सचित्र ज्योतिष शिक्षा (प्रारम्भिक ज्ञान खण्ड) भाग १
Sachitra Jyotisha Shiksha (Prarambhika Gyan Khand) Vol 1
बाबूलाल ठाकुर द्वारा
स्रोत: Motilal Banarsidass Edition · Motilal Banarsidass, Delhi (उद्गम)
ग्रहों की गति : ५१
से क्षिण को दिखता है। इस कारण नाड़ीवृत्त में पूर्ण-पश्चिम को तिरछापन है। इसका एक छोर ठीक पूर्ण विन्दु पर है दूसरा पश्चिम में है।
अब क्रांतिवृत्त भी २३°-२८° का कोण बनाते हुए इस नाड़ीवृत्त को काटता हुआ तिरछा जाता है, इस कारण क्रांतिवृत्त में अधिक तिरछापन आ जाता है। इसी कारण नक्षत्र आदि क्रांतिवृत्त से तिरछे घूमते हुए दिखते हैं क्योंकि क्रांति प्रदेश ही तिरछा है।
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अध्याय ११
ग्रहों की गति Velocity or motion & Planets
प्रत्येक ग्रह की पृथक् २ गति ( चाल ) होती है। सब ग्रहों के साथ राहु केतु भी आकाशमार्गीय क्रांति प्रदेश के पथ पर घूमते हैं।
गति दो प्रकार की होती है ( १ ) परिभ्रमण Rotation और ( २ ) परिक्रमण Revolution
परिभ्रमण—जब ग्रह अपनी धुरी पर अपने ही आस पास पश्चिम से पूर्ण को घूमता है, उस गति को परिभ्रमण कहते हैं।
परिक्रमण—ग्रह जब अपने मार्ग से चलते हुए सूर्य के आस-पास घूमता है, जैसे परिक्रमा दे रहा हो, तो उस गति को परिक्रमण कहते हैं।
पृथ्वी जब अपनी धुरी पर दिन-रात में अर्थात् २४ घण्टे में अपने ही चहुँ और घूम लेती है तो उसे परिभ्रमण कहते हैं। पृथ्वी जब परिभ्रमण करते हुए अपनी कक्षा पर सूर्य की परिक्रमा करने को आगे बढ़ती है तो उसे परिक्रमण कहते हैं। जैसे सौरा अपने आस-पास चक्कर लगाते हुए भी आगे बढ़ता है।
परिक्रमण दो प्रकार का है ;—( १ ) मार्गी गति Acceleration or direct ( २ ) वक्रि गति Retrograde
( १ ) मार्गी—जब ग्रह अपने मार्ग में सीधा बढ़ते चला जाता है तो उसे मार्गी ग्रह कहते हैं। यह गति पश्चिम से पूर्ण को होती है जैसे कि सूर्य चलता है। जैसे कोई ग्रह येष राशि में है तो उसके उपरान्त वृष फिर मियुन आदि की ओर बढ़ता जायेगा। यही ग्रहों की सीधी गति है।
( २ ) वक्रि—जब ग्रह सीधी चाल जाते-जाते एकदम वापस लौट पड़ता है तो उसे वक्रि ग्रह कहते हैं। यह गति पूर्ण से पश्चिम को सूर्य की चाल के विरुद्ध होती है। जैसे कोई ग्रह मियुन राशि में है तो उसके उपरान्त कर्क की ओर जाना या परन्तु आगे न बढ़कर फिर वृष की ओर लौट पड़ें तो उसे ग्रह का वक्रि होना कहते हैं।
ग्रह जब वक्रि होकर फिर सीधा-सीधा रास्ता चलने लगता है तो उसे फिर मार्गी कहने लगते हैं।
५२ : सचित्र ज्योतिष शिक्षा, प्रारम्भिक ज्ञान खण्ड
इस प्रकार प्रत्येक ग्रह की पृथक्-पृथक् गति होती है। कोई शीघ्र चलता है कोई धीरे-धीरे चलता है। इस प्रकार क्रांति प्रवेश में कोई ग्रह कभी आगे रहते हैं, कभी पीछे रहते हैं, कभी-कभी चलते-चलते मिल जाते हैं।
प्रत्येक ग्रहों की गति
(१) चन्द्र—सबसे शीघ्र चलने वाला ग्रह है। पृथ्वी के आस-पास प्रायः ३० दिन में घूम कर अपनी परिक्रमा पूरी करता है।
(२) शनि—सबसे धीमी चलने वाला ग्रह है। यह ३० वर्ष में अपनी परिक्रमा पूरी करता है।
(३) सूर्य—१ वर्ष (३६५.२५ दिन) में परिक्रमा पूरी कर लेता है। प्रतिदिन लगभग १° चलता है। इस प्रकार स्थूल मान से १ राशि में १ मास रहता है।
इस प्रकार १ राशि में चन्द्र २। दिन, मंगल १।। मास, बुध १ मास, गुरु १३ मास, शुक्र १ मास, शनि ३० मास, राहु १८ मास, केतु १८ मास, हर्षाल १ राशि में ७ वर्ष और नेपच्यून १३ वर्ष रहता है।
इस प्रकार कम ज्यादा समय परिक्रमा में लगने का कारण यह है कि जो ग्रह पास हैं उनकी परिक्रमा में अल्प समय लगता है और जो ग्रह दूर हैं उनकी परिक्रमा में दूरी के अनुसार अधिक समय लगता है। चित्र संख्या १ से परिक्रमा की दूरी समझ पड़ेंगी। ग्रहों की प्रतिदिन की मध्यम गति (औसत गति) भी इस प्रकार है :-
| दैनिक मध्यम गति | दैनिक मध्यम गति |
|---|---|
| ग्रह | अंश |
| सूर्य | ० |
| चन्द्र | १३ |
| बुध | १ |
| शुक्र | १ |
राहु केतु को छोड़ कर शेष ग्रहों की गति सदा बदलती रहती है। राहु केतु की गति कभी नहीं बदलती, सदा इनकी एक सरीखी गति रहती है। राहु केतु सदा बड़ी रहते हैं अर्थात् सदा एक सरीखी चाल से उल्टे चलते रहते हैं।
सूर्य और चन्द्र कभी बड़ी नहीं होते शेष ग्रह बुध, शुक्र, मंगल, गुरु, शनि, हर्षाल और नेपच्यून सदा बड़ी और मार्गी होते रहते हैं और उनकी दैनिक गतियों में भी परिवर्तन होता रहता है।
उपरोक्त ग्रह अपनी इच्छानुसार बड़ी मार्गी नहीं होते परन्तु एक प्रबल शक्ति सूर्य के कारण ही गतियों में यह सब परिवर्तन होता है, क्योंकि सब ग्रह सूर्य की आकर्षण शक्ति के प्रभाव से खिंचे हुए हैं।
सूर्य के आस-पास जो परिक्रमा का मार्ग है वह एक सरीखा गोल नहीं बण्डाकार है, जिसके बीच में सूर्य है। देखें चित्र संख्या ७। चित्र से प्रकट होगा कि इस मार्ग
ग्रहों की गति : ५३
का कुछ भाग सूर्य के समीप पड़ जाता है कुछ दूर हो जाता है। कोई ग्रह जब चलते-चलते सूर्य के अधिक पास पहुँच आता है तो उसे सूर्य के समीप Perihelion कहते हैं ( यह घटना पृथ्वी के सम्बन्ध में लगभग १ जनवरी को होती है )। जब सूर्य से ग्रह अधिक दूरी पर चला जाता है तब उसे सूर्य से अधिक दूर Aphelion कहते हैं। पृथ्वी १ जुलाई के लगभग अधिक दूरी में होती है।
