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सचित्र ज्योतिष शिक्षा (प्रारम्भिक ज्ञान खण्ड) भाग १

Sachitra Jyotisha Shiksha (Prarambhika Gyan Khand) Vol 1

बाबूलाल ठाकुर द्वारा

स्रोत: Motilal Banarsidass Edition · Motilal Banarsidass, Delhi (उद्गम)

DevanagariHindipublished288 पृष्ठ

केवल कुंडली पर से जन्म समय मास-पक्ष आदि का ज्ञान : २१७

(१) वर्ष ज्ञान—

कुंडली में शनि की राशि और वर्तमान सम्बत् में शनि की राशि देखो। शनि॥ वर्ष में एक राशि पूरी करता है। कुण्डली की शनि की राशि से शनि की वर्तमान राशि तक गिन कर २॥ से गुणा करो तो गत आयु आयगी। वर्तमान सम्बत् में वह संख्या घटा दो तो लगभग जन्म का सम्बत् निकल आवेगा। शनि लगभग ३० वर्ष में १२ राशि घूम लेता है। इसके भीतर की आयु इससे प्रगट हो जायगी। यदि जातक देखने में ३० से अधिक आयु का जान पड़े तो शनि के फेरे के अनुसार ३०-३० वर्ष जोड़ते जाय तो आयु निकल आयगी। इस कारण पहिले देखकर अनुमान लगा लेना चाहिए कि कितनी आयु होगी और शनि के कितने फेरे हो गये होंगे। यदि जातक पास नहीं है तो पूछ सकते हो कि जातक बाल, युवा, अर्धेड़ या वृद्ध है तब जन्म समय बताना।

इस कुण्डली में शनि सिंह का है। सम्बत् २००० में वृष का शनि है। सिंह के आगे कन्या से वृष तक गिना ९ राशि हुई ९ × २॥ = २२॥ वर्ष हुए। अब इस का आयु २२॥ वर्ष या २२॥ + ३० = ५२॥ वर्ष, या ५२॥ + ३० = ८२॥ वर्ष की होगी। अब जातक को देखकर आयु का अनुमान कर बता दो। या पूछने से

प्रगट हुआ कि अर्धेड़ से और कुछ उमर हो गई है तो ५२॥ वर्ष की आयु होगी। इसे इण्ट सम्बत् में घटाया (सम्बत् २०००—५२३=१९४७ आया) तो कह सकते हैं कि सम्बत् १९४७ के लगभग का जन्म होगा। इसमें एकाध वर्ष का अन्तर पड़ सकता है।

इसी प्रकार कुंडली में गुरु की राशि से इस समय के गुरु की राशि तक गिन कर आयु जान सकते हो। गुरु १२ वर्ष में पूरा भगन (१२ राशि) घूम लेता है। १ महीने में १ राशि घूमता है।

कुंडली में गुरु मकर का था। सम्बत् २००० में मिथुन का गुरु है। मकर के आगे कुम्भ से गिना मिथुन तक ५ राशियाँ हुई=५ वर्ष। शनि के साथ ही साथ इस का विचार करना चाहिए। जैसे शनि से तो ५२॥ वर्ष की आयु निकली थी तो इस में गुरु के ४ फेरे हो चुके। ४ आवृत्ति × १२ वर्ष=४८ वर्ष + ५ वर्ष=५३ वर्ष वर्तमान सम्बत् तक आया। सम्बत् २००० सम्बत् १९४७ का जन्म निकालना है। अब इस में इन के अंशों—५३ का विचार करो तो और भी ठीक हिसाब आयु का जम

२१८ : सचित्र ज्योतिष शिक्षा, प्रारम्भिक ज्ञान खण्ड

जाता है। १९४७में जन्म के समय गुरु १४ वंश पर है अर्थात् आधी राशि भुक्त हो चुकी है तो ५३ में आधा वर्ष घटा दिया तो वही ५२॥ वर्ष आ जाते हैं।

इसी के साथ २ राहु का भी विचार करना चाहिए। राहु सदा बकी रहता है और १८ वर्ष में पूरा भ्रमर घूम लेता है। कुण्डली के राहु से वर्तमान राहु तक उल्टे क्रम से गिनो, जो संख्या हो उसे १॥ से गुणा करो, क्योंकि राहु १॥ वर्ष में १ राशि पार करता है। जो गुणन फल आवे उस पर से आयु विचारना।

जैसे कुण्डली में राहु मियुन का है सम्बत् २०००में कर्क का है। मियुन से उल्टे क्रम से आगे वृष फिर मेष आदि गिना तो ११ राशि हुई। ११ X १॥ = १६३ वर्ष + ३६ वर्ष ( राहु के २ फेरा ) = ५२१॥ वर्ष आयु। यदि कुण्डली में ग्रह स्पष्ट दिये हों तो इन ग्रह के अंशों पर से ठीक विचार करने पर आयु का हिसाब ठीक जम सकता है।

जिस सम्बत् की आयु कुण्डली देखकर अनुमान करने से निकले उस वर्ष का पंचांग ( यदि पुराने पंचांग पास हों तो ) या एकाध वर्ष आगे पीछे का पंचांग देखो। जिसमें ग्रहों की ठीक स्थिति कुण्डली के अनुसार मिले ठीक उसी समय का जन्म जानना।

(२) कुण्डली से अयन जानना

अयन—मकर के सूर्य के कुछ पहिले उत्तरायण और कर्क के सूर्य के कुछ पहिले दक्षिणायन होता है। कुण्डली में जिस राशि का सूर्य हो उससे जन्म समय का अयन जानना

जैसे कुण्डली में मीन का सूर्य है तो उत्तरायण जानना और उस जातक का जन्म उत्तरायण में हुआ है कहना।

(३) जन्म की ऋतु और मास जानना

जन्म मास—सूर्य की राशि से चन्द्रमास का अनुमान इस प्रकार करना सूर्य की

राशि मेष वृष मियुन कर्क सिंह कन्या तुला वृश्चिक धन मकर कुंभ मीन मास वैशाख ज्येष्ठ असाढ़ श्रावण भादों कुआँर कार्तिक अगहन पूस माघ फागुन चैत जैसे मीन का सूर्य कुण्डली में है तो चैत्र में जन्म हुआ होगा।

(४) ऋतु

चन्द्र मास के अनुसार इस प्रकार ऋतु होती हैं—

ऋतुवसन्त १शीत २वर्षा ३शरद ४हेमन्त ५शिशिर ६
मासचैत्रजेठसावनकुआँरअगहनमाघ
वैशाखअसाढ़भादोंकार्तिकपुसफागुन

सूर्य मीन का होने से चैत्र मास हुआ। चैत्र में वसन्त ऋतु होती है। इस कारण जातक का जन्म वसन्त ऋतु में हुआ है कहना।

केवल कुण्डली पर से जन्म समय मास-पक्ष आदि क' ज्ञान : २१९

(५) जन्म का पक्ष जानना

कुण्डली में ७ राशि के भीतर चन्द्र हो तो शुक्ल पक्ष और ७ राशि के बाहर चन्द्र हो तो कृष्ण पक्ष जानना ।

