  • | १९९६ | १९९७ | १९९८ | १९९९ | + | २००० २००१ | २००२ | २००३ | + | २००४ | २००५ | २००६ २००७ | + | २००८ | २००९ | २०१० | २०११ | + २०१२ | २०१३ | २०१४ | २०१५ | + | २०१६ | २०१७

जंत्री बनाने की रीति

यह जंत्री बनाना कठिन नहीं है स्वतः बना सकते हो। इस ढंग से यह बनाई गई है जिससे अपनी स्मरण शक्ति से ही जब आवश्यकता हो वड़ी सरलता से कोई भी इसे बना सके।

आरम्भ में मास के अंक उलटे क्रम से बाईं ओर रखो अर्थात् पहिले ७ फिर उसके नीचे ६ फिर ५ इत्यादि और उस मासांक के आगे उस नम्बर के महीने लिख दो। पहिले बता चुके हैं कि कौन महीने का क्या नम्बर होता है। उनको कटस्थ कर लेना कोई कठिन नहीं है। इस प्रकार ७ पंक्तियों में सब १२ महीने (लीप जनवरी और लीप फरवरी भी) आ जाते हैं।

महीने की पंक्ति के आगे दाहिनी ओर सन् के नम्बर की पंक्तियाँ हैं। इसका भरना बहुत सरल है। खड़ी पंक्ति में ऊपर से नीचे १, २, ३, ४ आदि क्रम पूर्वक ७ अंक तक लिख लो। फिर सबसे ऊपर की पंक्ति में भी बाईं ओर से १ के आगे २, ३, ४ आदि क्रम पूर्वक लिखते जाओ और ७ अंक तक लिख लो। शेष कोठों में उसके आगे के अंक लिख कर सब कोठे भर दो। ७ अंक के बाद फिर १ अंक लिख कर उसके आगे के अंक क्रमानुसार लिखना पड़ता है।

सन् के नम्बर के कोठों के नीचे दिन की पंक्तियाँ हैं। इसमें रविवार से आरम्भ कर शनिवार तक आड़े ओर खड़े कोठों में दिन भर दो। जिस प्रकार सन् का नम्बर भरा था उसी रीति से क्रमानुसार दिन सब कोठों में लिख दो।

इसके बाईं ओर महीने की पंक्ति के नीचे तारीख की पंक्तियाँ हैं, उनमें १ से लेकर ३१ तक क्रमानुसार तारीख के अंक भर दो। वस, इस प्रकार अन्त बर्यो की जंत्री तैयार हो गई। जंत्री बनाने की इतनी सरल रीति और कहीं न मिलेगी।

सन् का नम्बर निकालने का भी चक्र बनाना बहुत सरल है। पंक्ति ४ में १ से लेकर ७ कोठों में क्रमानुसार ७ अंक लिख लो, और उसके ऊपर तीसरी पंक्ति में

२०६ : सचिव ज्योतिष शिक्षा, प्रारम्भिक ज्ञान खण्ड

प्रत्येक अंक में २ जोड़ कर लिख दो, ७ के बाद १ अंक लिखना न नहीं लिखना। इसी प्रकार दूसरी और पहली पंक्ति में सबमें क्रम से २-२ अंक बढ़ा कर लिख दो तो पंक्ति के अनुसार सन् के नम्बर के अंक सब पंक्तियों में लिख जायेंगे।

१०० के भीतर पहिली पंक्ति की शेष सदी, २०० के भीतर दूसरी पंक्ति, ३०० के भीतर तीसरी, और ४०० के भीतर चौथी पंक्ति सन् ईस्वी की शेष सदी की होती है।

शेष वर्ष चक्र बनाना भी सरल है। पंक्ति ४ के सीधे में १ से ७ तक सन् के नम्बर के अंक लिखें हैं। उसके नीचे ० से लेकर १, २, ३ आदि शेष वर्ष के अंक भरना आरम्भ करो। ४-४ अंक लिख लेने पर लीप वर्ष आता है। लीप अंग्रेजी शब्द है। इसका अर्थ है कुदना। इससे एक कोठा कुद कर अर्थात् लीप इयर को १ कोठा छोड़ कर आगे लिखो। जैसे सन् के नम्बर के नीचे, ० फिर २ के नीचे १, ३ के नीचे २, और ४ के नीचे ३ क्रमानुसार ४ अंक शेष वर्ष के लिख चुके। इसके उपरान्त चौथा वर्ष ४ लीप इयर का होता है। इस कारण एक कोठा आगे का छोड़ कर अर्थात् सन् का नम्बर ५ के नीचे X चिह्न लगाकर आगे के कोठे में ( सन् का नम्बर ६ के नीचे ) ४ शेष वर्ष लिखो, आगे क्रमानुसार ४, ५, ६, ७ तक लिखने के बाद १ कोठा छोड़ कर न लिखो क्योंकि न लीप वर्ष है। इसी प्रकार सब कोठों में क्रमानुसार ९९ तक अंक अपने मन में भरते चले जाओ। जिस वर्ष के पहिले X ढ़ेरा का चिह्न खाली जगह में है उसे लीप वर्ष समझना।