ग्रह जब सूर्य के समीप हो जाता है तो सूर्य की आकर्षण शक्ति बढ़ती है जिसके कारण सूर्य के खिंचाव से ग्रह की गति में अधिक तेजी आ जाती है और ज्यों-ज्यों वह ग्रह सूर्य से दूर होता जाता है उसकी गति धीमी होती जायेगी क्योंकि सूर्य से दूरी होने के कारण सूर्य का खिंचाव (आकर्षण शक्ति) कम होने लगता है और उस समय ग्रह बड़ी हो जाता है अर्थात् फिर लौट पड़ता है। परन्तु जब दूर से लौट कर ग्रह सूर्य की ओर बढ़ता है तो फिर ग्रह में भी सूर्य के प्रभाव से बल आ जाता है और समूहल कर फिर आगे बढ़ता है तब मार्गी ग्रह हो जाता है। अब समझ गये होंगे कि इसी अण्डाकार वृत्त के कारण उन पर सूर्य की आकर्षण शक्ति का घटाव-बढ़ाव होता है जिससे ग्रह बड़ी-मार्गी होते हैं।
कुचस्तम्भ Stationary
जब ग्रह बक होने से उसकी गति मन्द हो जाती है तब उस ग्रह का स्तम्भ होना कहते हैं। उस समय ग्रह एक राशि पर बहुत दिनों तक रहता है, इसे ही कुचस्तम्भ कहते हैं। परन्तु मंगल ग्रह के सम्बन्ध में ही कुचस्तम्भ शब्द का प्रयोग होता है। शेष ग्रहों की ऐसी स्थिति में स्तम्भ ही कहेंगे।
साधारण प्रकार से कौन ग्रह कितने दिनों में बड़ी मार्गी होता है, यह नीचे चक्र में बताया है।
उदय अस्त बड़ी मार्गी चक्र
| ग्रह | अस्त होने के | उदय के उपरान्त | बड़ी के उपरान्त | मार्गी के उपरान्त |
|---|---|---|---|---|
| इतने मास उपरान्त | इतने मास में | इतने मास में | इतने मास में | |
| उदय होगा | बड़ी होगा | मार्गी होगा | अस्त होगा | |
| मंगल | ४ मास | १० मास | २ मास | १० मास |
| गुरु | १ मास | ४३ मास | ४ मास | ४३ मास |
| शनि | १३ मास | ३ मास | ४ मास | ३३ मास |
| ग्रह पूर्व में अस्त | पश्चिम में | बड़ी के | पश्चिम में | पूर्व में उदय |
| होने के उपरान्त | उदय उपरान्त | इतने दिनों | अस्त के बाद | के बाद के इतने |
| पश्चिम में | इतने दिनों | बाद पश्चिम | इतने | इतने दिनों |
| इतने दिनों में | में | में | दिनों में | में पूर्व में |
| में उदय होगा | बड़ी होगा | अस्त होगा | उदय होगा | मार्गी होगा अस्त होगा |
| शुक्र ३२ दिन | ३२ दिन | ४ दिन | १६ दिन | ४ दिन ३२ दिन |
| शुक्र ७५ दिन | २४० दिन | २३ दिन | ९ दिन | २३ दिन २४० दिन |
५४ : सचित्र ज्योतिष शिक्षा, प्रारम्भिक ज्ञान खण्ड
राहु केतु सदा बक्ती रहते हैं। सूर्य और चन्द्रमा कभी बक्ती नहीं होते। शेष ग्रह बक्ती मार्गी होते रहते हैं।
उदय अस्त ज्ञान Heliacal rising and setting of planets
सूर्य के पास कोई ग्रह आ जाने से उस ग्रह को अस्त होना कहते हैं। यदि वह ग्रह सूर्य के आगे चला जावे तो उसे उदय होना कहते हैं।
सूर्य के पास ग्रह आ जाने से ग्रह नहीं दिखता इस कारण उसे अस्त कहते हैं। जब सूर्य के दूर चले जाने के कारण वह ग्रह दिखने लगता है तो उसे उदय होना कहते हैं।
सूर्य को छोड़कर शेष ग्रहों का उदय अस्त होता है। इसमें भी यह प्रमाण है कि सूर्य से विशेष अंश दूर हो जाने पर कोई ग्रह दिखने लगता है कोई नहीं दिखता।
सूर्य के कितने अन्तर पर ग्रह चले जाने पर दिखने लगता है अर्थात् उदय होता है, नीचे दिया है। सूर्य से इतने अंशों के भीतर ग्रह हो तो वह ग्रह अस्त ही समझा जायेगा। जैसे सूर्य से चन्द्र का अन्तर १२ अंश के भीतर रहने तक चन्द्र अस्त ही रहेगा ( नहीं दिखेगा ) परन्तु १२° हो जाने पर चन्द्र उदय होगा ( दिखने लगेगा )। इसी प्रकार सब ग्रहों के विषय में समझना।
ग्रहों का कालांश
| ग्रह | चन्द्र | मंगल | बुध | गुरु | शुक्र | शनि |
|---|---|---|---|---|---|---|
| सूर्य से अंतर-कालांश ( अंशोंमें ) | १२ | १७ | १३ | ११ | ९ | १५ |
इस अन्तर को कलांश भी कहते हैं।
अस्तोदय—२ प्रकार का है। एक तो प्रति दिन ग्रह उदय होते हैं और अस्त होते हैं। यहाँ जो बताया गया है वह इससे भिन्न है अर्थात् सूर्य के पास जब ग्रह होता है तो अस्त होना कहा जाता है। जब सूर्य के पास ग्रह होता है तो उसे सूर्य संनिध भी कहते हैं। उदय अस्त को और भी अच्छी तरह समझाते हैं।
उदय—सूर्य से अल्प गति वाले ग्रह ( मंगल, गुरु, शनि ) सूर्य से कालांश तुल्य अंतर पर ( कालांश अंतर जो ऊपर बताया है ) पूर्व दिशा में और थोड़ी रात्रि रहने पर उदय होते हैं सूर्य से अधिक गति वाला ग्रह चंद्र है। यह सूर्य से, अपने कालांश से अधिक होने पर पश्चिम दिशा में संध्या को उदय होता है। बुध, शुक्र, के लिये विशेष बात यह है कि ये सूर्य के अधिक पास हैं। ये दोनों दिशाओं ( पूर्व और पश्चिम ) से उदय और अस्त होते हैं। क्योंकि ये दोनों ग्रह वक्र होकर फिर सूर्य के कालांश तुल्य अंतर में आ जाने से इनका अस्त और उदय होता है अर्थात् दोनों ग्रह सूर्य से अधिक गति वाले होने के कारण अपने कालांश अन्तर होने पर सूर्य के आगे पश्चिम में संध्या को उदय होते हैं फिर वक्र होकर सूर्य के पास आकर पश्चिम में ही इनका अस्त होता है। फिर वक्र गति ही से सूर्य के पीछे होकर अपने कालांश अन्तर पर पूर्व दिशा में थोड़ी रात्रि रहने पर उदय होते हैं फिर मार्गी होकर पूर्व में ही अस्त होते हैं।
सम्पात : ५५
अस्त—सूर्य से अल्प गति वाले ग्रह ( मंगल, शुक्र, शनि ) सूर्य से, अपने कालांश के भीतर होने से पश्चिम दिशा में अस्त होते हैं और अधिक गति वाला ग्रह चंद्र अपने कालांश के भीतर सूर्य के समीप आ जाने पर पूर्व दिशा में अस्त होता है ।
वक्री बुध, शुक्र का कालांश १° कम लेना अर्थात् बुध का कालांश १२° है तो वक्री बुध का ११° लेना । शुक्र का ९° है तो वक्री शुक्र का ८° लेना । वक्रीग्रह होने के कारण कालांश कम लिया जाता है ।
अध्याय १२
सम्पात equinox