जैसे ऊपर कुण्डली में मीन का का सूर्य है और चन्द्र कुम्भ का है । मीन गिना तो ७ राशि कन्या हुई । इसके आगे कुम्भ का चन्द्र है, इससे ज्ञान पड़ा कि सूर्य से चन्द्र ७ राशि के बाहर है, इस कारण ज्ञातक का जन्म कृष्ण पक्ष होगा कहना ।

(६) जन्म की तिथि जानना

कुण्डली में जहाँ सूर्य हो वहाँ अमावस्या जानो, क्योंकि अमावस्या को सूर्य और चन्द्र एकत्र रहते हैं । उसके आगे जैसे जैसे तिथि बढ़ती है, चन्द्रमा आगे बढ़ते जाता है । इस कारण कुण्डली में देखो चन्द्र कहाँ है और सूर्य से कितने घर के अंतर पर चन्द्र है । एक कोठे में ( १ राशि में ) २॥ तिथि के हिसाब से तिथि होती है । क्योंकि मोटे हिसाब से चन्द्र ३० दिन में १२ राशि घूमता है तो १ राशि में २॥ दिन पड़ा । १ दिन में १ तिथि होती है इस कारण १ राशि में २॥ तिथि होती है ।

यहाँ पर कुण्डली में मीन का सूर्य है और चन्द्र कुम्भ का है । दोनों के बीच ११ राशि का अन्तर हुआ । ११ × २॥ = २२॥ तिथियाँ हुई । अमावस्या को ३० तिथि कहते हैं । ( २७॥ — १५ ) = शेष १२॥ तिथि । २७॥ में पूर्णिमा तक की १५ तिथि घटा दिया तो शेष १२॥ तिथि कृष्ण पक्ष की निकल आई । अर्थात् कृष्ण पक्ष की १३ तिथि का जन्म होगा ।

यदि चन्द्र और सूर्य के अंशों का विचार किया जाय तो और भी ठीक तिथि निकल आती है । यहाँ सूर्य मीन के ५° में हैं ( ११ रा-५° ) और चन्द्र कुम्भ के ३° ( १० रा-३° ) पर है अर्थात् लगभग बराबर अंश दोनों के हैं । जब सूर्य और चन्द्र के बीच १२° का अन्तर पड़ता है तो १ तिथि होती है । यहाँ दोनों का अन्तर निकाला ।

\begin{aligned} \text{सूर्य } ११ \text{ रा-} ५ \text{ अंश} &= \text{शेष } १ \text{ रा-} २^\circ \\ \text{— चन्द्र } १० \text{—} ३ &= ३२^\circ \div २१ \text{ अंश} \\ \text{शेष} &= १ \text{—} २ = २॥ \text{ लगभग तिथि} \end{aligned}

हुई अर्थात् २॥ तिथि चन्द्र और चलता तो अमावस्या हो जाती । इस कारण अमावस होने को २॥ तिथि शेष है । पूरी १५ तिथि से २॥ घटाये तो १२॥ तिथि हुई । अर्थात् १२ तिथि पूरी हो चुकी है तेरहवीं तिथि वर्तमान है तो जन्म कृष्ण पक्ष की १३ तिथि का हुआ ।

चन्द्र में से सूर्य घटाने से स्पष्ट तिथि ज्ञात होती है । यहाँ चन्द्र १०—रा०—३° में से सूर्य ११—रा०—५° घटाया तो शेष १०—रा०—५ अंश रहे, इसके ३२४° हुए । १२° की एक तिथि होती है, इसमें १२ का भाग दिया तो २७३° तिथि हुई । इसमें से १५ घटाया तो कृष्ण पक्ष की १२३° तिथि हुई तिथि अर्थात् जन्म तिथि १३ हुई ।

२२० : सचित्र ज्योतिष शिक्षा, प्रारम्भिक ज्ञान खण्ड

चन्द्र १०—रा०—३°१२ )३२८° ( २७
सूर्य ११—५२४
शेष १०—२८८८
८४

यदि सूर्य के आगे चन्द्र ७ घर के भीतर है तो समझना अमावस्या को पार कर चन्द्र आगे बढ़ रहा है और अमावस्या के आगे शुक्ल पक्ष की तिथि आरम्भ हो गई है। सूर्य के ठीक सममुख सातवें घर में चन्द्र हो तो पूर्णिमा समझना। इसके आगे चन्द्र जाने पर कृष्ण पक्ष का आरम्भ होता है और चन्द्र जब सूर्य के पास आ जाता है तो अमावस्या होती है।

(७) कुण्डली से जन्म का वार जानना

कुण्डली से जो जन्म का मास जान पड़े चैत्र शुक्ल प्रतिपदा से गिन कर ढेढ़ गुना करो। गत पक्ष के दिन जोड़ कर ७ का भाग दो। जो शेष रहे उसे जन्म वर्ष के राजा से गिन कर जन्म का वार कहना। पहले बता चुके हैं कि चैत्र शुक्ल १ तिथि को जो वार होता है वही उस वर्ष का राजा कहलाता है। वर्ष के राजा का चक्र पहिले दे चुके हैं। जैसे जन्म चैत्र कृष्ण १३ का है जैसा ऊपर निकाल चुके हैं। चैत्र शुक्ल १ से फागुन कृष्ण ३० तक ११ महीने हुए। ११ × ११ = १२१। दिन + फागुन शुक्ल पक्ष के १५ दिन + और चैत्र कृष्ण १३ तक गत दिन १२ हुए। १२१ + १५ + १२ = ४३१। ÷ ७ शेष ११। बचा। इस वर्ष का राजा सोमवार था तो सोमवार से ११ गिना, मंगलवार हुआ। जन्म दिन मंगलवार कहना।

(८) कुण्डली से जन्म नक्षत्र जानना

कुण्डली में जो जन्म मास निकले कार्तिक से उस मास तक गिन कर दूना करो और गत पक्ष के दिन भी जोड़ कर एक और मिला दो। इसमें २७ का भाग दो, शेष जो बचे अश्विनी से गिन कर नक्षत्र जानना।

जैसे कुण्डली से प्रगट हुआ चैत्र का जन्म है तो गत मास फागुन हुआ। कार्तिक को १ गिना। इस प्रकार कार्तिक से फागुन तक गिना ५ मास हुए। ५ × २ = १० + गत १३ + १ = १० + १४ = २४, अश्विनी से गिना चौबीसवाँ नक्षत्र शतभिषक का जन्म हुआ।

(९) कुण्डली से जन्म का योग जानना

पुष्प नक्षत्र से सूर्य नक्षत्र तक गिनो और श्रवण नक्षत्र से चन्द्र नक्षत्र तक गिनो। दोनों संख्या जोड़कर २७ का भाग दो, जो शेष बचे उसी क्रम से गिन कर योग जानना।