दो सदी के सन् के नम्बर इसी प्रकार निकाल कर आगे चक्र में दिये हैं, जिससे सन् के नम्बर खोजने में कोई अड़चन न हो। इसी प्रकार इसके आगे के सन् के नम्बर निकालने का चक्र बना सकते हो। केवल लीप वर्ष का ध्यान रखना। यदि लीप वर्ष है तो आगे नम्बर के नीचे खाली ढ़ेरे का चिह्न लगा कर उसके आगे के नम्बर के नीचे वह लीप वर्ष लिखना। इस चक्र के देखने से ही सब समझ में आ जायगा। सन् १८०० में ४०० का भाग नहीं गया तो यह लीप वर्ष नहीं माना गया, क्योंकि पूरी सदी में ४०० का भाग पूरा-पूरा लगने से लीप वर्ष माना जाता है। परन्तु साधारण वर्ष में पूरा ४ का भाग लग जाय तब लीप वर्ष माना जाता है।

मुसलमानों सन् हिजरी के महीनों की तारीख जानना

मुसलमानों महीना

सन् का नम्बर

मोहर्रम १। सम्वाल १०
जमादिलल अब्बल ५
रविउल आखिर ४। रमजान ९
सावान ८
रविउल अब्बल ३। जिलहिज १२
सफर २। रज्जब ७
जमादिलल आखिर ६। जीकैद ११

तारीख से तिथि निकालना : २०७

१ ८ १५ २२ २९ शनि. रवि. सोम. मंगल, बुध. गुरु शुक्र.

२ ९ १६ २३ ३० रवि. सोम. मंगल वुध. गुरु: शुक्र. शनि.

३ १० १७ २४ -- सोम. मंगल. वुध. गुरु. शुक्र, शनि. रवि.

४ ११ १८ २५ -- मंगल. वुध. गुरु. शुक्र. शनि. रवि. सोम.

५ १२ १९ २६ -- बुध, गुरु. शुक्र, शनि. रवि. सोम. मंगल,

६ १३ २० २७ -- गुरु. शुक्र. शनि. रवि. सोम. मंगल. बुध.

७ १४ २१ २८ -- शुक्र. शनि. रवि. सोम, मंगल, बुध. गुरु

जंत्री देखने की रीति-पहिले नीचे बताई विधि से हिंजरी सन्‌ का नम्बर खोज

"छो । वह नम्बर वर्ष भर काम देगा । फिर इष्ट मास के सामने की पंक्ति में प्राप्त

सन्‌ का नम्बर जहाँ मिळे उस नम्बर के नीचे जिस दिन की खड़ी पंक्ति मिले उसके

सामने बांई ओर दी हुई तारीख खोज लो या इष्ट तारीख का दिन उसी प्राप्त दिन

की पंक्ति से खोज लो ।

जैसे हिजरी सन्‌ १३७३ के दूसरे महीने सफर की पहिली तारीख किस दिन

होगी जानना है नीचे वताई रीति से हिजरी १३७३ का नम्वर खोजा तो ६ मिला ।

अब सफर महोने के आगे सन्‌ का नम्वर ६ खोजा, वह पहिली पंक्ति में भिला । उस

६ के नीचे दिन की पंक्ति जो शनिवार से आरम्भ होती है, ली । शनिवार के आगे

बाई ओर १ तारीख दी है। तो प्रगट हुआ कि शनिवार को मुसलमानी सफर की

यहिली तारीख होगी ।#

हिजरी सन्‌ का नंबर निकालने का चक्र

हिजरी. सन्‌ का नम्वर सदी

२ द्‌ दै १ ६ ३ ७ ५ अ

द ३ ७ गर र ६ डड एत

० १ २ ३ है शर द्‌ ७

८ ९ १० ११ १२ १३ १४ १५

१६ १७ १८ १९ २० २१ २२ २२

रद २५ २६ २७ रुन , २६ ३० ३१ ह

३२ ३३ ३४ ३५ ३६ ३७ ३८ ३९ ॐ

४० ४१ ४२ ४३ R25 अप्‌ ह. ४७ £

४८ ४९ ५० ५१ ५२ ५३ ४ शण 7

५६ ४७ ४५८ ४५९ ६० ६१ देरे दरे. जू,

६४ ६५ , ६६ ६७ ६८ ६९ ७० ७१ 2

७२ ७३ ७४ ७५ ७६ ७७ ऽऽ ७९ द.

