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सचित्र ज्योतिष शिक्षा (प्रारम्भिक ज्ञान खण्ड) भाग १

सचित्र ज्योतिष शिक्षा (प्रारम्भिक ज्ञान खण्ड) भाग १

Sachitra Jyotisha Shiksha (Prarambhika Gyan Khand) Vol 1

बाबूलाल ठाकुर द्वारा

स्रोत: Motilal Banarsidass Edition · Motilal Banarsidass, Delhi (उद्गम)

DevanagariHindipublished288 पृष्ठ

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संक्षिप्त जन्मपत्रो बनाना : १३५

लग्न कुण्डली क्रम ( १ )

केशव दैवज्ञ की जातकपद्धति (केशव जातक) में राशि को स्थिर मानकर कुंडली बनाई गई है और उसमें भाव चलित बताये गये हैं।

यहाँ जिस प्रकार राशि कुण्डली न बनाई गई है, उसी के अनुसार राशियाँ सदा स्थिर मानी गई हैं। जैसे दशम स्थान में सदा दशवीं मकर राशि और लग्न में सदा पहिली भेष राशि रहती है, ऐसा मानकर कुण्डली बनाई जाती है। इसमें राशियों के अंक नहीं लिखे जाते केवल ग्रह जिस राशि में हो उस राशि के स्थान में लिख दिये जाते हैं, और जहाँ लग्न होती है लग्न लिख दी जाती है जैसे ग्रह कुण्डली क्रम (९) में पूर्व लिखित लग्न कुण्डली क्रम (१) के अनुसार ग्रह भर दिये गये हैं। इसमें राशि के अंक लिखने की आवश्यकता नहीं रहती। लग्न कुण्डली क्रम (१) और कुंडली क्रम (९) से मिलान करो। उसमें कितना अन्तर दिखाई देता है और नवीन विद्यार्थी को कुण्डली क्रम (९) अटपटी जान पड़ेगी।

दक्षिण में कुण्डली बनाने की भिन्न पद्धति है। उसमें राशि को स्थिर तो माना है परन्तु उसका क्रम उलटा है। जैसे उपर्युक्त कुण्डली में अंक ऊपर से लिखना आरम्भ होकर बाईं ओर से क्रमानुसार लिखे गये हैं, परन्तु यहाँ विपद क्रम से अर्थात् दाहिनी ओर से क्रमानुसार राशि के अंक स्थापित किये जाते हैं। इसमें राशियाँ स्थिर और भाव चलित माने गये हैं। और जहाँ लग्न हो वहाँ लग्न लिख दिया जाता है। यहाँ नीचे दी हुई कुण्डली देखने से सब समझ में आ जायगा।