केवल कुण्डली पर से जन्म समय मास-पक्ष आदि का ज्ञान : २२१

सूर्य चन्द्र की राशि अंश पर से पहले बताये होइ। चक्र में दिए हुए अंशों पर से इनका नक्षत्र जान सकते हो जैसा सूर्य ११-२०-५° है अर्थात् मीन के ५° पर है। होइ। चक्र में ११-२२-३°-२०° तक पूर्वा भाद्रपद का चौथा चरण दिया है। इष्ट सूर्य ११-२०-५° है इससे ज्ञात गया कि सूर्य पूर्वा भाद्रपद का चौथा चरण पार करके उत्तरा भाद्रपद नक्षत्र में गया है। उत्तरा भाद्रपद का पहिला चरण ११-२०-६-४० तक होता है, इस कारण सूर्य जन्म समय उत्तरा भाद्रपद नक्षत्र पर था।

पुष्य नक्षत्र से उत्तरा भाद्रपद ( सूर्य नक्षत्र ) तक गिना १९ हुए। जन्म नक्षत्र ( चन्द्र नक्षत्र ) शतभिषक है ( ऊपर निकाल चुके हैं )। श्रवण से चन्द्र नक्षत्र शतभिषक तक गिना ३ हुए। १९+३=२२ वां योग=साध्य योग आया। यदि योग २७ से अधिक आवे तो २७ का भाग देने पर जो शेष रहता उसे लेते। यहाँ जन्म का योग साध्य निकला।

(९०) कुण्डली से जन्म का कारण जानना

कुण्डली में जो जन्म की तिथि मिले उस तिथि तक शुक्ल प्रतिपदा से गिनो और उस संख्या में २ का गुणा कर १ घटाकर ७ का भाग दो जो शेष बचे वही कारण पराद्ध में जानना।

स्थिर करण। शुक्ल प्रतिपदा के पूर्वार्द्ध में किस्तुन्न और पराद्ध में बव, कृष्ण १४ को, पराद्ध में शकुनि। अमावस्या के पूर्वार्द्ध में शकुनि। अमावस्या के पूर्वार्द्ध में चतुष्पद और पराद्ध में नाग सदा रहते हैं। यदि इनमें से कोई तिथि का जन्म हो तो इसी के अनुसार करण जानना। शेष का उपरोक्त रीति से जानना।

जैसे कृष्ण १३ का जन्म है। शुक्ल प्रतिपदा से पूर्णिमा तक १५ दिन कृष्ण पक्ष के १३ दिन। १५+१३=२८ X २=५६-१=५५-७=शेष ६। छठा करण बणिज हुआ। यह त्रयोदशी के पराद्ध में हुआ। इसके पूर्वार्द्ध में इसके पहिले का अर्थात् पांचवा गर करण जानना।

इतनी खटपट न करके पहिले जो करण चक्र दे चुके हैं उससे इष्ट तिथि का ठीक करण जान सकते हो।

(९१) दिन या रात का जन्म है कुण्डली देखकर जानना

कुण्डली में जहाँ सूर्य हो वहाँ से जन्म लगन ६ घर के भीतर हो तो दिन का जन्म कहना और सातवें स्थान में हो तो संध्या का जन्म, ७ से १२ स्थान तक लगन हो तो रात्रि का जन्म कहना। लगन में सूर्य हो तो प्रातःकाल का जन्म, दशम में सूर्य हो तो दोपहर का जन्म और चतुर्थ में सूर्य हो तो अद्वैरात्रि का जन्म कहना जैसा यहाँ सूर्य के समय चक्र में बताया गया है। लगन कुण्डली देखा तो सूर्य दशम स्थान

२२२ : सचित्र ज्योतिष शिक्षा, प्रारम्भिक ज्ञान खण्ड

सूर्य का समय चक्र

में है यहाँ से लग्न चौथे घर में है अर्थात्‌ ६ घर के भीतर ही है, इस कारण दिन

का जन्म कहना । सूर्य दशम स्थान में है जिससे प्रगट होता है कि मध्याह्ञं काल का

जन्म है ।

(१२) कुण्डली से जन्म समय जानना

ऊपर जो सूर्य का समय चक्र दिया है उसमें केन्द्र में सूर्य रहने से जो समय होता

है वतला दिया गया है। अब उनके बीच के स्थान से भी समय जानना बतलाते हैं ।

दिन रात की ६० घड़ी में सूर्य, कुण्डली में १२ राशि ( लग्न के अनुसार ) घूम

लेता है । १ राशि में ५ घड़ी या २ घण्टा पडा ।

कुण्डली में सूर्य से लग्न जितने घर दूर हो उसका ५ गुना करो तो इष्ट काल की

घडी निकल आयगी ।

अपनी कुण्डली में सूयं दशम भाव में है वहाँ से लग्न ३ घर अन्तर पर है । ३०८५

-१५ घड़ी अपना इष्ट हुआ । अर्थात्‌ कुण्डली से प्रगट हुआ कि जातक का जन्म

लगभग १५ घडी इष्ट पर हुआ होगा ।

यहां ध्यान रहे कि १ राशि में ३०° होते हँ। ३०० में ५ घडी का अन्तर पडता

है तो ६? में १ घड़ी या १? में १० पल का अन्तर पड़ता है । सूर्य से लग्न जितने

राशि अश के आगे है देख कर इष्ट घडी का विचार कर लो । जसे सूर्य ११ रा ४५? ( मीन के ५० ) पर और लग्न २ रा २२° ( मिथुन के २२ अश) पर है तो सूर्य

को आगे २५ अश और चलना पड़ेगा तव मीन राशि का अन्त होगा । इस कारण

(२ रा २२अ ) रूग्त११ ( ० रा २५ अश )-३ रा १७ अ श= यह सूर्य और

लग्न का अन्तर हुआ। ३ राशि 5 (३३४५ ) 5१५ घड़ी और १७ अंश = ( १७३८ १० ) = १७० पल = २ घ. ५० प. । सब मिल कर १७ घड़ी ५० पल के

लगभग इष्ट हुआ । यह जन्म का इष्ट हुआ । परन्तु यह भी स्थूल मान है इसका

ध्यान रहे ।

ग्रहों का बल विचार : २२३

कुण्डली पर से जन्म समय आदि का ज्ञान कैसे किया जाता है यह बता चुके। इस पर से जान सकते हो कि यह कुण्डली चक्र कितने महत्त्व का है और इस कुण्डली चक्र से कितनी महत्वपूर्ण बातें जानी जा सकती हैं। जिसके पास कुण्डली है और वह शुद्ध बनाई गई है तो उससे जन्म समय के सम्बन्ध की बहुत सी उपयोगी बातों का ज्ञान हो सकता है। इस कारण जितनी शुद्धता पूर्वक कुण्डली तैयार की जायगी उतना शुद्ध फल निकलेगा।

यहाँ केवल प्रारम्भिक ज्ञान करने के निमित्त ही कुंडली सम्बन्धी सम्पूर्ण बातें स्थूल रूप से बता दी गई हैं। इससे स्थूल रूप से कुण्डली बनाना आ जायगा और फल विचारने का अनुभव बढ़ेगा।

सूक्ष्म रूप से गणित द्वारा कुंडली आदि तैयार करना और तत्सम्बन्धी पूरा गणित खण्ड में उदाहरण देकर समझाया गया है, जिससे इतना ज्ञान होने के उपरान्त आगे की सब बातें सरलता पूर्वक समझ में आने लगेगी।