८० ८१ ८२ ८३ ८४ यप दद ८७

षद ८९ ९० ९१ ९२ ९३ ९४ ९५

९६ ९७ ९८ ९९ ° ° ° ° FR न नल का स त्मात ता

#--इसमें तिथि के कारण कभी-कभी एक दिन का अन्तर पड़ जाता है ।

२०८ : सचित्र ज्योतिष शिक्षा, प्रारम्भिक ज्ञान खण्ड

सन् का नंबर निकालने की रीति

हिजरी } \div ४०० = शेष १०० या ३०० = अ सदी सदी } = शेष २०० या ० = ब सदी

हिजरी के इकाई दहाई के अंक = शेष वर्ष

हिजरी के इकाई दहाई के अंक छोड़ कर पूरी सदी लो, उसमें ४०० का भाग दो। यदि शेष १०० या ३०० बचे तो = अ = सदी होगी। यदि शेष २०० या ० बचे तो = ब = सदी होगी।

वह हिजरी अ या ब जिस प्रकार की सदी हो, उस पंक्ति में और शेष वर्ष के ऊपर जो सन् का नम्बर मिले वह इष्ट सन् का नम्बर होगा।

जैसे हिजरी सन् १३७३ में इकाई दहाई के अंक ७३ शेष वर्ष हुए। इनको छोड़ कर सदी १३०० ली \div ४०० = शेष १०० = अ = सदी हुई। अब शेष वर्ष ७३ के ऊपर और अ पंक्ति में खोजा तो ६ मिला। यही १३७३ के हिजरी सन् का नम्बर हुआ।

हिजरी सन् के नम्बर खोजने का अन्य प्रकार का चक्र

हिजरी सन् का नम्बर हिजरी की सदी के शेष वर्ष

हिजरी का नम्बर१६२४३२४०४८५६६४७२८०८८९६
१७२५३३४१४९५७६५७३८१८९९७
१०१८२६३४४२५०५८६६७४८२९०९८
१११९२७३५४३५१५९६७७५८३९१९९
१२२०२८३६४४५२६०६८७६८४९२
१३२१२९३७४५५३६१६९७७८५९३
१४२२३०३८४६५४६२७०७८८६९४
१५२३३१३९४७५५६३७१७९८७९५

सदी अ ब अ ब हिजरी का नम्बर खोजने की रीति— १०० २०० ३०० ४०० कोई हिजरी के इकाई दहाई के अंक ५०० ६०० ७०० ८०० छोड़कर पूरी सदी लो। सदी के ऊपर और ९०० १००० ११०० १२०० शेष वर्ष (हिजरी के इकाई दहाई के अंक) १३०० १४०० १५०० १६०० के सामने जो नम्बर मिले वही सन् का नंबर १७०० १८०० १९०० २००० होगा। जैसे हिजरी १३७३ की सदी १३०० २१०० २२०० ३३०० २४०० हुई और शेष वर्ष ७३ हुए। अब १३०० २५०० २६०० २७०० २८०० सदी के ऊपर देखो यह सदी अ प्रकार की २९०० ३००० ३१०० ३२०० है। इसके ऊपर और शेष वर्ष ७३ के सामने ३३०० ३४०० ३५०० ३६०० बाईं ओर देखो तो ६ मिला। यही ६ सन् ३७०० ३८०० ३९०० ४००० का नम्बर हिजरी १३७३ का हुआ।

हिजरी १२११ = १२०० सदी के ऊपर और ११ के सामने बाईं ओर देखा ५ मिला यही ५ सन् का नम्बर हुआ। यह सदी २

तारीख से तिथि निकालना : २०९

प्रकार की है। वस इस प्रकार प्राप्त सन् के नम्बर से इष्ट मास की तारीख ऊपर बताई रीति से खोज लो। पहले बताई हुई सन् के नम्बर खोजने की रीति और यह रीति एक ही है। यहाँ उदाहरण के लिए ५००० हिजरी तक देकर सन् का नम्बर खोजना बताया गया है।

