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सचित्र ज्योतिष शिक्षा (प्रारम्भिक ज्ञान खण्ड) भाग १

सचित्र ज्योतिष शिक्षा (प्रारम्भिक ज्ञान खण्ड) भाग १

Sachitra Jyotisha Shiksha (Prarambhika Gyan Khand) Vol 1

बाबूलाल ठाकुर द्वारा

स्रोत: Motilal Banarsidass Edition · Motilal Banarsidass, Delhi (उद्गम)

DevanagariHindipublished288 पृष्ठ

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४८ : सचित्र ज्योतिषशास्त्र, प्रारम्भिक ज्ञान खण्ड

उत्तर सम्पात से नाड़ीवृत्त पर यह नापा जाता है। ऋक् प्रोतवृत्त जो ग्रह से होकर नाड़ीवृत्त पर समकोण बनाते हुए जहाँ मिलता है उस बिन्दु तक उत्तर सम्पात से नापने में जो अन्तर आवे वह उस ग्रह का विषुवोत्त होना। यह ग्रह की गति की ओर अर्थात् पश्चिम से पूर्व को नापा जाता है। यह सब आगे उदाहरण देकर समझाया गया है।

चित्र संख्या ५८—नाड़ीवृत्त, क्रांतिवृत्त, भोग और शर

विषुववृत्त (नाड़ीवृत्त) के नाप के अंश होने से इन्हें विषुवोत्त भी कहते हैं।

चित्र संख्या ५८ में ग्रह का शर और भोग समझाया है। शर और भोग क्रांतिवृत्त पर ही नापे जाते हैं। देखो चित्र संख्या ५८।

ना. डी=नाड़ीवृत्त

घ्र. व=उत्तर और दक्षिणध्रुव

कां. ति=क्रांतिवृत्त

क=कदम्ब=क्रांतिवृत्त का उत्तर ध्रुव

द= " " " दक्षिण "

सं=उत्तर सम्पात बिन्दु जहाँ नाड़ीवृत्त

और क्रांतिवृत्त एक दूसरे को काटते हैं।

ग्र. एक ग्रह।

क. ग्र. भो.=कदम्ब से एक कदम्ब प्रोतवृत्त ग्रह पर से होते हुए इस प्रकार खींचा गया है जो क्रांतिवृत्त पर भो. स्थान पर समकोण बनाते हुए मिला है।

श. भो.=उस ग्रह का शर हुआ।

सं. भो.=उस ग्रह का भोग हुआ। ग्रह सं. (सम्पात बिन्दु) से भो. स्थान तक जो अन्तर है वही भोग हुआ। यह भोग उत्तर सम्पात बिन्दु से आरम्भ होकर

पश्चिम से पूर्व को नापा जाता है, जैसा दूसरे उदाहरण से समझ पड़ेगा। दूसरा उदाहरण (चित्र संख्या ५८)