अध्याय ४०

ग्रहों का बल विचार

कुण्डली में सब ग्रहों में कौन बलवान है कौन बलहीन है यह जानने की आवश्यकता पड़ती है। इस कारण ग्रहों के बल का विचार करना संक्षेप में बतलाते हैं।

ग्रहों का बल ६ प्रकार से विचारते हैं और उन सबको मिलाकर प्रत्येक ग्रह के बल का विचार करते हैं। क्योंकि बलवान ग्रह पूर्ण फल देता है। बलहीन ग्रह फल देने में असमर्थ होता है। ग्रहों का बल ६ प्रकार का है।

( १ ) स्थान बल, ( २ ) दिग्बल, ( ३ ) कालबल, ( ४ ) चेष्टा बल, ( ५ ) नैसर्गिक बल, ( ६ ) दृग् बल।

( १ ) स्थान बल—५ प्रकार के बल के योग से यह बल बना है।

( १ ) उच्च बल, ( २ ) सप्तवर्गी बल, ( ३ ) युग्मायुग्म बल, ( ४ ) द्वेष्काण बल, ( ५ ) केन्द्रादि बल।

( १ ) उच्च बल—जो ग्रह अपने उच्च में होता है वह पूर्ण बली होता है। जो अपने नीच में होता है वह शून्य बली होता है। इसके बीच में ग्रह हो तो अनुपात से बल निकालना पड़ता है।

( २ ) सप्तवर्गी बल—ग्रहों के गृह, होरा, द्वेष्काण आदि सप्तवर्गीबल साधन करना गणित खण्ड में बताया है। जो ग्रह अपने मिश्र के घर में अपने मूल त्रिकोण

२२४ : सचित्र ज्योतिष शिक्षा, प्रारम्भिक ज्ञान खण्ड

या स्वगृह में होता है वह बली होता है। शत्रु के स्थान में होता है उसका वल घट जाता है।

( ३ ) युग्मायुग्म वल—सम राशि स्त्री संज्ञक होती है। चन्द्र व शुक्र ग्रह स्त्री ग्रह है। स्त्री राशि में स्त्री ग्रह हो तो बलवान होता है। विषम राशि पुरुष ग्रह है, उपयुक्त ग्रहों को छोड़कर शेष ग्रह पुरुष हैं। इनमें नपुंसक ग्रह भी पुरुष में शामिल हैं। पुरुष राशि में पुरुष ग्रह बलवान होते हैं। राशि स्त्री है या पुरुष राशि गुणधर्म चक्र में दिया है। ग्रह का लिंग, ग्रह गुण धर्म चक्र में दिया है।

( ४ ) द्वेष्काण वल—एक राशि के ३ भाग करने से प्रत्येक भाग की द्वेष्काण संज्ञा होती है। पहिले द्वेष्काण में पुरुष ग्रह बली होता है। अन्त के द्वेष्काण में स्त्रीग्रह और मध्य के द्वेष्काण में नपुंसक ग्रह बली होता है।

( ५ ) केन्द्रादि वल—केन्द्र में ग्रह पूर्ण बली होता है। पणफर में मध्यम अर्थात् आधावल, आपोविलम में चौथाई वल होता है। केन्द्रादि भाव संज्ञा पहिले समझा चुके हैं।

इन सबके वल का योग करने से ग्रह के स्थान सम्बन्ध से वल का पता लगता है, इस कारण इसे स्थान वल कहते हैं।

दिग्वल—यह अकेला ही है। इसमें दिशा के अनुसार ग्रहों का वल निकालते हैं। जैसे लन्म ( पूर्व ) में बुध और गुरु बली होते हैं। सप्तमभाव ( पश्चिम ) में, शनि बली होता है। चतुर्थभाव ( उत्तर ) में शुक्र और चन्द्र बली, दशम भाव ( दक्षिण ) में सूर्य बलवान होता है। इनसे सातवें घर में ये ग्रह हीन वल होते हैं। जैसे सूर्य दशम भाव अर्थात् सिर पर जब होता है तब बलवान होता है, पाताल ( चतुर्थ भाव ) में बलहीन होता है वीच का वल अनुपात से निकाला जाता है। भाव की दिशायें पहले समझ चुके हैं।

३ काल वल—४ प्रकार का वल मिलाकर काल वल बनता है।

( १ ) नतोनन्त वल, ( २ ) पक्ष वल, ( ३ ) दिन रात्रि त्रिभाग वल ( ४ ) वर्षादि वल।

( १ ) नतोनन्त वल—चन्द्र मंगल शनि रात्रि में बली, अर्द्ध रात्रि में पूर्ण बली, सूर्य शुक्र गुरु दिन में बली, मध्याह्न में पूर्ण बली, और बुध सदा बली रहता है।

जो मध्याह्न में पूर्ण बली होते हैं वे अर्द्धरात्रि में बलहीन हो जाते हैं, और जो अर्द्ध रात्रि में बली होते हैं वे मध्याह्न में बलहीन हो जाते हैं, इसमें भी वीच के समय का वल अनुपात से ( गणित द्वारा ) निकाला जाता है।

( २ ) पक्षवल—पापग्रह—सूर्य, मंगल, शनि, कृष्णपक्ष में बली।

शुभग्रह—चन्द्र, गुरु, शुक्र, बुध, शुक्ल पक्ष में बली।

( ३ ) दिन रात्रि त्रिभाग वल—दिन के और रात के पृथक्कर, भाग ३, करना।

दिन के प्रथम भाग में बुध, द्वितीय में सूर्य-तृतीय में शनि बली।

रात्रि के “ चन्द्र “ शुक्र, “ मंगल “

ग्रहों का बल विचार । २२५

गुरु ( दिन और रात्रि में ) सदा बली होता है ।

इससे देखा जाता है कि दिन या रात्रि में जन्म हुआ है और दिन या रात्रि के कौन से भाग में जन्म हुआ है । जिस भाग में जन्म हुआ है उस भाग का सूचक ग्रह बली होगा । शेष ग्रह बलहीन होंगे ।

( ४ ) वर्षादि बल—जिस होरा में किसी का जन्म हो उस होरा स्वामी का बल डू मिलेगा और जिस मास में जन्म हो उस मास स्वामी का बल डू ( आधा ) और वर्ष के स्वामी का बल डू मिलता है । इनको छोड़कर और दूसरे ग्रहों को बल नहीं मिलता ।

( ४ ) चैष्ठा बल—उत्तरायण ( १०, ११, १२, १, २, ३ राशि के सूर्य में ) चन्द्र और सूर्य चैष्ठा बल पाता है और भीमादि ग्रह चन्द्र समागम होने से या बक होने से चैष्ठा बली होते हैं । और यदि ग्रह युद्ध हुआ तो जो ग्रह जीतता है वह चैष्ठा बली होता है ।