राष्ट्रीय जंजी National calendar ( Gragarion calender )

अभी तक सन् ईसवी का दिनांक प्रचलित था, परन्तु यह राष्ट्रीय नहीं है, इस विचार से भारत सरकार ने दिनांक २२ मार्च ईसवी सन् १९५३ से राष्ट्रीय जंजी प्रचलित की है।

दिनांक २१ मार्च को वसन्त नम्यात Vernal equinox होता है, जब दिन रात बराबर होती है और नूर्ध ६ बजे उदय होता है। उस दिन राष्ट्रीय वर्ष का अन्त समझ कर दूसरे दिन २२ मार्च से राष्ट्रीय चैत्र मास आरम्भ होता है। उस दिन राष्ट्रीय चैत्र की १ तिथि ( दिनांक ) माका १ म०३९ से यह राष्ट्रीय वर्ष की तिथि आरम्भ होती है।

यह राष्ट्रीय दिनांक अर्द्ध रात्रि से अर्द्ध रात्रि तक ईसवी सन के दिनांक के अनुसार ही माना जायगा। राष्ट्रीय वर्ष दिन ३६५ घण्टा ५ मिनट ८ से०४८ का माना गया है। लीप इयर ( जून बर्ष ) में हर चौथि वर्ष ( सन् ईसवी के अनुसार ही ) चैत्र मास ३१ दिन का होगा। साधारण वर्ष में चैत्र ३० दिन का ही होगा। इसी देशाष्ट्र से साइप्रस तक ५ महीने ३९ दिन की ओप ६ महीने ३० दिन की होगी।

| आरम्भ का | | आरम्भ का ---|---|---|--- राष्ट्रीय मास | अंग्रेजी दिनांक | राष्ट्रीय मास | अंग्रेजी दिनांक लीप चैत्र | ३१ २२ मार्च से | आश्विन | ३० २३ सितम्बर से साधारण चैत्र | ३० .. | कात्तिक | ३० २३ अक्टूबर .. बैशाख | ३१ २१ अप्रैल .. | ज्येष्ठ | ३० २२ जून २४ .. ज्येष्ठ | ३१ २२ मई .. | श्रावण | ३० २२ अगस्त .. श्रावण | ३१ २२ जून .. | भाद्र | ३० २१ सप्टेम्बर .. भाद्रपद | ३१ २३ जुलाई .. | सातपुन | ३० २० अक्टूबर .. साइप्रस | ३१ २० अगस्त .. | |

लीप वर्ष में राष्ट्रीय देशाष्ट्र सप्ताह और इसमें वर्ष के मास आरम्भ होने की तारीख से एक दिन अधिक बढ़ जाता है। परन्तु दूसरे २२ दिन की रीति से ३०० के अनुमान की ३० तिथि दिनांक २१ मार्च को ही यह बताता है इसमें २३ मार्च के दिन चैत्र आरम्भ होगा।

पंचांगी १४ अक्टूबर में राष्ट्रीय दिनांक के प्रतिपादन सन् १९५३ का दिनांक ही दिया जाता है।

पंचांग में ही हुई तिथि और राष्ट्रीय दिनांक ऐतिहासिक अन्त के आस कर पंचांगों में तिथि और अंग्रेजी दिनांक के प्रतिपादन राष्ट्रीय दिनांक की दिशा देता है।

१४

२१० : सचित्र ज्योतिष शिक्षा, प्रारम्भिक ज्ञान खण्ड

अध्याय ३८

दिनमान जानना

यहाँ स्थूल रूप से दिनमान जानने की रीति बताई जाती है। सूक्ष्म रूप से दिनमान जानना गणित खण्ड में बताया गया है।

अयन संक्रान्ति से (अर्थात् सायन कर्क और सायन मकर संक्रान्ति से) गत दिन कितने हुए निकालो। गत दिन को ३ से गुणा कर १५३० जोड़ो और ६० का भाग दो। जो लब्धि मिले वह कर्क संक्रान्ति की गणना करने से रात्रिमान और मकर संक्रान्ति से गणना करने पर दिनमान निकलेगा।