पहिले बता चुके हैं कि क्रांतिवृत्त और नाडीवृत्त दोनों पृथक्-पृथक् वृत्त हैं, जो एक दूसरे को २३° २८' का तिरछा कोण बनाते हुए दो स्थानों में काटते हैं, जिससे दो पृथक्-पृथक् भाग हो जाते हैं । देखें चित्र संख्या ६१ ।
चित्र संख्या ६१—सम्पात बिन्दु
भाग ( १ ) क्रांतिवृत्त का ऊपर का आधा भाग सं० ति० प० और नाडीवृत्त का नीचे का आधा भाग सं० दो० पा० ।
भाग ( २ ) क्रांतिवृत्त का नीचे का आधा भाग सं० का० पा० और नाडीवृत्त का ऊपर का आधा भाग सं० ना० पा० ।
जहाँ एक दूसरे को काटते हैं वे दो बिन्दु सं० और पा० संपात बिन्दु हैं ।
इनमें से १ सं० को अयन मेघ या सायन मेघ या वसंत सम्पात Autumnal equinox कहते हैं । दूसरे को अयनतुला या सायनतुला या शरद सम्पात Autumnal equinox कहते हैं ।
इस प्रकार सूर्य क्रांति वृत्त में घूमते हुए दो बार नाडीवृत्त को पार करता है, उस समय दिन रात बराबर होता है ।
क्रांतिवृत्त की बक़ता के ही कारण सूर्य ६ मास उत्तर और ६ मास दक्षिण को उदय होता है । इसी से सूर्य की उत्तरायण और दक्षिणायन संज्ञा होती हैं ।
ज्यों ज्यों अयन बिन्दु के आगे बढ़ते हुए सूर्य जाता है त्यों त्यों दिन बढ़ता जाता
५६ : सचित्र ज्योतिष शिक्षा, प्रारम्भिक ज्ञान खण्ड
है। सूर्य जब क्रांतिवृत्त के अंतिम [छोर पर पहुँच जाता है ता वहीं सूर्य की सबसे बड़ी क्रांति होती है और यह स्थान क्रांतिसीमा कहलाता है।
चित्र संख्या ६२—क्रांतिवृत्त, नाडीवृत्त और क्रांतिसीमा
चित्र संख्या ६२ देखें। ऊपर बताया गया ति० और नीचे का क्रा० स्थान ही क्रांति सीमा है। ये स्थान नाडीवृत्त से २३° २५' की दूरी पर हैं।
क्रांति सीमा Tropic
पृथ्वी के नक्शे में ये दो छोटे छोटे वृत्त नाडीवृत्त के समानान्तर २३° २५' की दूरी पर खींचे गये हैं। उत्तर में कर्क की क्रांतिसीमा Tropic of cancer और दक्षिण में मकर की क्रांतिसीमा Tropic of capricorn कहलाती है। यही चित्र संख्या ६२ में समझाया गया है।
सम्पात और अयन बिन्दुओं का स्पष्टीकरण
१. सायन मेघ, उत्तर सम्पात या बसंत Vernal equinox—सूर्य २१ मार्च को विषुववृत्त पर आता है, इसके उपरांत उत्तर गोलार्द्ध की ओर जाने लगता है। इसे बसंत सम्पात कहते हैं। क्योंकि इसी समय बसंत ऋतु होती है और सायन मेघ संक्रमण होता है। इस समय सूर्य ठीक पूर्व को उदय होता है और दिन रात बराबर होती है। अर्थात् सूर्य प्रातःकाल ठीक ६ बजे उदय होता है। नाडीवृत्त और क्रांतिवृत्त एक दूसरे को काटते हैं उनका यह पहिला स्थान है। इस स्थान से ग्रहों का भोगांश और विषुवांश नापा जाता है।
२. सायन तुला—दक्षिण सम्पात या शरद सम्पात Autumnal equinox नाडीवृत्त और क्रांतिवृत्त के एक दूसरे को काटने का यह दूसरा स्थान है। २१ सितम्बर के लगभग सूर्य उत्तरी गोलार्द्ध की क्रांतिसीमा पर से छोट कर ६ मास में उत्तरी गोलार्द्ध की यात्रा समाप्त कर जिस सम्पात बिन्दु पर आता है उसे सायन तुला कहते हैं। इस समय सूर्य लौटकर विषुववृत्त पर आ जाता है और ठीक पूर्व में उगता है तथा दिन रात्रि बराबर होती है। इसके उपरांत सूर्य की दक्षिण गोल की यात्रा आरम्भ होती है। इसी से इसे दक्षिण सम्पात भी कहते हैं। और इसके बाद ही शरद ऋतु आरम्भ होती है। अर्थात् सूर्य उत्तर गोल में सायन मेघ से सायन तुला तक रहता है और दक्षिण गोल में सायन तुला से सायन मेघ तक।
३. ग्रीष्म क्रांति—दक्षिणायन बिन्दु Summer solstice
सम्पात : ५७
यह २१ जून के लगभग होता है जब सूर्य सायन मेघ से चल कर उत्तर गोलयात्रा में वह इस क्रांतिसीमा पर २१ जून के लगभग पहुँच जाता है, उस समय सूर्य की किरणें कर्क रेखा पर समकोण बनाती हैं। इस समय सूर्य सबसे दूर रहता है और सूर्य के उदय अस्त का घेरा बहुत बड़ा होता है अर्थात् उस दिन, दिन मान सबसे बड़ा होता है। इसी को सायन कर्क संक्रमण कहते हैं। इसके उपरांत सूर्य लौट कर २१ जून के लगभग उत्तर गोलार्द्ध की यात्रा समाप्त कर सायन तुला पर आता है। इस बिन्दु पर पहुँच कर सूर्य दक्षिण की ओर मुड़ता है और सूर्य दक्षिणायन हो जाता है इस कारण ग्रीष्म क्रांति को दक्षिणायन बिन्दु भी कहते हैं।
४. शरदक्रांति—उत्तरायण बिन्दु winlet solstice—यह २१ दिसम्बर को होता है, जब सूर्य विषुवरेखा से बहुत दूरी पर बहुत दक्षिण की ओर रहता है। यह क्रांति वृत्त की दक्षिण सीमा है। लगभग २२ दिसम्बर को जब सूर्य की किरणें मकर रेखा पर समकोण बनाती हैं उस समय सायन मकर संक्रांति होती है। इस समय सूर्य की दक्षिण क्रांति २३°-२८' होती है। उसी दिन सूर्य पूर्व बिन्दु के दक्षिण में प्रायः २५° पर उगता है। उस दिन से सूर्य उत्तर की ओर आने लगता है। उस दिन, रात्रि (रात्रि मान) सबसे बड़ी होती है। इस बिन्दु पर पहुँच कर सूर्य उत्तर की ओर आने लगता है तब उत्तरायण का आरम्भ होता है। इसी कारण इसे उत्तरायण बिन्दु कहते हैं।
अयनबिन्दु आकाश में सदा एक ही जगह नहीं रहते, ये पश्चिम की ओर खिसकते रहते हैं। जिस नक्षत्र के पास आजकल उत्तरायण या दक्षिणायन होता है पुराने समय में उस स्थान में नहीं होता था। आजकल उत्तरायण का आरम्भ मूल के आधे भाग पर और दक्षिणायन का आरम्भ आर्द्रा के आरम्भ में होता है। सूर्य की उत्तर-दक्षिण गति का स्पष्टीकरण