( ५ ) नैसर्गिक बल—रवि, चन्द्र, शुक्र, गुरु, बुध, मंगल और शनि ये ग्रह शनि से उल्टे क्रम से एक दूसरे के बली होते हैं अर्थात् शनि सबसे कम बल पाता है, उससे बली मंगल, मंगल से बुध बली, बुध से गुरु बली, गुरु से शुक्र बली, शुक्र से चन्द्र बली और चन्द्र से सूर्य बली होता है । सूर्य सबसे बली होता है और ऊपर बताये क्रम से ग्रह एक दूसरे से बल में हीन होते हैं ।

( ६ ) दूग् बल—जिस प्रकार ग्रहों की दृष्टि ग्रह या भाव पर पड़ती हो उसका दृष्टि चक्र बनाना पहले बता चुके हैं, उसी प्रकार अपनी कुण्डली देखकर ग्रहों की दृष्टि का चक्र बनाया जाता है, जिससे प्रगट होता है कि किस ग्रह पर किस किस ग्रह की दृष्टि है । फिर उसमें विचारते हैं कि उस ग्रह पर कितने पाप ग्रहों की और कितने शुभ ग्रहों की दृष्टि है । सर्व शुभ ग्रह की दृष्टि का योग कर उसका चतुर्थांश निकालते हैं और शुभ योग चतुर्थांश से पाप योग चतुर्थांश घटाने से जान पड़ता है पाप दृष्टि अधिक है या शुभ दृष्टि अधिक है शुभ दृष्टि अधिक हो तो अच्छा और पाप दृष्टि अधिक हो तो बुरा समझा जाता है ।

ऊपर जो ग्रह का बल विचार करना बताया गया है वह बल गणित से निकाला जाता है फिर प्रत्येक ग्रहों के बल को जोड़ कर देखा जाता है कि कौन ग्रह कितना बलवान है । ग्रह जितना बली होगा उतना ही फल देगा । बलहीन ग्रह फल नहीं देता उल्टे हानि करता है । इस कारण बल का विचार किया जाता है ।

बल-निकालने का पूरा गणित उदाहरण सहित गणित खण्ड में दिया है । यहाँ प्रारम्भिक ज्ञान के निमित्त ही बल का वर्णन किया गया है ।

१५

२२६ । सचित्र ज्योतिष शिक्षा, प्रारम्भिक ज्ञान खण्ड

अध्याय ४१

च नक्षत्र गुण-थम

क्रम नक्षत्र वर्ण वश्य योनि गण नाडी वर लोचन मुख नाम

( योनि नेत्र )

१ अश्वि. क्षत्रिय चतुष्पद अश्व देव आदि भैंस मंद तियंक्‌ लघु

२ भरणी „ » गज मनुष्य मध्य सिंह मध्य अधो उग्र

३ कृतिका क्ष१ » छाग राक्षस अन्त वानर सुलो. अधो मिश्र

वेश्य ३

४ रोहिणी वंश्य २ „ सपं मनुष्य अन्त नकुल मंद ऊध्वं झव

५ मृग० वैश्य २ चतुः २ सपे देव मध्य नकुछ मंद तिर्यक्‌ मृदु

शूद्रर नरर

६ आर्द्र शूद्र नर श्वान मनुष्य आदि हरिण मध्य ऊध्वे तीक्षण

७ पुनश शूद्र नर मार्जार देव आदि उन्दुरु सुळो० तिर्यक चर

न्रा १ जळ १

८ पुष्य ब्राह्मण जलचर छाग देव मध्य वानर अंध ऊर्ध्वं लघु

९ आश्ले० ,, „ मार्जारराक्षस अन्त उन्दुरु मंद अधो तीक्ष्ण

१० मघा क्षत्रिय चतुष्पद मूषक ,, » मार्जारमध्य , उम्र

११ पू० फा० ,, 1 १ मनुष्य मध्य . सुलो ,, र

१२ उ० फा० क्ष» १ चतु०१ गौ मनुष्य आदि व्याघ्र अन्ध ऊध्वं धुव

वैश्य ३ नर० ३

१३ हस्त वैश्य नर महिष देव आदि अश्व मन्द तिर्यक लघु

१४ चित्रा वैश्य २ नर व्याध राक्षस मध्य गाय मध्य र मई

शूद्र २ १५ स्वाती शूद्र नर महिष देव अन्त अश्व सुलो० तियॅक चर

१६ विशाखा शूद्र ३ नर व्याघ्र राक्षस » गाय अन्त अधो मिश्र

ब्रा० १ कीट १

१७ अनु० ब्राह्मण कीट मृग देव मध्य इवान मध्य तियेंक मूदु

बृष ज्ये”. , » » राक्षस आदि ,, मध्य » तीक्ष्ण

१९ मूल क्षत्रिय नर शवान » „ हरिण सुलो« अधो „»

२० पूषा क्षत्रिय नर ॥ मकंट मनुष्य मध्य मेढा अन्ध अधो उम्र

चतु०३॥

२१ उ. षा. क्ष० १ चतुष्यदनकुळ मनुष्य अन्त सपं मन्द ऊध्वं ध्रुव

वेश्य ३

नक्षत्र गुण धर्म : २२७

२२ अश्वि.नकुल मनुअस्तसर्पमध्यलघु
२३ श्रवणवैश्यचतु.१॥मर्कट देवमेढ़ासुलो.ऊर्ध्वचर
जल. २॥
२४ धनि.वैश्य२ जल२ सिंहराक्षसमध्यगजअन्धऊर्ध्व चर
शुद्ध२ नर
२५ शत.शुद्धनरअश्वराक्षसआदिअस्तमन्दऊर्ध्व चर
२६ पू. भा.शुद्ध३ नर३ सिंहमनुष्यआदिगजमध्यऊर्ध्व उग्र
ब्रा. १जल
२७ उ. भा.ब्राह्मणजलचरगौमनुष्यमध्यव्याघ्रसुलो.ऊर्ध्व घुव
२८ रेवतीब्राह्मणजलचरगजदेवअस्तसिंहअन्धतिर्यक भुद्र

इन नक्षत्र गुण धर्म चक्र में दिये हुए वर्ण वश्य योनि गण और नाडी का विवाह आदि में विचार किया जाता है। संक्षिप्त जन्म पत्रिका (टिप्पणी) में ये सब लिखना पड़ता है। इस कारण यहाँ चक्र में दिया है।

वर्ण में कृषिका नक्षत्र में क्षत्रिय १, वश्य दिया है। इसका अर्थ यह है कि नक्षत्र में ४ चरण होते हैं, उनमें पहिला १ चरण में क्षत्रिय और अस्त में शेष ३ चरण में वैश्य वर्ण होता है। आगे भी इसी प्रकार का विचारना। जिसमें एक ही वर्ण दिया है वहाँ चारों चरण में एक ही वर्ण समझना। इसी प्रकार वश्य में भी समझना। जैसे मृगशिर में वश्य में पहिले २ चरण में चतुष्पद और अस्त के २ चरण में नर समझना।

वश्य में चतुष्पद=चौपाया, नर=द्विपद=मनुष्य। कीट=नीड़े=रेंगने वाले बिना पैर के ( अपद ) जलचर=जल में चलने वाले जीव।