जैसे सम्बत् २००० में २२ दिसम्बर की रात को सायन मकर की संक्रान्ति हुई थी। २३ मई का दिनमान जानना है तो दिसम्बर के शेष दिन ३१-२२=९+जनवरी ३१ के, + फरवरी २८ के, + मार्च ३१ के, + अप्रैल ३० के + मई २३ के=सर्व दिन १५२। १५२ दिन X ३ = ४५६ + १५३० = १९८६ \div ६० = ३३ घ. ६ पल. \therefore दिनमान ३३ घ. ६ प. हुआ।

६० ) १९८६ ( ३३ घड़ी

१८०

१८६

१८०

६ पल

रात्रिमान = (६० - दिनमान) = ६० - (३३ - ६) = २६ घ. ५४ प. रात्रिमान

२१ दिसम्बर को सायन मकर संक्रान्ति और २९ जून को सायन कर्क संक्रान्ति प्रायः होती है।

दिनमान से सूर्योदय जानना पञ्चांग देखने के प्रकरण में बता चुके हैं।

चन्द्रोदय अस्त ज्ञान (स्थूल रूप से)

चन्द्रोदय—पूणिमा के उपरान्त, प्रतिदिन २० घड़ी=५४ मिनट के उपरान्त चन्द्रोदय होता है। अर्थात् कृष्ण पक्ष आरम्भ होने पर इतनी देर बाद प्रतिदिन चन्द्र उदय होगा। तिथि में २० घड़ी का गुणा कर जान सकते हो कि उस तिथि में (कृष्ण पक्ष में) कितनी घड़ी उपरान्त चन्द्रोदय होगा।

यदि शुक्ल पक्ष है तो उतने घड़ी पल (या घण्टा मिनट) गये पर चन्द्र अस्त होगा। यह बहुत मोटा हिसाब है। दिनमान के अनुसार इसमें अन्तर पड़ता है।

चन्द्रोदय का समय जानना—

रात्रिमान को वर्तमान तिथि से गुणा करो। कृष्ण पक्ष हो तो गुणनफल में २ घटा दो। शुक्ल पक्ष हो तो गुणनफल में २ जोड़ दो। उपरान्त १५ का भाग दो,

दिनमान जानना : २११

लक्ष्मि चन्द्रोदय की घड़ी निकलेगी। १५ का भाग देने से जो बच्चे उसमें ६० का गुणा कर १५ का भाग देने से पल निकलता है।

जैसे ज्येष्ठ कृष्ण चतुर्थी को दिनमान ३३ घ. ६ प. है तो रात्रिमान २६ घण्टा ५४ प. हुआ।

[रात्रिमान तिथि] २६-५४×४ | —२ | कृष्ण पक्ष होने से | घ. प. (१०७-३६) | —२ | घ. प. घ. प. १०५-३६ ७-२ | = ---|---|---|---|---|---|--- १५ | | = | १५ | = | १५ | =

रात्रिमान २६ घ. ५४ प.

×४

१०७—३६ —२

कृष्ण पक्ष होने से घटाया।

१५ ) १०५-३६ ( ७ घड़ी

१०५

१५° ) ३६ ( २ पल

३०

अस्त जानना

पीष शुक्ल ७ दिनमान २६-३० रात्रिमान ३३-३० को चन्द्र के अस्त का समय जानना है।

रात्रिमान ३३-३०१५) २३६-३० (१५=१५ घ. ४६ प. रात्रि गये
×७ तिथि१५घड़ीउपरान्त
२३४-३०८६

+ २° शुक्ल पक्ष ७५

चन्द्र अस्त होगा।

२३६-३० होने से११ × ६०=

६६०

+३०

१५ ) ६९० ( ४६

६०

९० पल

९०

२१२ : सचित्र ज्योतिष शिक्षा, प्रारम्भिक ज्ञान खण्ड

तारा देखकर रात्रिमान जानना

(१) सूर्य नक्षत्र से, सिर के ऊपर जो नक्षत्र हो उस तक गिनो, गिनने से जो संख्या आवे उसमें ७ घटा कर २० का गुणा करना और ९ का भाग देना तो जो अंक शेष रहे वह गत रात्रि स्पष्ट होगी।

(२) या सूर्य नक्षत्र से, सिर के ऊपर जो नक्षत्र हो उस तक गिनने में जो संख्या आवे उसमें ७ घटाकर २ का गुणा कर २ घटा दो तो रात्रि स्पष्ट होगी।