सूर्य जब २१ मार्च को उत्तर सम्पात पर आता है तो दिन रात बराबर होते हैं अर्थात् ६ बजे प्रातः काल ठीक पूर्व में उदय होता है और ठीक पश्चिम दिशा में अस्त होता है। इसके उपरान्त अवलोकन करने तो प्रकट होगा कि सूर्य ठीक पूर्व बिन्दु पर उदय नहीं हो रहा है। वह कुछ उत्तर की ओर बढ़ रहा है। सूर्य इस प्रकार ३ मास तक उत्तर की ओर बढ़ता ही जाता है और २१ जून को विषुव रेखा से सबसे अधिक दूरी पर चला जाता है। उस समय सबसे बड़ा दिन होगा। क्योंकि सूर्य इस समय सबसे दूर हो जाता है और पूर्व में बहुत दूर हट कर उत्तर की उदय होगा। पूर्व और उत्तर के बीच का जो अन्तर है उस अन्तर का लगभग ३ भाग सूर्य उत्तर को चला जाता है। यही क्रांतिसीमा है। उस समय सूर्य पश्चिम में क्रांतिसीमा पर ही दृढ़ता दिखाएगा।
इसके उपरान्त सूर्य विषुवरेखा की ओर आने लगता है और २१ सितम्बर को फिर विषुववृत्त पर आ जाता है और उसी प्रकार उदय अस्त होगा जैसे २१ मार्च को होता है। उस समय दिन रात बराबर होती है। क्रांति सीमा से विषुववृत्त में
१८ : सचिन ज्योतिष शिक्षा, प्रारम्भिक ज्ञान खण्ड
सूर्य को आने में ३ मास लगते हैं। इस प्रकार ६ महीने में, जिसमें गर्मी की भी बहुत सम्मिलित है, सूर्य अपनी पूरी यात्रा कर ठीक उसी जगह आ जाता है। सूर्य इस समय तक उत्तरी गोलार्द्ध में रहा और इसके उपरान्त दक्षिण गोलार्द्ध में आ जाता है।
सूर्य जब दक्षिण को जाने लगता है तो दिन छोटा होने लगता है। २१ दिसम्बर को जब सबसे छोटा दिन होता है, सूर्य दक्षिण क्रांतिसीमा पर ३ मास की यात्रा कर पहुँच जाता है। दक्षिण में क्रांतिसीमा में उदय अस्त होते दिखता है। उपरान्त ३ मास की और विषुववृत्त की ओर यात्रा कर २१ मार्च को विषुववृत्त पर फिर आ जाता है।
इस कारण जब सूर्य के उदय अस्त में अन्तर पड़ता है तो मध्याह्न ( दोपहर ) की ऊँचाई में भी अन्तर पड़ता है जिसके कारण दिन छोटे-बड़े होते हैं। जून के बीच सबसे अधिक ऊँचाई होती है इससे सबसे बड़ा दिन होता है। सूर्य के उदय काल पर दिन की लम्बाई छुटाई अवलम्बित है। सूर्य ज्यों-ज्यों विषुव रेखा से उत्तर को जाता है दिन की लम्बाई बढ़ती जाती है।
पहिले सम्पात, अयन बिल्कु, और सूर्य की उत्तर दक्षिण गति समझा चुके हैं इन्हीं के कारण भिन्न-भिन्न ऋतुएँ होती हैं।
सायन राशियाँ संक्रांति की तारीख एवं ऋतुएँ
नीच | राशि | संक्रांति की | ऋतु | ---|---|---|---|--- राशियाँ | | तारीख | | उच्च | १ मेष | २१ मार्च | वसंत और ग्रीष्म की राशियाँ वर्षा और शरद की राशियाँ | ये ६ राशियाँ " | २ वृष | १९ अप्रैल | नाड़ी " | ३ मिथुन | २० मई | मंडल के नीच | ४ कर्क | २१ जून | उत्तर " | ५ सिंह | २२ जुलाई | में " | ६ कन्या | २२ अगस्त | है नीच | राशि | संक्रांति की | ऋतु | राशियाँ | | तारीख | | उच्च | ७ तुला | २३ सितम्बर | शरद और हेमन्त की राशियाँ शिषिर और वसंत की राशियाँ | ये ६ राशियाँ " | ८ वृश्चिक | २३ अक्टूबर | नाड़ी " | ९ धन | २२ नवम्बर | मंडल के नीच | १० मकर | २१ दिसम्बर | दक्षिण | ११ कुंभ | २० जनवरी | में | १२ मीन | १९ फरवरी | है
जब सूर्य उपरोक्त ३ राशियों में से किसी में होता है तो उसकी क्रांति बढ़ती है और दूसरी ३ राशियों में होता है तो क्रांति घटती है। इस कारण पहिली उच्च राशियाँ और दूसरी नीच राशियाँ हैं।
अध्याय १३
सायन और निरयन
राशि ग्रह आदि २ प्रकार के हैं ( १ ) सायन movable ( २ ) निरयन fixed zodic
सायन—अयन सहित with Procession
निरयन—अयन रहित without Procession
अयनांश—अयन के अंश । हिन्दूमत से माना हुआ प्रथम बिन्दु और शरद सम्पात के बीच जो अन्तर है वह निश्चित बिन्दु से नापा जाता है, उसे अयनांश कहते हैं ।
अयन Procession of equinoxes
अयन क्या है ? यह जानने के लिए सम्पात बिन्दु का जानना आवश्यक है, जिसके विषय में पहिले अच्छी प्रकार समझा चुके हैं । माईवृत्त और कान्तिवृत्त एक दूसरे को जगह-जगह काटते हैं, वे ही सम्पात बिन्दु equinox ctial points हैं । इनमें १ शरद सम्पात दूसरा वसंत सम्पात है । इन्हीं दोनों बिन्दुओं को अयन भी कहते हैं । इन्हीं बिन्दुओं पर सूर्य आने से दिन रात बराबर होता है ।
इन सम्पात बिन्दुओं की वक्र गति होती है अर्थात् उल्टे चलते हैं । ( जिस प्रकार राहु केतु उल्टे चलते हैं ) । शरद सम्पात का बिन्दु अपनी पूर्व स्थिति से पीछे हटता जा रहा है इसी कारण इसे वक्र गति कहते हैं । पहिले बता चुके हैं कि अयन बिन्दु पश्चिम की ओर खिसक रहे हैं ।
इस सम्पात बिन्दु की पूर्व स्थिति, ज्योतिष शास्त्र में रेवती नक्षत्र से मानी है, परन्तु ज्योतिष चक्र ( भचक्र ) में सम्पात बिन्दु मेष के प्रथम अंश से माना गया है ।
इस सम्पात बिन्दु की वार्षिक गति होती है और यही गति अयन चलन कहलाता है । इसे विषुवत्कान्ति—बल्य पात चलन भी कहते हैं ।
जहाँ इस सायन का उपयोग होता है उसे सायन (चलित ग्रह) movable zodic कहते हैं । निरयन में स्थिर मेष के पहिले अंश से यह सम्पात बिन्दु आरम्भ होना मानते हैं और इसमें अयन का उपयोग नहीं होता इस कारण निरयन को स्थिर fixed zodic कहते हैं ।
इसी सम्पात की गति को अयनांश Procession कहते हैं । इस सम्पात का पूर्ण चक्र २५-६-८ वर्ष में अर्थात् लगभग २६०० वर्ष में पूरा होता है । इस कारण इस प्रमाण से इसकी गति १ अंश चलने को ७२ वर्ष लगते हैं । अर्थात् १ वर्ष में प्राय ५० विकला के हिसाब से अयन की गति होती है ।
अयनांश सहित ग्रह—चलित ग्रह—सायन ग्रह—सायन यत
६० : सचित्र ज्योतिष शिक्षा, प्रारम्भिक ज्ञान खण्ड
अयनांश रहित ग्रह—स्थिर ग्रह—निरयन ग्रह—निरयन मत
सायन मत को पाश्चात्य लोग भविष्य कथन में उपयोग करते हैं और उनके पंचांग में सायन ग्रह दिये रहते हैं, परन्तु हिन्दू लोग प्रायः निरयन मत से ही भविष्य कथन करते हैं। कहीं कहीं महाराष्ट्र में भी सायन मत का उपयोग करते हैं।