योनि—छाया=वक्रा या मेढ़ा। माजार=बिल्ली। महिष=मँस। श्वा=कुत्ता, मर्कट=वन्दर, वानर। उंडुख=बूहा, मूषक। गौ=शाय। नकुल=म्योला। व्याघ्र=बाघ, शेर। अश्व=घोड़ा। गज=हाथी।

लोचन—कोई वस्तु खोई हो उसके विचार में काम आता है। सु=सुलोचन। मुख=तिर्यक=तिरछा। अघो=उलटा, अंधा। ऊर्ध्व=चित।

नक्षत्र नाम—इन नक्षत्रों के नाम के अनुसार कार्य करने में शुभ होता है।

अध्याय ४२

संक्षिप्त जन्मपत्री बनाना

किसी बालक का जन्म समय बतला कर संक्षिप्त जन्म पत्रिका बनाने को कहा जावे तो कैसे बनाना यहाँ समझाते हैं।

मान लो बालक का जन्म नरसिंहपुर में तारीख २-१०-१९३६ ई० के १० बजे दिन हुआ है। इसकी जन्म-पत्री बनानी है।

२२८ : सचित्र ज्योतिष शिक्षा, प्रारम्भिक ज्ञान खण्ड

उस सन् का पंचाङ्क देखो। कर्मवीर पंचाङ्क जबलपुर का सम्बत् १९९५ का मिला, उसे देखा। आश्विन शुक्ल ९ रविवार सम्बत् १९९५ शाका १८६०, तारीख के अनुसार मिला।

आश्विन शुक्ल पक्ष तिथि ९ रविवार ६० व. ० प., नक्षत्र पू०षा० २७-४५, शोभन योग ३-४६, उपरान्त अतिगंड योग, बालव कारण २९-१, विनमान २९-३२, मिथमान ४५-५२ का मिथकालीन सूर्य ५ रा, १५ अंश २९'-३६" दिया है। चन्द्र मकर का ४४-२१ उपरान्त होगा।

उपर्युक्त तिथि आदि जबलपुर की है। वहाँ से नरसिंह पुर का देशान्तर ४ मिनट पश्चिम=१० पल है। पश्चिम होने से उपर्युक्त मान से घटाना पड़ेगा। इसमें फल छोड़ देते हैं, क्योंकि चर संस्कार आदि का ज्ञान अभी नहीं कराया गया है। इस कारण अभी कुछ कठिनाई मालूम पड़ेगी। यह विषय गणित खण्ड में विस्तार पूर्वक उदाहरण देकर समझाया गया है। अभी काम चलाने को स्थूल रूप से ही टिप्पणी तैयार करते हैं।

इष्ट साधन

| घं० | मि० | घड़ी | पल ---|---|---|---|--- जन्म | १० | ० (दिन को) | ३ घं०=७ | २० सूर्योदय | ६ | ६ (पंचाङ्क के अनुसार) | ५४ मि०=२ | १५ शेष= | ३-५४ | =९० घ ४५ प. इष्ट। | योग= ९-४५ | इष्ट हुआ

रविवार को पूर्वाषाढ़ा नक्षत्र १७-४५ है। पंचाङ्क में देखो यह नक्षत्र इसके पहिले शनिवार को कितना था। शनिवार को मूल नक्षत्र २१ घ० ३३ प० दिया है।

| घ० | पल | | घ० | प० ---|---|---|---|---|--- पूर्ण घटी | ६०-० | | शनिवार को पू. वा. | ३८-२७ | भुक्त मूलनक्षत्र | २१-३३ (शनिवार को) | + | रविवार को पू. वा. | २७-४५ | शेष | =३८-२७ | शनिवार को | | योग ६६-१२ |

यह पूर्वाषाढ़ा वचा

भभोग पूर्वाषाढ़ा का

शनिवार को पूर्वाषाढ़ा | ३८-२७ | या | पूर्ण पूर्वाषाढ़ा=६६-१२ | ---|---|---|---|--- + रविवार को इष्ट काल | ९-४५ | ∴ | १ चरण=६६-१२ = घ० | पल ∴ भुक्त पूर्वाषाढ़ा | ४८-१२=भयात | | ४ | १६ ३३

शनिवार को मूल नक्षत्र २१-३३ भुक्त होने के बाद पूर्वाषाढ़ा लगा। शनिवार को पूर्वाषाढ़ा ३८-२७ रहा और रविवार को २७-४५ तक था। सब मिलकर पूर्वाषाढ़ा नक्षत्र का भोगकाल ६६-१२ हो गया। इसे भभोग या सर्वशं कहते हैं। भभोग का चौथाई भाग करने पर १ चरण का भोग निकलता है। भभोग ६६-१२ में ४ का भाग देने से १ चरण का भोग १६-३३ आया। अब देखना है कि अन्य समय

संक्षिप्त जन्मपत्री बनाना : २२९

अर्थात् इष्ट काल तक पूर्वाषाढ़ा कितना सूका हुआ था। शनिवार के शेष पूर्वाषाढ़ा में इष्ट काल जोड़ने से पूर्वाषाढ़ा का भुक्त काल ४८-१२ निकला। इसे भयात या भक्तर्ष कहते हैं।

अब देखना है पूर्वाषाढ़ा के कौन चरण का जन्म है। भयात में १ चरण घटाया तो शेष ३१-३९ बचे। दूसरा चरण घटाया तो शेष १५-६ बचे, अब तीसरा चरण नहीं घटाया तो तीसरे चरण का जन्म समझो।

| ष० | प० ---|---|--- भयात | ४८ | १२ १ चरण | १६ | ३३ शेष | ३१ | ३९ दूसरा चरण | १६ | ३३ घटाया शेष | १५ | ६

तीसरा चरण १६ ३१ नहीं घटता, इससे तीसरे चरण का जन्म हुआ।

पूर्वाषाढ़ा के तीसरे चरण में होड़ाचक्र के अनुसार नामाक्षर "फा" निकला। धनु राशि हुई। फा अक्षर पर से फतेहसिंह नाम रखा।

अब नक्षत्र गुण धर्म चक्र देखा।

पूर्वाषाढ़ा के तीसरे चरण में जन्म होने से—क्षत्रिय वर्ण, चतुष्पद वश्य, सर्कट योनि, मनुष्य गण, मध्य नाड़ी हुई। धन राशि है जिसका स्वामी गुरु हुआ।

अब लग्न कुण्डली बनाने के लिए पहिले लग्न निकालना है। लग्न निकालने को लग्नसारिणी देखी। सूर्य ५ रा १५° है अर्थात् कन्या के १५° पर है। सारिणी में कन्या के १५° के नीचे ३१-२५-१ दिया है। इसमें सारिणी अंक ३१-२५-१ इष्ट ९—४५ जोड़ा तो योग ४१—१०—१ हुआ। इसे सारिणी + इष्ट ९-४५-० में खोजा ४१-६-१२ तक वृश्चिक के ७° होते हैं और योग ४१-१०-१ ४१-१७-३२ तक ८° होते हैं अपना इष्ट युक्त सारिणी अंक दोनों के बीच में हैं। इस कारण लगभग ७।° वृश्चिक लग्न के आते हैं। वृश्चिक लग्न निकाली। अब वृश्चिक लग्न को बीच में रख कर कुंडली तैयार की। इस प्रकार कुंडली चक्र बन कर तैयार हुआ।

