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सचित्र ज्योतिष शिक्षा (प्रारम्भिक ज्ञान खण्ड) भाग १

सचित्र ज्योतिष शिक्षा (प्रारम्भिक ज्ञान खण्ड) भाग १

Sachitra Jyotisha Shiksha (Prarambhika Gyan Khand) Vol 1

बाबूलाल ठाकुर द्वारा

स्रोत: Motilal Banarsidass Edition · Motilal Banarsidass, Delhi (उद्गम)

DevanagariHindipublished288 पृष्ठ

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ग्रहों की गति : ५१

से क्षिण को दिखता है। इस कारण नाड़ीवृत्त में पूर्ण-पश्चिम को तिरछापन है। इसका एक छोर ठीक पूर्ण विन्दु पर है दूसरा पश्चिम में है।

अब क्रांतिवृत्त भी २३°-२८° का कोण बनाते हुए इस नाड़ीवृत्त को काटता हुआ तिरछा जाता है, इस कारण क्रांतिवृत्त में अधिक तिरछापन आ जाता है। इसी कारण नक्षत्र आदि क्रांतिवृत्त से तिरछे घूमते हुए दिखते हैं क्योंकि क्रांति प्रदेश ही तिरछा है।

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अध्याय ११

ग्रहों की गति Velocity or motion & Planets

प्रत्येक ग्रह की पृथक् २ गति ( चाल ) होती है। सब ग्रहों के साथ राहु केतु भी आकाशमार्गीय क्रांति प्रदेश के पथ पर घूमते हैं।

गति दो प्रकार की होती है ( १ ) परिभ्रमण Rotation और ( २ ) परिक्रमण Revolution

परिभ्रमण—जब ग्रह अपनी धुरी पर अपने ही आस पास पश्चिम से पूर्ण को घूमता है, उस गति को परिभ्रमण कहते हैं।

परिक्रमण—ग्रह जब अपने मार्ग से चलते हुए सूर्य के आस-पास घूमता है, जैसे परिक्रमा दे रहा हो, तो उस गति को परिक्रमण कहते हैं।

पृथ्वी जब अपनी धुरी पर दिन-रात में अर्थात् २४ घण्टे में अपने ही चहुँ और घूम लेती है तो उसे परिभ्रमण कहते हैं। पृथ्वी जब परिभ्रमण करते हुए अपनी कक्षा पर सूर्य की परिक्रमा करने को आगे बढ़ती है तो उसे परिक्रमण कहते हैं। जैसे सौरा अपने आस-पास चक्कर लगाते हुए भी आगे बढ़ता है।

परिक्रमण दो प्रकार का है ;—( १ ) मार्गी गति Acceleration or direct ( २ ) वक्रि गति Retrograde

( १ ) मार्गी—जब ग्रह अपने मार्ग में सीधा बढ़ते चला जाता है तो उसे मार्गी ग्रह कहते हैं। यह गति पश्चिम से पूर्ण को होती है जैसे कि सूर्य चलता है। जैसे कोई ग्रह येष राशि में है तो उसके उपरान्त वृष फिर मियुन आदि की ओर बढ़ता जायेगा। यही ग्रहों की सीधी गति है।

( २ ) वक्रि—जब ग्रह सीधी चाल जाते-जाते एकदम वापस लौट पड़ता है तो उसे वक्रि ग्रह कहते हैं। यह गति पूर्ण से पश्चिम को सूर्य की चाल के विरुद्ध होती है। जैसे कोई ग्रह मियुन राशि में है तो उसके उपरान्त कर्क की ओर जाना या परन्तु आगे न बढ़कर फिर वृष की ओर लौट पड़ें तो उसे ग्रह का वक्रि होना कहते हैं।

ग्रह जब वक्रि होकर फिर सीधा-सीधा रास्ता चलने लगता है तो उसे फिर मार्गी कहने लगते हैं।