पूर्वाषाढ़ा, अनुराधा, ज्येष्ठा, आश्लेषा, रेवती और विशाखा सिर के ऊपर हों तो अष्टम में उदय होता है। मृगशिर और मूल नक्षत्र में हो तो नवम में उदय होता है और जब कोई नक्षत्र सिर के ऊपर हो तो अष्टम में उदय होता है। सूर्य नक्षत्र जो होता है वह सूर्योदय के साथ उदय होता है और सूर्य अस्त के समय वही नक्षत्र अस्त स्थान पर आ जाता है। इस कारण सूर्य नक्षत्र से सिर के ऊपर तक जो नक्षत्र हों उनको यहाँ गिनना बताया है और सिर के नक्षत्र से पूर्व की ओर गिनो तो ऊपर बताये अनुसार अष्टम या नवम नक्षत्र उदय स्थान में रहेगा।

मान लो सूर्य मूल नक्षत्र पर है और रात्रि को देखा अश्विनी नक्षत्र सिर पर है। मूल से अश्विनी तक गिना तो १० नक्षत्र हुए। इनमें ७ घटा कर २० का गुणा कर ९ का भाग दिया।

(१०—६) X २० ÷ ९ = (२ X २०) ÷ ९ = ६० ÷ ९ = ६ \frac{३}{९} = ६ बड़ी ४० पल इतनी रात्रि गत हुई ऐसा जानना।

दिनमान में गत रात्रि जोड़ने से उस समय का इष्ट काल होगा, जैसे उस दिन २६-४ दिनमान में ६-४० गत रात्रि जोड़ा तो ३२-४४ इष्ट काल हुआ।

दूसरी रीति से सूर्य नक्षत्र से सिर के ऊपर का नक्षत्र अश्विनी तक १० हुए। इसमें ७ घटाये ३ बचे, २ से गुणा किया=६ हुए। इसमें से २ घटाये ४ बड़ी रहे। इस रीति से कुछ अन्तर पड़ जाता है।

सिर पर नक्षत्र अश्विनी है इससे आठवां नक्षत्र पुष्य हुआ। इस कारण इस समय पुष्य नक्षत्र या कर्क रात्रि उदय हो रही है अर्थात् कर्क लगन होगी।

रात्रि का समय जानना

पहिले देखो सिर पर कौन तारा है और उस तारे का क्या विपुर्बांध है। नाक्षत्र काल से १ घण्टा कम या अधिक जिस तारे का विपुर्बांध है वह तारा उस रात्रि को विलकुल नहीं दिखाएगा। जिस तारे का विपुर्बांध ६ घण्टा अधिक हो वह तारा सूर्य अस्त होने के समय सूर्य के ६ घण्टा आगे होने से सिर पर उस समय होगा। उससे अधिक १२ घण्टा विपुर्बांध जिस तारे का है वह रात्रि को और कभी सिर पर आयेगा।

जो तारा सिर पर दिखे उसका विपुर्बांध आगे दिए हुए चक्र में से देख कर लिख लो। उसमें से उस दिन का नाक्षत्र काल घटा दो। जो घण्टा मिनट बचे उतने घण्टा

दिनमान जानना : २१३

मिनट आगे वह तारा मध्यम रवि के आगे हैं ऐसा समझना। अर्थात् उतने बजे होंगे समझना। क्योंकि मध्यम रवि १२ बजे सिर पर आता है और इसके उतने घण्टा मि० आगे वह तारा है। इस कारण समझ लेना कि उतने बजे होंगे।

जैसे १ जनवरी को रात्रि में यह जानना है कि घड़ी में क्या बजा होगा। ५ जनवरी को दोपहर को मध्यम रवि का विषुवांश १९ घण्टा है। जैसा पहिले चक्र में दे चुके हैं अपने को १ जनवरी की रात्रि को जानना है। (ता० ५-१ ता०) = ४ अन्तर दिन। इसमें दोपहर रात तक ३ दिन घटाया तो = ३३ हुए। अर्थात् ४ दिन से आधा दिन इस कारण घटाया कि अपना समय ५ ता० के पहिले का है। ३३ दिन X ४ मि० गति = ० ० १४ मि० ता० ५ को १९ घण्टा विषुवांश था। इसमें से ०-१४ मि० घटा दिये तो शेष १८ घण्टा ४६ मि० बचे—यह उस दिन का नाक्षत्र काल था मध्यम रवि का विषुवांश हुआ।

मान लो उस दिन सिर पर अश्विनी नक्षत्र है। अश्विनी का विषुवांश चक्र में १ घण्टा ४९ मि० दिया है। इसमें से नाक्षत्र काल १८ घं० ४६ मि० घटाया तो नहीं