अब इसमें ग्रह भरने के लिए पंचाङ्ग देखा। पंचाङ्ग में अष्टमी का मिथमान ४५-५४ का ग्रह इस प्रकार दिया है। जन्म नवमी का है। इस कारण उसके समीप की पंक्ति (पंचाङ्ग के ग्रह) यही हैं।

२३० : सचित्र ज्योतिष शिक्षा, प्रारम्भिक ज्ञान खण्ड

पंक्ति सूर्य मंगल बुध गुरु शुक्र शनि राहु केतु ५-१४° ४-२१° ५-८° १०-५° ६-२३° १११४° ७-०°-२५' १-०°-२६'

अब पंचाङ्क में देखो कि पंक्ति से इष्ट काल तक कोई ग्रहों में परिवर्तन हुआ है क्या? अष्टमी के आगे नवमी के इष्ट काल तक पंचाङ्क में इन ग्रहों में कोई परिवर्तन नहीं दिया, इस कारण इसीके अनुसार अपनी कुण्डली में ग्रह स्थापित करेंगे।

सूर्य ५-४° है अर्थात् कन्या का है, मंगल-सिंह का, बुध-कन्या का, गुरु कुम्भ का, शुक्र तुला का शनि मीन का राहु वृश्चिक का, केतु वृष का है। इसी प्रकार कुण्डली में जहाँ इन राशियों के अंक हैं वहाँ ये ग्रह स्थापित करेंगे।

लग्नकुंडली

चन्द्रकुंडली

राशि पहिले ही जान चुके हैं धन राशि है अर्थात् धन राशि का चन्द्र है, इस कारण चन्द्र को धन राशि पर रखा। लग्न को बीच में लग्न स्थान पर रखकर जो कुण्डली बनाई जाती है वह लग्न कुण्डली है और चन्द्र राशि को बीच में (लग्न स्थान पर) रख कर जो कुंडली बनाई जाती है वह चन्द्र कुंडली है।

संक्षिप्त जन्मपत्री बनाना : २३१

अब इसी को लिखने की रीति आगे बताई गई है। पहिले मंगलाचरण में गणेश, ईश्वर आदि की बन्दना लिखने के उपरान्त ये सब बातें क्रमानुसार लिख दी जाती हैं।

श्री गणेशाय नमः

स जयति सिन्धुरवदना देवो, यत्पादपंकजस्मरणम् । वासरमणिरिव तमसां राशिं नाशयति विघ्नानाम् ॥ ब्रह्मा करोतु दीर्घायुः, विष्णुः कुर्यान्च संपदाम् । हरो रक्षतु गात्राणि, यत्स्थैषा जन्मपत्रिका ॥

अथास्मिन् शुभे विक्रमार्क सम्बत् १९९५, शालिवाहन शाके १८६०, सायन दक्षिणायने गते, शान्त्यगोले शरद्वती महामांगल्यप्रदे वासिवनमासे शुभे शुक्लपक्षे, तिथौ ९ घट्टचादिकम् ६०।० रविवासरे । पूर्वाषाढानक्षत्रे घटषः २०।४५, शोभननाम योगे घट्टचादिकं ३।४६ तनुपुत्र अतिगंडनामयोगे । बाल्यकरणे घटषः २९।१ एवं पंचाङ्गं शुद्धिः । तथ दिवप्रमाणं घटषः २९।३२ रात्रिप्रमाणं घटषः ३०।२८ श्रीसूर्योदयादिवत्स-घट्टचादिकं ९।४५ कन्याकं गतांशाः १५ । वृश्चिकलने गतांशाः ७ । एवम् शुभग्रहा-वलोकिन्यां कल्याणवतीवैलायां श्रीमतो नाभूरामसिंहस्य ठाकुरगृहे भार्या सौभाग्यवती अस्वा कुक्षेः पुत्ररत्नमजीजनत् ॥ तस्याभिधानं शतपदचक्रानुसारेण पूर्वाषाढावृत्योत्तरेण “क” काराक्षरे अकारस्वरे फतहसिंह इति प्रतिष्ठितम् । अस्य राशिः धनुः । स्वामी गृहः । क्षत्रिय वर्णः । चतुष्पद वश्यः, मर्कट योनिः मनुष्य गणः । मध्य नाडी । इत्यादि विवाहदो विचारणीयम् । अयं च कुलदेव्याः प्रसादात् दीर्घायुर्भूयात् ।

लमकुंडली

चन्द्रकुंडली

दूसरा प्रकार टिप्पणी (जन्म पत्री) लिखने का

श्रीगणेशाय नमः

श्रीसरस्वत्यै नमः

स जयति सिंधुरवदना देवो, यत्पादपंकजस्मरणम् । वासरमणिरिव तमसां, राशिं नाशयति विघ्नानाम् ॥

२३२ : सचित्र ज्योतिष शिक्षा, प्रारम्भिक ज्ञान खण्ड

आदित्याद्या ग्रहाः सर्वे सनसत्राः सराशयः ।

आयुः कुर्वन्तु ते सर्वे यस्याषा जन्मपत्रिका ॥

अथास्मिन् श्रीमन्सूत्रपतिक्रमादित्यराज्योदयात् गत्वाब्दाः श्री सम्बत् १९९५ शाके १८६० ॥ श्री सूर्ये दक्षिणायने ॥ शरद् ऋतौ ॥ मासानामुत्तमे आश्विनमासे ॥ शुभे शुक्लरक्षे ॥ त्रितीयं नवम्यां ॥ रविवारसरे ॥ षट्घादि ६०० ॥ पूर्वषाद्धानक्षत्रे षट्घादि २७।४५ ॥ योगननामयोगे षट्घादि ३।४६ ॥ तदनन्तरम् अतिपंडनामयोगे ॥ बालवकरणे २६।११ ॥ एवं पंचांगगुह्यावद्यदिने श्रीसूर्योदयादिष्टषट्घादि ९।४५ ॥ तत्समये वृश्चिकलग्नोदये श्रीठाकुरनाथूरामसिंहजी तस्य गृहे सौभाग्यवत्या भार्यायाः कुषी पुत्ररत्नमजीजनत् ॥ पूर्वषाद्धानक्षत्रस्य शुक्लक्षंषट्घादि ४।८१२ ॥ शोभ्यक्षंषट्घादि १८।० ॥ सर्वक्षंषट्घादि ६६।१२ ॥ अतः पूर्वषाद्धानक्षत्रस्य तृतीयचरणे जातत्वात् अवकहङ्गचक्रानुसारेण चि० फतेहसिंह नाम प्रतिष्ठितम् ॥ सच देवद्विज-प्रसादाद् दीर्घायुर्भवतु ॥ धन-राशिः ॥ क्षत्रिय-वर्णः ॥ चतुष्पद वश्यः ॥ मकट-योगिः ॥ मनुष्य गणः ॥ मध्य नाडी ॥ एतद्विवाहादौ विचारणीयम् ॥ वृश्चिकलग्नगतांशाः ७ ॥ कन्याकैर्गतांशाः १५ ॥ इयं जन्मपत्रिका जबलपुरस्य कर्मवीरपंचाङ्गानुसारेण निर्मिता ॥ आंगमतानुसारेण जन्मसमय १० वादने दिने ॥ दिनांक २।१०।१९३८ ईसवी ॥ शुभमस्तु ॥