जो कोई ग्रह में अयनांश मिलाकर ग्रह को सायन बनाकर सायन ग्रह का उपयोग करते हैं वे सायन मत के हैं और जो सायन में से अयनांश निकाल कर ( घटा कर ) उसे निरयन बनाकर या निरयन ग्रह हो तो बिना अयनांश मिलाए ही ग्रह का बहुधा उपयोग करते हैं वे निरयन मत के हैं।
सायन मतवालों का कहना है कि ग्रह को सायन बनाकर सायन ग्रह की स्थिति पर से जो फल कहा जायगा वह सच्चा निकलेगा। निरयन मतवालों का कहना है कि बिना अयनांश मिलाए ही ग्रह की स्थिति पर से जो फल कहा जायगा वह सच्चा उतरेगा। यही सायन और निरयन वाद है अर्थात् दोनों मतवालों में इस प्रकार मतभेद है।
अयनांश का उपयोग निरयन मत में भी कई जगह होता है। जैसे भाव स्पष्ट करने के लिए निरयन सूर्य में अयनांश मिलाकर उसे सायन सूर्य बनाकर उस पर से लग्न साधन करते हैं और फिर सायन लग्न निकलने पर अयनांश घटाकर निरयन ग्रहण करते हैं। अयनांश का उपयोग आगे जन्म कुंडली आदि बनाने के गणित में काम पड़ेगा इस लिए इसको जानना आवश्यक है।
किसी वर्ष के अयनांश निकालने की ग्रह छाषण मत के अनुसार सरल रीति :— शाके ४४४ में रेवती का तारा सम्पात बिन्दु पर था। उस समय पर से किसी वर्ष का अयनांश निकालने के लिए इष्ट, शाका में ४४४ घटाना, इसके घटाने से जो शेष बचे वही अयनांश की कला होती है। उनमें ६० का भाग देकर उनके अंश बनालें तो वही अयनांश वर्ष आरम्भ का होगा।
अयनांश— ( इष्ट शाका—४४४ ) : ६० = अयनांश
जैसे शाका १७६९ का अयनांश निकालना है तो शाका में ४४४ घटा कर शेष में ६० का भाग दिया तो उत्तर अंश कला में अयनांश आता है।
| इष्ट शाका | १७६९ | ६०) | १३२५ | (२२° | उत्तर | २२-६ अंश कला यह वर्ष |
|---|---|---|---|---|---|---|
| ४४४ | १२० | आरम्भ का अयनांश हुआ। | ||||
| शेष | १३२५ | १२५ | ||||
| १२० | ||||||
| ५ |
अध्याय १४
कुछ प्रारम्भिक ज्ञान होने के उपरान्त यही इच्छा होती है कि हमें पंचाङ्ग देखना आ जावे। पंचाङ्ग के मुख्य ५ अंग ( १ ) तिथि, ( २ ) वार, ( ३ ) नक्षत्र, ( ४ )
अध्याय १४ : ६१
योग, और ( ५ ) करण, होने से उसे पंचाङ्ग कहते हैं । ये सब क्या हैं यह बतलाने के उपरान्त पंचाङ्ग देखना बतायेंगे । पंचाङ्ग के उपरोक्त ५ अंगों के अतिरिक्त सम्बत्सर, मास, अयन, ऋतु, ग्रह स्थिति, दिनमान, सूर्यादय आदि कई और आवश्यक विषय भी पंचाङ्ग में दिये रहते हैं । इन सबको पहिले समझ लेना चाहिए । वर्ष प्रमाण आदि जानने के पूर्व काल प्रमाण प्रत्येक को जानना आवश्यक है ।
काल प्रमाण Division of Time
त्रुटि—कमल के कोमल से कोमल १ पत्र में अति नुकीली सुई चुभाने में जो समय लगता है उसे त्रुटि कहते हैं ।
निमेष—पलक झपकाने में जो समय लगता है उसे निमेष कहते हैं ।
गुरु अक्षर—एक गुरु अक्षर के उच्चारण में जो समय लगे वह गुरु अक्षर है ।
प्राण—एक गुरु अक्षर के उच्चारण में जो समय लगे उसके १० गुने समय को प्राण कहते हैं ।
भगण काल—कोई ग्रह १ भगण (३६०°) चक्कर पूरा करने में जो समय लगावे ।
सावन दिन—एक दिन सूर्यादय होने के उपरान्त दूसरे दिन के सूर्यादय होने तक का जो समय है वह सावन दिन कहलाता है ।
१०० त्रुटि=१ लय=१ तत्पर
३० मुहूर्त=१ दिन रात
३० लय=१ निमेष
७ दिन=१ सप्ताह
१० गुरु अक्षर=१ प्राण=१ असु
३० दिन=१ मास
४५ निमेष=१ प्राण
१२ मास=१ वर्ष
६ प्राण=१ पल=विनाड़ी=विघटिका
३० नक्षत्र जहोरात्रि=१ सावन मास
३० सावन दिन=१ सावन मास
या=विघटी
३० चान्द्र तिथि=१ चान्द्र मास
१० विपल=१ प्राण या असु
१ संक्रांति से दूसरी संक्रांत तक } =१ सौर मास
६० विनाड़ी=१ नाड़ी=घटी
१२ मास (१ वर्ष)=१ दिव्य दिन
(पल)=घड़ी-दंड
३६० वर्ष=१ दिव्य वर्ष
६० नाड़ी=१ नक्षत्र दिन
(घटी)=जहोरात्रि=१ दिन रात
७३ घटी=१ ग्रहर
६० तत्परति विकला=१ प्रति विकला
६० प्रतिविकला=१ विकला
६० विकला=१ कला
८ ग्रहर=२४ घण्टा (होरा)
६० कला=१ अंश
=१ दिन रात
३० अंश=१ राशि
२ घटी=१ मुहूर्त
१२ राशि=१ सूचक=भगण=ज्योतिष
चक्र
• ६२ : सचित्र ज्योतिष शिक्षा, प्रारम्भिक ज्ञान खण्ड
-
६० तत्परस=१ परस
-
६० परस=१ विलिप्ता
-
६० विलिप्ता=१ लिप्ता
-
६० लिप्ता=१ विघटिका=पल
-
६० विघटिका=१ घटिका=दंड
-
६० घटिका=१ दिन रात्रि
-
६० अनुपल=१ विपल=३ सेकेण्ड
-
६० विपल=१ पल=२४ सेकेण्ड
-
६० पल=१ घड़ी=२४ मिनट
-
६० घड़ी=१ दिन रात्रि=२४ घण्टा
-
२३ विपल=१ सेकेण्ड
-
२३ पल=१ मिनट
-
२३ घड़ी=१ घण्टा
-
११३ निमेष=१ सेकेण्ड
-
१ असु (प्राण)=४ सेकेण्ड
स्मरण रहे कि अंग्रेजी समय घण्टा मिनट में रहता है। वह अर्द्ध रात्रि के १२ बजे के उपरान्त से आरम्भ होता है और हिन्दू समय घड़ी पल में सूर्योदय के उपरान्त से आरम्भ होता है।
सूर्योदय का समय प्रत्येक पंचाङ्ग में घण्टा मिनट में दिया रहता है। इष्ट समय यदि घण्टा मिनट में हो तो सूर्योदय का समय घटा देने से सूर्योदय के बाद के घण्टा मिनट निकल आवेंगे। जैसे ८ बजे दिन किसी बालक का जन्म है। पंचाङ्ग में देखा उस दिन ६ बजे प्रातः सूर्योदय है। ८ घण्टा में से ६ बजे सूर्योदय को घटाये तो शेष २ घण्टा बचे। अब दो घण्टा के घड़ी पल बना लो। २ X २१॥=४ घड़ी हुई। वस यही सूर्योदय के उपरान्त का अपना समय घड़ी पल में हुआ। इसी प्रकार जहाँ घड़ी पल में समय दिया हो आवश्यक होने पर उसके घण्टा मिनट बना लो।
नाप का प्रमाण Measurement
- ६० तत्प्रति अंगुल=१ प्रति अंगुल=व्यंगुल
- ६० व्यंगुल=१ अंगुल
| नवीन नाप | प्राचीन नाप | अंग्रेजी मील और योजन का मिलान |
|---|---|---|
| २३ इंच=१ गिरह | ८ जब की चौड़ाई=१ अंगुल | यदि १३ फुट का १ हाथ |
| ४ गिरह=१ बीता | २४ अंगुल=१ हाथ | माना जावे तो |