घं० मि०घटता, २४ घण्टा जोड़ कर घटाया तो शेष ७ घं० ३ मि०
१-४९रहे। अर्थात् १२ बजे दोपहर को जब मध्यम रवि मध्याह्न पर
—१८—४६था उससे ७ घं० ३ मि० आगे यह तारा है अर्थात् ७ घं० ३ मि०
शेष ७—३रात के बजे हैं।

समय देखते समय सिर के ऊपर कोई पहचान का तारा न मिले तो कुछ समय ठहरो, जब कोई पहचान का तारा सिर पर आवे तो उससे गणित कर अपनी घड़ी मिला लो।

ऊपर के उदाहरण में नाक्षत्रकाल १८—४६ आया है। यदि इससे १ घण्टा कम या अधिक जिस तारा का नाक्षत्र काल हो अर्थात् १७-४६ या १९-४६ हो तो वह तारा इस रात को बिलकुल नहीं दिखेगा। जैसे १ जनवरी को पूर्वाषाढा उत्तराषाढा और श्रवण नहीं दिखेंगे, क्योंकि जनवरी में मकर संक्रान्ति होती है तो धन और मकर के नक्षत्र नहीं दिखेंगे। जिस तारे का विषुवांश इससे ६ घण्टा आगे हो अर्थात् (१८-४६)+६=२० घण्टा ४६ मि० हो तो वह तारा सूर्यास्त के समय ६ घण्टा आगे होगा जैसे उ० भाद्रपद नक्षत्र, उससे १२ घण्टा अधिक हो (०-४६)+१२-४६ तो विषुवांश का तारा रात्रि को कभी सिर पर आवेगा जैसे हस्त।

तारों का होरात्मक विषुवांश

इनमें स्थिति के अनुसार बहुत थोड़ा अन्तर पड़ता है, क्योंकि प्रतिवर्ष इनकी गति ३-४ सेकण्ड के लगभग है।

२७४ : सचित्र ज्योतिष शिक्षा, प्रारम्भिक ज्ञान खण्ड

नक्षत्रघंमि०से०नक्षत्रघंमि०से०नक्षत्रघंमि०से०
१ अश्विनी१४२३.४११ पूर्वा फाल्गुनी१११५.४२१ उत्तराषाढ़ा१८३६४३.३
२ भरणी४४२६.६१२ उत्तराफाल्गुनी११४४१२.९२२ अभि०१८३३४३.३
३ कृत्तिका४१५०.११३ हस्त१२२४५६.९२३ श्रवण१९४६८.९
४ रोहिणी३०२८.११४ चित्रा१३२०११.२२४ धनि०२०३५१३.५
५ मृग०२९५४.११५ स्वाती१४१११९.७२५ शत०२२४७३९.५
६ आर्द्रा०२१३.५१६ विशाखा१५४५३७.३२६ पूर्वा भाद्रपद३३००१.७
७ पुनर्वसु३९१७.६१७ अनुराधा१५३४४२.८२७ उत्तरा भाद्रपद२०.६
८ पुष्य३९१७.६१८ ज्येष्ठा१६२३६४.५२८ रेवती४६.०
९ अश्लेषा५०२२.४१९ मूल१७१७९.४२५१२.२
१० मघा१०१८.८२० पूर्वाषाढ़ा१८२२६.५

स्थूल रीति से छाया से दिन का इष्ट जानना— परस दिन जो २१ जूत को होता है। पहिले बता चुके हैं कि किस अक्षांश पर कितना परम दिन [ बड़े से बड़ा दिन ] होता है।

( १ ) (परसदिन—अपना दिनमान ) + ५ = ( अ ) = दिन मध्य छाया ( बड़ी पल में )।

अपना दिनमान ५६

( १२ अंगुल संकु की छाया )—( अ=दिन मध्य छाया ) + १२ अंगुल संकु=दिन की गत या मध्य घटी पल अर्थात दोपहर के पहिले इतना दिन चढ़ा या दोपहर के बाद का इष्ट है तो इतना दिन शेष रहू जानना।

दिनमान जानना : २१५

गत=इतने घड़ी पल बीत गया ।

गम्य= , , बीतने को है ।

(२) दूसरा प्रकार

१२१ \div \left[ \begin{array}{l} \text{इष्ट छाया का} \\ \text{१२ का नाप} \end{array} + ६ \right] = \text{लब्धि घड़ी पल} \\ \text{( दिन की गत, गम्य घटी पल )}

