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सचित्र ज्योतिष शिक्षा (प्रारम्भिक ज्ञान खण्ड) भाग १

सचित्र ज्योतिष शिक्षा (प्रारम्भिक ज्ञान खण्ड) भाग १

Sachitra Jyotisha Shiksha (Prarambhika Gyan Khand) Vol 1

बाबूलाल ठाकुर द्वारा

स्रोत: Motilal Banarsidass Edition · Motilal Banarsidass, Delhi (उद्गम)

DevanagariHindipublished288 पृष्ठ

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नक्षत्रों की पहिचान : २९

का प्रमाण प्रायः कुमुना है । अत्रैल के प्रातः के लगभग यह चौकोन सिर पर आता है । देखें चित्र संख्या ३३ । पूर्वाषाढ़ा का आकार हाथी दांत और उत्तराषाढ़ा का आकार मंच ( मर्चैया ) सरीखा माना है ।

३३ अभिजित्—दोनों आषाढ़ा के बाद अभिजित् का तारा लिया जाता है । परन्तु यह क्रांतिबुत प्रवेश से दूर और बाहर है इस कारण इसे नक्षत्र की गणना करते समय छोड़ देते हैं । यह तारा उत्तर की ओर आकाश गंगा के किनारे है और बड़ा प्रकाशवान् है । इसके पास दो छोटे-छोटे तारे हैं जिनसे एक त्रिकोण सरीखा दिखता है । इस नक्षत्र को मिलाने से २८ नक्षत्र हो जाते हैं परन्तु इसे छोड़कर केवल क्रांति प्रवेश के ही २७ नक्षत्र लिये जाते हैं । यह प्रायः प्रथम श्रेणी का है । देखें चित्र संख्या ३४ ।

२२ श्रवण—इसके ३ तारे हैं जिनमें बीच का तारा पहिली श्रेणी का और बहुत चमकीला है । ये तारे आकाश गंगा में उत्तराषाढ़ा से बहुत उत्तर की कुछ पूर्व कोने में हैं । श्रावण मास की पूर्णमासी को चंद्र इस नक्षत्र के समीप आता है । ये तारे शीघ्र

चित्र संख्या ३३

चित्र संख्या ३५

चित्र संख्या ३६

३३ अभिजित्

२२ श्रवण

२३ धनिष्ठा

पहिलाने जा सकते हैं । एक सीध में ये तीनों तारे हैं और प्रायः उत्तर दक्षिण कुछ तिरछे हैं । इन तीन तारों का आकार वामन औरार के चरण सदृश माना जाता है परन्तु देखने में ये बाण सरीखे दिखते हैं । देखें चित्र संख्या ३५ ।

२३ धनिष्ठा—इसके ५ तारे हैं जो पास-पास हैं । श्रवण के पूर्व कुछ उत्तर बाजू इसका झुमका दिखता है । इसका आकार मूर्दंग सरीखा कहा गया है । नीचे का छोटा तारा छोड़ कर ४ तारों को देखें तो चपटा चौकोन सरीखा दिखता है । यह आकाश गंगा के बाहर है । ये ४ तारे पास-पास और संद ज्योति के हैं । देखें चित्र संख्या ३६ ।

२४ शतभिषक या शतभिषा—इसे शततारक भी कहते हैं । कहा जाता है कि इसमें १०० तारों का झुण्ड है । इसका आकार वृत्त Circle सरीखा बताया गया है परन्तु कोई इसमें से १० तारा को कोई १ ही तारा को ही शतभिषक मानते हैं । यह नवम्बर में व्यालू के समय सिर पर आता है और प्रायः २८ अंश सिर से दक्षिण की ओर दिखता है । इसीके सीध में बहुत नीचे दक्षिण में १ बहुत ही प्रकाशवान् तारा है जिसे याममत्य कहते हैं । दोनों का अन्तर ८ अंश का है । १०० तारे होने से इसका नाम शततार पड़ा है । वहाँ बहुत से तारेगण पास-पास हैं ।