| ४ बीता=१ गज | ४ हाथ=१ दण्ड | १ दण्ड २ गज |
| १२ इंच=१ फुट | २००० दण्ड=१ कोस | १ कोस=४००० गज |
| ३ फुट=१ गंज | ४ कोस=१ योजन | अर्द्ध कोस (मील)=२००० गज |
| १७६० गज=१ मील | १० हाथ=१ बाँस | अंग्रेजी मील=१७६० गज |
| २ मील=१ कोस | दोनों का अन्तर=२४० गज | |
| १ नाट Knot=अक्षांश की १ कला | अंग्रेजी मील २४० गज छोटा है। | |
| इस प्रकार | ||
| ४ कोस=१ योजन में=१६२० |
अध्याय १४ : ६३
१ नाट=१०१५ साधारण
मील=२०२८ गज
गज या मील-गज
१-१६० का
अन्तर पड़ेगा
∴ १ योजन=१३१/३ मील
या=मील-गज
१-१६०
[ १ ] युग प्रमाण
काल प्रमाण जानने के उपरान्त युग प्रमाण भी जानना चाहिए, क्योंकि पंचाङ्ग में दिया रहता है कि कलियुग के इतने वर्ष बीत गये हैं इत्यादि ।
कलियुग ४३२००० वर्ष का होता है । कलियुग का दूना द्वापर, तिगुना त्रेता, चोगुना सतयुग होता है । इन ४ युग का १ महायुग होता है । ७१ महायुग का १ मन्वंतर और १००० महायुग का १ कल्प या ब्रह्मा का एक दिन होता है । ३६० कल्प का ब्रह्मा का १ वर्ष होता है । प्रत्येक मन्वंतर के आदि और अन्त में सतयुग प्रमाण की १ संधि होती है । संधि को प्रलय काल भी कहते हैं । १५ संधि समेत एक मन्वंतर का १ कल्प होता है । ब्रह्मा की आयु ३६० कल्प X १०० वर्ष की होती है ।
| सतयुग=१७२८००० वर्ष | मनु १४ हैं उनके नाम | वर्तमान कल्प के |
|---|---|---|
| त्रेता=१२९६००० ,, | १ स्वायम्भुव | आरम्भ से ७ संधियों |
| द्वापर=८६४००० ,, | २ स्वारोचिष | समेत ६ मनु व्यतीत |
| कलियुग=४३२००० ,, | ३ उत्तमज (औत्तमि) | हो चुके हैं उनके नाम- |
| १ महायुग=४३२०००० वर्ष | ४ तामस | (१) स्वायम्भुव मनु |
| ७१ महायुग=१मन्वंतर= | ५ रैवत | (२) स्वरोचिष ,, |
| ३०६७२०००० वर्ष | ६ चाक्षुष | (३) उत्तमज ,, |
| १००० महायुग=१ कल्प | ७ वैवस्वत | (औत्तमि) ,, |
| ४३२००००००० वर्ष | ८ सावणि | (४) तामस ,, |
| =ब्रह्मा का १ दिन | ९ दश सावणि | (५) रैवत ,, |
| ३६० कल्प=१ वर्ष ब्रह्मा का | १० ब्रह्मा ,, | (६) चाक्षुष ,, |
| आयु १०० वर्ष | ११ धर्म ,, | इस समय सातवाँ |
| प्रत्येक मन्वंतर के आदि और | १२ रुद्र ,, | वैवस्वत मनु वर्तमान |
| अन्त से १ संधि सतयुग | १३ देव ,, | हैं । इसके आरम्भ से |
| प्रमाण=१७२८००० | १४ इन्द्र ,, | आज तक २७ महायुग |
बीत चुके हैं २८ वें महायुग में ३ युग बीत कर चौथा युग कलियुग वर्तमान है ।
६४ : सचित्र ज्योतिष शिक्षा, प्रारम्भिक ज्ञान खण्ड
प्रत्येक मन्वंतर के आदि अन्त में प्रलय काल की सन्धि होती है । इस प्रकार ६
मन्वंतर में आदि सन्धि मिलकर ७ सन्धि गत हो चुकी और सातवें मन्वंतर के २७
महायुग बीत चुके हैं। अब देखना है कि कलियुग के आरम्भ तक कितने वर्ष व्यतीत
हो चुके हैं ।
१ महायुग=४३२००० 0 वर्ष
१९२७
१ सन्धि-१२२८००० १ सतयुग १७२८०००
२७ र त्रेता १२९६०००
& २७ महायुग-1१६६४००००,, ७ संधि=१२०९६००० ३ द्वापर ८६४०००
१ सतयुग=४३२००० % ४=१७२७८००० वर्ष
२ त्रेता= » %३=१२९६००० ,,
३ इपर= २ > रेप ८६४००० २
४ कलियुगः » %१- ४३२००० ,,
एकं महायुग=४३२०००० „,
% ७१
७१ महायुग=१ मन्वंतर=३०६७२०००० ,,
२६):
६ मन्वेतर "११११ २१८४०३२००० ०,
इनकी ७ संधियाँ ‡ १२०९६०००,,
७ संधियों समेत ) त आ योग=१८५२४१६०००
गत २७ महायुग 1. ११६६४०००० ,,
योग=१९६९०५६००० ,:
0गत ३ युग सतयुग ;
चेता,दापर के वर्ष || WU F000 कट
योग=१९७२९४४००० ,,
कलि आरम्भ होने के समय । से सन् ईस्वी आरम्भ तक] 1२१०२
योग=१९७२९४७१०२ ,,
0 ३युग=३८८८०००
यहाँ ६ मन्वंतर. के वर्ष निकाल
कर उनकी संधियाँ जोड़ी तो
गत ६ मन्वंतर तक के वर्ष
हुए । वर्तमान सातवें मन्वंतर
में २७ महायुग बीत चुके है।
इससे इनके वर्ष और जोड़ा ।
२८ थें महायुग में ३ युग केवल
बीते हुँ, इस कारण ३ युग
के वर्षे और जोड़े तो कलियुग
आरम्भ होने तक के सृष्टि
आरम्भ के वर्ष निकल आये ।
सन् ईस्वी के आरम्भ तक
कलियुग के गत वर्ष .३१०२
और जोड़ा तो सन् ईस्वी
आरम्भ समय तक. के वर्ष सृष्टि आरम्भ के प्राप्त हुए ।
सृष्टि आरम्भ होने से वर्तमान कलियुग आरम्भ होने तक १९७२९४४००० वर्ष याः
ईसा के जन्म समय तक ( सन् ईस्वी आरम्भ होने तंक ) = १९७२९४१०२ वर्षं हो
चुके हैं ।
इसके आगे वर्तमान सन ईस्वी जोड़ दो तो वर्तमान सन ईस्वी तक सृष्टि आरंभ
होने का वर्ष निकल आयेगा ।
या द्वापर तक के वर्ष १९७२९४४००० में ३०४५ ओर जोड़ दो तो सम्वत
आरम्भ होने तक का सृष्टि आरम्भ का समय निकल आयगा.।
£)
व्यव्याय १४ : ६५
सन् ईस्वी के ३१०२ वर्ष पहिले कलियुग आरम्भ हुआ था। सन् ईस्वी आरम्भ होने के ५७ वर्ष पहिले विक्रम सम्बत प्रचलित हुआ था। इस प्रकार (३१०२-५७)= ३०४५ वर्ष हुए। ये वर्ष, सम्बत के आरम्भ होने के समय तक के कलि के गत वर्ष हुए।
हापर तक के वर्ष } इतने वर्ष सृष्टि आरंभ से सम्बत आरंभ सम्बत आरंभ तक कलि वर्ष+ ३०४५ } तक के हुए।
योग १९७२९४७०४५
इसमें इष्ट सम्बत और जोड़ दो तो इष्ट सम्बत तक के वर्ष प्राप्त होंगे।
कलियुग-सन् ईस्वी के ३१०२ B. C. ( बी. सी. ) ( इतने वर्ष पहिले ) आरंभ हुआ था। सम्बत २००० में ५०४४ वर्ष कलि के बीत चुके और ४२६९५९ वर्ष व्यतीत होने को शेष रहे। ता० १८ फरवरी ३१०२ बी.सी. (ईशा के जन्म के पहिले) अर्धरात्रि से कलियुग आरम्भ हुआ था। भाद्रपद मास, कृष्णपक्ष १३ रविवार आश्लेषा नक्षत्र व्यतीपात योग में अर्धरात्रि के समय कलियुग की उत्पत्ति हुई थी।
इस प्रकार यह कलियुग का प्रथम चरण है, ब्रह्मा का दूसरा पहर है, श्वेत वाराह कल्प है और वैवस्वत मन्वन्तर है। जब कलियुग आरम्भ हुआ था सूर्य चन्द्र आदि सब ग्रह एक ही राशि पर थे।