अथ जन्मांगचक्रभिदम्

चन्द्रांगवक्रम्

कुण्डली के प्रकार

कुण्डली कई प्रकार की बनाई जाती हैं। उनके बनाने की भिन्न २ रीतियां आगे बताई जाती हैं।

संक्षिप्त जन्मपत्री बनाना : २३३

भिन्न-भिन्न प्रकार की कुण्डलियाँ।

कुण्डली क्रम ( १ )

कुण्डली क्रम ( २ )

कुण्डली क्रम ( ३ )

कुण्डली क्रम ( ४ )

कुण्डली क्रम ( ५ )

कुण्डली क्रम ( ६ )

३३४ : सचित्र ज्योतिष शिक्षा, प्रारम्भिक ज्ञान खण्ड

कुण्डली क्रम ( ७ )

ये जितनी कुण्डलियाँ बनाई गई हैं, सब एक ही प्रकार की हैं, परन्तु उनके आकार भिन्न-भिन्न प्रकार के बनाये गये हैं। ज्योतिषी लोग शोभा के लिए इसी प्रकार की अनेक रूप की सुन्दर कुंडलियाँ जन्मपत्री में बनाते हैं। उनमें रंग भी भर देते हैं।

इन सब कुंडलियों में क्रम एक ही प्रकार का है। अर्थात् ऊपर लगने से आरम्भ कर बाईं ओर से क्रमानुसार राशियाँ स्थापित की जाती हैं। परन्तु इस प्रकार की कुंडली में इनके भाव स्थिर हैं केवल राशियाँ चलायमान हैं। देखो लग्नकुण्डली क्रम १ से ७ तक।

परन्तु भारतवर्ष में इन कुण्डलियों के आकार के अतिरिक्त भिन्न-भिन्न प्रकार से कुण्डलियाँ कई स्थानों में बनाई जाती हैं और उनके बनाने की पद्धति भी भिन्न-भिन्न हैं। इस कारण उनका वर्णन कर देना यहाँ आवश्यक है जिससे इस प्रकार की कोई कुण्डली मिलने पर तवीन विद्यार्थी को समझने में कोई अडचन न हो।

राशि कुण्डली क्रम ( ८ )

ग्रह कुण्डली क्रम ( ९ )

संक्षिप्त जन्मपत्रो बनाना : १३५

लग्न कुण्डली क्रम ( १ )

केशव दैवज्ञ की जातकपद्धति (केशव जातक) में राशि को स्थिर मानकर कुंडली बनाई गई है और उसमें भाव चलित बताये गये हैं।

यहाँ जिस प्रकार राशि कुण्डली न बनाई गई है, उसी के अनुसार राशियाँ सदा स्थिर मानी गई हैं। जैसे दशम स्थान में सदा दशवीं मकर राशि और लग्न में सदा पहिली भेष राशि रहती है, ऐसा मानकर कुण्डली बनाई जाती है। इसमें राशियों के अंक नहीं लिखे जाते केवल ग्रह जिस राशि में हो उस राशि के स्थान में लिख दिये जाते हैं, और जहाँ लग्न होती है लग्न लिख दी जाती है जैसे ग्रह कुण्डली क्रम (९) में पूर्व लिखित लग्न कुण्डली क्रम (१) के अनुसार ग्रह भर दिये गये हैं। इसमें राशि के अंक लिखने की आवश्यकता नहीं रहती। लग्न कुण्डली क्रम (१) और कुंडली क्रम (९) से मिलान करो। उसमें कितना अन्तर दिखाई देता है और नवीन विद्यार्थी को कुण्डली क्रम (९) अटपटी जान पड़ेगी।

दक्षिण में कुण्डली बनाने की भिन्न पद्धति है। उसमें राशि को स्थिर तो माना है परन्तु उसका क्रम उलटा है। जैसे उपर्युक्त कुण्डली में अंक ऊपर से लिखना आरम्भ होकर बाईं ओर से क्रमानुसार लिखे गये हैं, परन्तु यहाँ विपद क्रम से अर्थात् दाहिनी ओर से क्रमानुसार राशि के अंक स्थापित किये जाते हैं। इसमें राशियाँ स्थिर और भाव चलित माने गये हैं। और जहाँ लग्न हो वहाँ लग्न लिख दिया जाता है। यहाँ नीचे दी हुई कुण्डली देखने से सब समझ में आ जायगा।

२३६ : सच्चिद्र ज्योतिष शिक्षा, प्रारम्भिक ज्ञान खण्ड

स्थिर राशि कुण्डली

क्रम १०

ग्रह कुण्डली

क्रम ११

ग्रह कुण्डली

क्रम १२

मीन | मेव | वृष | मि. | १२ श. | १ | २ के. | ३ | श. | | के | ---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|--- कुम्भ | राशि कुंडली | कर्क | ११ गु. | जन्म कुण्डली | ४ | सू. | जन्म कुण्डली | मकर | सिंह. | १० | ५ मं. | | मं. धन | वृश्चि | तुला | कन्या | ९ चं. | ८ रा. लग्न | ७ शु. | ६ सू. बु. | चं. | रा. लग्न | शु. | सू. बु.

इसमें जहाँ लग्न लिखा है उसके आगे भाव गिना जाता है। जैसे लग्न में वृश्चिक का राहु है, धन भाव में धन राशि का चन्द्र है इत्यादि प्रकार से कुण्डली क्रम ११ में भाव समझना। परन्तु जो कुण्डली (११) में समझाने के लिए राशि के अंक दिये हैं वे नहीं रहते। केवल कुण्डली क्रम (१२) के अनुसार लग्न-कुण्डली में ग्रह बता दिये जाते हैं।

पाश्चात्य पद्धति से कुण्डली इस प्रकार बनती है कि कुण्डली में दशम भाव ऊपर रहता है, चतुर्थ भाव नीचे रहता है, बाईं ओर लग्न का स्थान (पूर्व) और दाहिनी ओर अस्त (पश्चिम) स्थान रहता है। इसमें भाव स्थिर और राशियों चलायमान बतलाते हैं।

पाश्चात्य पद्धति से कुण्डली क्रम (१३)

कुण्डली क्रम (१४)

भाव स्थिर है इस कारण भाव में जिन-जिन राशियों के जितने २ अंश होते हैं भाव स्थान में लिख दिये जाते हैं और जो ग्रह जितने अंश पर होता है उसके नीचे लिख दिया जाता है। बीच में जन्म समय स्थान आदि लिखा रहता है। देखो कुंडली क्रम १३।