सचित्र ज्योतिष शिक्षा (प्रारम्भिक ज्ञान खण्ड) भाग १
Sachitra Jyotisha Shiksha (Prarambhika Gyan Khand) Vol 1
बाबूलाल ठाकुर द्वारा
स्रोत: Motilal Banarsidass Edition · Motilal Banarsidass, Delhi (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें५० : सचित्र ज्योतिष शिक्षा, प्रारम्भिक ज्ञान खण्ड
दूसरा उदाहरण देखें चित्र संख्या ५९ ।
र. रवि यह सदा कान्तिवृत्त पर रहता है ।
ब. ल-एक ध्रुव प्रोतवृत्त ( यामोत्तरवृत्त ) जो ब. दक्षिण ध्रुव से र. ( रवि ) पर से होते हुए नाड़ी वृत्तपर ल. स्थान पर समकोण बनाते हुए मिला है ।
व. र=ध्रुवात्तर हुआ ।
र. ल=सूर्य की दक्षिण क्रांति हुई
सं. वि. डी. पा. ना. ल.=यह सूर्य का विषुवांग हुआ ।
यह विषुवांग सं.=उत्तर सम्रात से पूर्व की ओर नापा जाता है । इस कारण सं. विन्दु से होकर डी. पर से पूरा चक्कर घूमते हुए ना पर से होते हुए ल. तक आने में जितनी दूरी होगी वही विषुवांग होगा ।
यां=(३६०—ल. सं. की दूरी=सूर्य का विषुवांग )
आकाश में नक्षत्र आदि या ग्रह क्यों तिरछे घूमते हुए दृष्टिगोचर होते हैं ? चित्र संख्या ६० के देखने से समझ में आयेगा ।
पृथ्वी के ध्रुव का मुकाव उत्तर की ओर है । इसी प्रकार आकाश का भी उत्तर ध्रुव कुछ उत्तर की ओर मुका हुआ है । इसी कारण यह तिरछापन दिखता है ।
किसी स्थान में खड़े होकर चारों ओर देखें तो पृथ्वी के चारों ओर आकाश लगा हुआ दिखेगा । इसी को क्षितिज कहते हैं । जहाँ आकाश पृथ्वी से लगा हुआ दिखता है वही उस स्थान का ( जहाँ से खड़े होकर देख रहे हैं ) क्षितिज है ।
क्षितिज के ठीक ऊपर शिरोविन्दु है । नाड़ीवृत्त पर, नाड़ीवृत्त के शिरोविन्दु से उत्तर ध्रुव लम्ब रूप है, परन्तु उत्तर ध्रुव कुछ मुका हुआ होने के कारण नाड़ीवृत्त भी तिरछा दिखता है ।
चित्र संख्या ६०—क्षितिज, नाड़ीवृत्त, क्रांतिवृत्त और ध्रुव
अपना वाधा विषुववृत्त ( नाड़ीवृत्त ) क्षितिज पर दिखता है । अपने स्थान से ध्रुव जितना ऊँचा दिखता है उतना ही आकाश का नाड़ीवृत्त अपने सिर के स्थान