विक्रमादित्य ने ५७ बी. सी. में पहिले विदेशियों को भारत से भगाया था, उस समय से विक्रम सम्बत चला है। ईसा के जन्म के ७८ वर्ष के उपरान्त शालिवाहन राजा ने शाका चलाया है।
[ २ ] वर्ष प्रमाण—
| वर्ष ---|--- शाके + ७८ वर्ष=सन् ईस्वी | सन् ईस्वी—५८३=सन् हिजरी सम्बत—५७ ,, ,, ,, | सन् हिजरी—१००=सन् फसली सन् ईस्वी+५७,,=सम्बत | सन् फसली—१ =बंगला सन् ,, -७८ =शाका | सम्बत—१३५ =शाका |
विक्रम सम्बत चैत्र शुक्ल प्रतिपदा से आरंभ होता है। सन् ईस्वी में सम्बत बनाने में यह ध्यान रहे कि सम्बत मार्च के महिना में बदल जाता है और पूस मास में सन् बदलता है। इस प्रकार एक सम्बत् में २ सन् या १ सन् में २ सम्बत् आ जाते हैं। इस कारण मास का विचार कर सन् या संवत् का निर्णय करना चाहिए। अर्थात् संवत् में ५७ घटाने से जो सन् आता है वह वर्ष आरम्भ का सन् होता है। आगे पूस में सन् बदल कर दूसरा सन् लग जाता है। जैसे सम्बत् २००२-५७=१९४५ सन् ईस्वी, यह सन् सम्बत् के आरम्भ में होगा और सम्बत् २००२ के पूस मास में सन् बदल कर १९४६ सन् हो जायगा।
५
१६ : सचित्र ज्योतिष शिक्षा, प्रारम्भिक ज्ञान खण्ड
वर्ष मान—वर्ष ४ प्रकार के हैं
दि० घ० पल = सूर्य १२ राशियों में १ बार घूम ( १ ) सौर वर्ष = ३६५ १५ ३० लेने से होता है। इस प्रकार १२ सौर मास का १ वर्ष होता है।
दि० घ० पल = शुक्ल प्रतिपदा से अमावस तक १२ ( २ ) चांद्र वर्ष = ३५४ ३० ० मास का या मलमास होने से १३ मास का एक वर्ष होता है।
( ३ ) सावन वर्ष = ३६० सावन दिन का=१२ सावन मास का दि० घ० पल=१२ नाक्षत्र मास का १ वर्ष
( ४ ) नाक्षत्र वर्ष= ३२४ ० ०
सम्बत्सर
पंचांग में सम्बत्सर का नाम दिया रहता है। संकल्प तर्पण आदि में जिसका उपयोग होता है और इससे फल भी बिचारते हैं
सम्बत्सर ६० होते हैं। किसी शाका में २४ जोड़कर ६० का भाग देने से जो शेष बचे उसी क्रमानुसार सम्बत्सर का नाम होता है। जैसे शाका १८५६+२४÷६०= १६० शेष २०=२० व्यय नाम का सम्बत्सर हुआ या सम्बत्+९÷६०= शेष सम्बत्सर। जैसे सम्बत् १९९९+९=२०००=शेष २० व्यय सम्बत्सर।
इसके अनुसार सम्बत्सर होता है, परन्तु कभी २ एक सम्बत् में २ सम्बत् आ जाते हैं। सम्बत् १९९३ में २२ वाँ सर्वधारी सम्बत्सर के उपरान्त २३ वाँ विरोधी सम्बत्सर भी उसी वर्ष लग गया था, जिससे १ अधिक हो जाता है। वास्तव में गुरु की गति के अनुसार गणित से सम्बत्सर निकाले जाते हैं। यहाँ तो सम्बत्सर निकालने की मोटी रीति दी है।
सम्बत्सर के नाम
| १ प्रभव | १६ चित्रभानु | ३१ हेमलम्बी | ४६ परिधावी |
|---|---|---|---|
| २ विभव | १७ सुभानु | ३२ विलंबी | ४७ प्रमादी |
| ३ शुक्ल | १८ तारण | ३३ विकारी | ४८ आनन्द |
| ४ प्रमोद | १९ पाथिब | ३४ श्रावरी | ४९ राक्षस |
| ५ प्रजापति | २० व्यय | ३५ प्लव | ५० नल |
| ६ अंगिरा | २१ सर्वजित् | ३६ शुभकृत् | ५१ पिंगल |
| ७ श्रीमुख | २२ सर्वधारी | ३७ शोभन | ५२ कालयुक्त |
| ८ भाव | २३ विरोधी | ३८ क्रोधी | ५३ सिद्धार्थ |
| ९ युवा | २४ विकृति | ३९ विश्वावसु | ५४ रौद्र |
| १० घाता | २५ खर | ४० पराभव | ५५ दुर्मति |
| ११ ईश्वर | २६ नन्दन | ४१ प्लवंग | ५६ दुर्दुभि |
| १२ बहुधान्य | २७ विजय | ४२ कीलक | ५७ संधिरोदगारी |
| १३ प्रमाथी | २८ जय | ४३ होम्य | ५८ रक्ताक्षी |
| १४ विक्रम | २९ मन्मथ | ४४ साधारण | ५९ क्रोधन |
| १५ वृष | ३० दुर्मुख | ४५ विरोधकृत् | ६० क्षय |
अध्याय १४ : ६७
जैसे सम्बत २००३+९=२०१२÷६०=शेष ३२+१=३३ विकारी सम्बत्सर । गुरु मध्यमगति जितने समय में १ राशि चलता है उसे सम्बत्सर कहते हैं । गुरु के १ अगण में १२ सम्बत्सर या ४३३२.३२०६ सावन दिन होते हैं । या १ सम्बत्सर में ३६१.०२६७२ सावन दिन होते हैं ।
[ ३ ] अयन
अयन २ होते हैं १ उत्तरायण २ दक्षिणायन
१ उत्तरायण=मकर संक्रांति से आरम्भ होता है और मिथुन संक्रांति की समाप्ति- तक रहता है । इसमें दिन क्रम-क्रम से बढ़ता है ।
२ दक्षिणायन—कर्क संक्रांति से लेकर धनु संक्रांति के अन्त तक दक्षिणायन सूर्य कहलाता है इसमें रात्रि क्रम-क्रम से बढ़ती है । इसमें, जो संक्रांति की राशियाँ बताई हैं वे सायन नहीं हैं अर्थात् निरयन हैं ।
[ ४ ] गोल
गोल २ हैं । आकाश के २ भाग इस प्रकार किए जाय कि ऊपर भाग के मध्य में आकाश का उत्तर ध्रुव हो और दूसरे भाग के मध्य में दक्षिण ध्रुव हो तो पहिले को उत्तर गोल और दूसरे को दक्षिण गोल कहेंगे ।
सायन, मेघ, वृष, मिथुन, कर्क, सिंह और कन्या ६ ये राशियाँ उत्तर गोल में हैं और शेष ६ राशियाँ सायन तुला, वृश्चिक, धन, मकर, कुंभ और मीन ये ६ राशियाँ दक्षिण गोल में हैं ।
[ ५ ] ऋतुएँ
१२ मास में ६ ऋतुएँ होती हैं ।
| अयन | ऋतु | सूर्य | चन्द्रमास |
|---|---|---|---|
| १ उत्तरायण | १ शिशिर | मकर-कुंभ | माघ-फाल्गुन |
| " | २ वसन्त | मीन-मेघ | चैत-वैशाख |
| " | ३ ग्रीष्म | वृष-मिथुन | ज्येष्ठ-अषाढ |
| २ दक्षिणायन | ४ वर्षा | कर्क-सिंह | भाद्रपद-आश्विन |
| " | ५ शरद | कन्या-तुला | कार्तिक |
| " | ६ हेमंत | वृश्चिक-धन | मार्गशीर्ष-पौष |
अध्याय १५
[ ६ ] मास और पक्ष विचार ( Month and fortnight )
मास ४ प्रकार के हैं—
१ चान्द्रमास = लुप्त प्रतिपदा से अमावस्या तक १ चान्द्रमास है ।
२ सौरमास = सूर्य की १ संक्रांति से दूसरी संक्रांति तक ।
६८ • सचित्र ज्योतिष शिक्षा, प्रारम्भिक ज्ञान खण्ड
सूर्य जब १ राशि से दूसरी राशि में प्रवेश करता है उस समय दूसरी राशि की संक्रान्ति होती है। जैसे भेष राशि के बाद सूर्य वृष राशि में जिस दिन आया उसी दिन वृष की संक्रान्ति कहलायगी।