(३) व=मेष से तुला संक्रान्ति तक=१ घटना तीसरा प्रकार—

\begin{array}{lll} \text{तुला व मीन} & ,, & \text{मैं=३} ,, \quad १०५ \div [ ( \text{छाया नाप}+७) - व ] \\ \text{वृश्चिक व कुम्भ} & ,, & \text{मैं=४} ,, \quad = \text{गत गम्य घटी} \\ \text{धन व मकर} & ,, & \text{मैं=५} ,, \end{array}

गत दिन=दिनाब्द के पूर्व में इतने घड़ी पल दिन चढ़ा ।

गम्य=दिन के उत्तरार्द्ध में इतने घड़ी पल शेष रहा ।

उदाहरण—

(१) मान लो अपना अक्षांश २३ अंश है । यहाँ का परम दिन १३ घं० २० मि० =३३ घ० २० पल का होता है जैसा पहिले समझा चुके हैं ।

अपने स्थान का परम दिन ३३ घड़ी २० पल है । इष्ट दिन का दिनमान

( \text{माल लो} ) \quad २६-१७ \text{ है}

\begin{array}{r} \text{अन्तर} \quad ७ \quad १७ \\ \hline \end{array}

अब १ शंकु (सलाका) १२ अंगुली का लिया, उसको सीधा खड़ा कर छाया नापी तो २५ अंगुली छाया निकली ।

\text{शंकु छाया} \quad २५ \text{ अंश-०}

\text{—दिन मध्य छाया} \quad १०--११

\text{अन्तर ( शेष )} = \quad १४--४९

+ \text{ शंकु नाप} \quad १२--०

\text{योग} \quad २६--४९

\text{अन्तर } ७-१७ \times ६ = \text{दिन} \\ \text{मध्य छाया}

७-१७=१० \text{ घ० } ११ \text{ प०}

\begin{array}{r} \times ७ \\ \hline ५ ) ५०-५९ ( १० \text{ घड़ी} \end{array}

\begin{array}{r} ५० \\ \hline ० \\ ५ ) ५९ ( ११ \text{ पल} \end{array}

\begin{array}{r} ५ \\ \hline ९ \\ \hline ५ \\ \hline ४ \end{array}

दिनमान

२६-१७ \times ६ = १५७ \text{ घ. } ४२ \text{ प.} = ९४६२ \text{ पल}

योग २६-४९ २९-४९ १६०-९ पल =५ घ. ५२ प. दिन शेष रहा मध्याह्न के बाद होने के कारण

२१६ : सचित्र ज्योतिष शिक्षा, प्रारम्भिक ज्ञान खण्ड

(२) दूसरीरीति

\begin{aligned} & १२१ \div (छाया + ६) \\ & = १२१ \div (१४ \text{ छाया} + ६) \\ & = १२१ \div २० = ६ \text{ घ. ३ प.} \\ & = ६ \text{ घ. ३ प. दिन शेष रहा।} \end{aligned}

मान लो इष्ट काल में अपनी छाया को अपने पैर से नापा तो, नाप में १४ पैर निकली। यह छाया मध्याह्न के उपरान्त की है।

२० ) १२१ ( ६ घड़ी

\underline{१२०}

१ \times ६०

२० ) ६० ( ३ पल

\underline{६०}

(३) तीसरी रीति

\begin{aligned} & १०५ \div [ (छाया + ७) - ४ ] \\ & = १०५ \div [ (१४ \text{ छाया} + ७) - ५ ] \end{aligned}

= १०५ \div (२१ - ५)

= १०५ \div १६ = ६ \text{ घ. ३३ प.}

= ६ \text{ घ. ३३ प. दिन शेष रहा।}

यह सब स्थूल रीति है इसका ध्यान रहे।

मान लो छाया का नाप वही १४ पांव है और धन संक्रान्ति होने से धन के ५ घटाना पड़ेगा तो व=५ हुआ।

१६ ) १०५ ( ६ घड़ी

\underline{९६}

२ \times ६०

१६ ) ५४० ( ३३ पल

\underline{४८}

\underline{६०}

\underline{४८}

१२

अध्याय ३६

केवल कुण्डली पर से जन्म समय मास-पक्ष आदि का ज्ञान

केवल कुंडली चक्र किसी का देख कर उस जातक की आयु, जन्म मास, अयन, ऋतु, पक्ष, जन्म तिथि, नक्षत्र, योग, करण, जन्म दिन में या रात में हुआ, जन्म का समय आदि स्थूल रूप से जान सकते हो। इन सबको जानने की रीति पृथक २ समझाते हैं।