सचित्र ज्योतिष शिक्षा (प्रारम्भिक ज्ञान खण्ड) भाग १
Sachitra Jyotisha Shiksha (Prarambhika Gyan Khand) Vol 1
बाबूलाल ठाकुर द्वारा
स्रोत: Motilal Banarsidass Edition · Motilal Banarsidass, Delhi (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंसंक्षिप्त जन्मपत्री बनाना : २२९
अर्थात् इष्ट काल तक पूर्वाषाढ़ा कितना सूका हुआ था। शनिवार के शेष पूर्वाषाढ़ा में इष्ट काल जोड़ने से पूर्वाषाढ़ा का भुक्त काल ४८-१२ निकला। इसे भयात या भक्तर्ष कहते हैं।
अब देखना है पूर्वाषाढ़ा के कौन चरण का जन्म है। भयात में १ चरण घटाया तो शेष ३१-३९ बचे। दूसरा चरण घटाया तो शेष १५-६ बचे, अब तीसरा चरण नहीं घटाया तो तीसरे चरण का जन्म समझो।
| ष० | प० ---|---|--- भयात | ४८ | १२ १ चरण | १६ | ३३ शेष | ३१ | ३९ दूसरा चरण | १६ | ३३ घटाया शेष | १५ | ६
तीसरा चरण १६ ३१ नहीं घटता, इससे तीसरे चरण का जन्म हुआ।
पूर्वाषाढ़ा के तीसरे चरण में होड़ाचक्र के अनुसार नामाक्षर "फा" निकला। धनु राशि हुई। फा अक्षर पर से फतेहसिंह नाम रखा।
अब नक्षत्र गुण धर्म चक्र देखा।
पूर्वाषाढ़ा के तीसरे चरण में जन्म होने से—क्षत्रिय वर्ण, चतुष्पद वश्य, सर्कट योनि, मनुष्य गण, मध्य नाड़ी हुई। धन राशि है जिसका स्वामी गुरु हुआ।
अब लग्न कुण्डली बनाने के लिए पहिले लग्न निकालना है। लग्न निकालने को लग्नसारिणी देखी। सूर्य ५ रा १५° है अर्थात् कन्या के १५° पर है। सारिणी में कन्या के १५° के नीचे ३१-२५-१ दिया है। इसमें सारिणी अंक ३१-२५-१ इष्ट ९—४५ जोड़ा तो योग ४१—१०—१ हुआ। इसे सारिणी + इष्ट ९-४५-० में खोजा ४१-६-१२ तक वृश्चिक के ७° होते हैं और योग ४१-१०-१ ४१-१७-३२ तक ८° होते हैं अपना इष्ट युक्त सारिणी अंक दोनों के बीच में हैं। इस कारण लगभग ७।° वृश्चिक लग्न के आते हैं। वृश्चिक लग्न निकाली। अब वृश्चिक लग्न को बीच में रख कर कुंडली तैयार की। इस प्रकार कुंडली चक्र बन कर तैयार हुआ।
अब इसमें ग्रह भरने के लिए पंचाङ्ग देखा। पंचाङ्ग में अष्टमी का मिथमान ४५-५४ का ग्रह इस प्रकार दिया है। जन्म नवमी का है। इस कारण उसके समीप की पंक्ति (पंचाङ्ग के ग्रह) यही हैं।