३ सावन-मास = ३० सावन दिन = सूर्य के एक उदय से दूसरे उदय तक के समय को १ सावन दिन कहते हैं। इस प्रकार ३० दिन का १ सावन मास होता है। सावन दिन यह नाक्षत्र दिन से ४ मिनट बड़ा होता है। सावन दिन का मान समान नहीं होता, इस कारण मध्यम सावन दिन का मान लिया जाता है और उसी का समय चक्रियों से जाना जाता है।
४ नाक्षत्र मास=आश्विनी आदि २७ नक्षत्रों में चन्द्र एक बार पूरा घूम लेता है तब चन्द्र मास होता है।
चन्द्र के बारह मास के नाम
| १ चैत्र ( चैत ) | ४ आषाढ़ ( आसाढ़ ) | ७ आश्विन ( कुआर ) | १० पौष ( पूस ) |
|---|---|---|---|
| २ वैशाख | ५ आषाढ़ ( सावन ) | ८ कार्तिक ( कासिक ) | ११ माघ |
| ३ ज्येष्ठ ( जेठ ) | ६ भाद्रपद ( भादों ) | ९ मार्गशीर्ष ( अगहन ) | १२ फाल्गुन ( फागुन ) |
इन महीनों के उपरोक्त नाम पड़ने का कारण यह है कि इन महीनों की पूर्णिमा के लगभग ये नक्षत्र पड़ते हैं।
| क्रम | चन्द्रमास | नक्षत्र | क्रम | चन्द्रमास | नक्षत्र | क्रम | चन्द्रमास | नक्षत्र |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| १ | चैत्र | चित्रा | ५ | आषाढ़ | श्रवण | ९ | मार्गशीर्ष | भृगुशिरः |
| २ | वैशाख | विशाखा | ६ | भाद्रपद | भाद्रपद | १० | पौष | पुष्य |
| ३ | ज्येष्ठ | ज्येष्ठा | ७ | आश्विन | आश्विनी | ११ | माघ | मघा |
| ४ | आषाढ़ | आषाढ़ा | ८ | कार्तिक | कृतिका | १२ | फाल्गुन | फाल्गुनी |
चन्द्र मास २ प्रकार के हैं।
१ अमान्त मास=शुक्ल प्रतिपदा से अमावस्या तक १ मास होता है। यह दक्षिण में और महाराष्ट्र देश में चालू है।
२ पूर्णिमांत मास=कृष्ण प्रतिपदा से पूर्णिमा तक १ मास यह उत्तर भारत में चालू है।
दोनों प्रकार के मास में कोई अन्तर नहीं आता, क्योंकि एक जगह पूर्णिमा या अमावस्या हुई तो सबत्र ही उस दिन पूर्णिमा या अमावस्या अवश्य होगी। केवल मास गणना में कृष्ण पक्ष में अपने यहाँ १ मास का अन्तर पड़ जाता है। जैसे अपने यहाँ चैत्र कृष्णपक्ष हुआ तो महाराष्ट्र लोग उसे फाल्गुन कृष्ण पक्ष कहेंगे अर्थात् कृष्ण पक्ष में अपने मास से १ मास कम महाराष्ट्र लोगों का मास होता है। मराठी पंचांग मिले तो कृष्णपक्ष में १ मास बढ़ा कर लेना चाहिए। परन्तु शुक्ल पक्ष में दोनों प्रकार के पञ्चांग में कोई अन्तर नहीं पड़ता।
मास और पक्ष विचार : ६९
बंगला मास
सूर्य की नियरम-संक्रांति से आरम्भ होता है और मेपाकं ( मेघ की संक्रांति ) से नया बंगला सन् आरम्भ होता है । मीनाकं से चैत्र मास आरम्भ होता है और मेपाकं में वैशाख मास होता है । जब वर्ष आरम्भ होता है तब संक्रांति जिस दिन होती है उसके दूसरे दिन से बंगला की पहली तारीख ( तिथि ) गिनी जाती है । किसी महीने में २९, ३०, ३१ या कभी ३२ दिन पड़ जाते हैं ।
अंग्रेजी महिनों के नाम
क्रम अंग्रेजी दिन चान्द्रमास क्रम अंग्रेजी दिन चान्द्रमास क्रम अंग्रेजी दिन चान्द्रमास
महीना
महीना
महीना
| १ जनवरी ३१ पूस | ५ मई ३१ वैशाख | ९ सितम्बर ३० भाद्रपद |
|---|---|---|
| २ फरवरी २८ माघ | ६ जून ३० ज्येष्ठ | १० अक्टूबर ३१ आश्विन |
| ३ मार्च ३१ फाल्गुन | ७ जुलाई ३१ आषाढ़ | ११ नवम्बर ३० कार्तिक |
| ४ अप्रैल ३० चैत्र | ८ अगस्त ३१ श्रावण | १२ दिसम्बर ३१ मार्गशीर्ष |
प्लुत वर्ष=Leap year जीप इयर=में फरवरी २९ दिन की होती है । जिस सन् में ४ का भाग पूरा लग जाय या सदी century में ४०० का भाग पूरा लग जावे तो उसे प्लुत वर्ष कहते हैं । शेष वर्षों में फरवरी २८ दिन की होती है ।
मुसलमानी महिनों के नाम अर्थात् हिजरी सन् के महीने
| १ मोहर्रम | ५ जमादि उल अब्बल | ९ रमजान |
|---|---|---|
| २ सफर | ६ जमादिउल आखर ( सानी ) | १० सव्वाल |
| ३ रबिउल अब्बल | ७ रज्जब | ११ जीकाद |
| ४ रबिउल आखर ( सानी ) | ८ सावान ( शववान ) | १२ जिल हिज्ज |
चाँद दिखने से महीना आरम्भ होता है और इनमें लौट का वष या अधिक मास नहीं होता । इस कारण प्रत्येक तीसरे वर्ष इनके महीनों से अन्तर पड़ता रहता है अर्थात् कभी मुहर्रम जाड़े में कभी बरसात में कभी गरमी में पड़ता है । मुहर्रम की १ तारीख से हिजरी सन् आरम्भ होता है और चाँद दिखने के दूसरे दिन महीने की पहली तारीख होती है । कभी २९ दिन कभी ३० दिन का महीना चन्द्र की तिथि की घटा बढ़ी के अनुसार होता है ।
फसली सन् में महीना प्रत्येक कृष्ण पक्ष की प्रतिपदा से आरम्भ होता है और रमजान महीना से नया सन् आरम्भ होता है । इसमें भी चन्द्र स्थिति के अनुसार कभी २९ कभी ३० दिन हो जाते हैं ।
सौर मास और संक्रांति
सूर्य जब १ राशि के अन्त में जाकर दूसरी राशि में संक्रमण करता है ( जाने लगता है ) तब उसे संक्रांति कहते हैं । अर्थात् जब २ राशियों की संधि पर सूर्य आता है तब आगे की राशि की संक्रांति होती है । इस प्रकार प्रत्येक सौर मास में एक संक्रांति होती है । जिस राशि पर सूर्य जाता है उस राशि की संक्रांति कहलाती है ।
७० : सचित्र ज्योतिष शिक्षा, प्रारम्भिक ज्ञान खण्ड
जैसे धन का अन्त होने पर सूर्य मकरराशि में जाता है तो वह मकर-संक्रांति कहलावेगी। अर्थात् सूर्य ने मकर राशि में संक्रमण किया ऐसा कहेंगे।
मेष से तुला संक्रांति को विषुव संक्रांति कहते हैं।
कर्क से मकर संक्रांति को अयन संक्रांति कहते हैं।
अधिक मास
जिस चान्द्र मास में सूर्य की संक्रांति नहीं होती उसे अधिक मास कहते हैं। अर्थात् जब दो पक्ष में संक्रांति नहीं होती तो उसे अधिक मास कहते हैं। जैसे सम्बत् १९९९ में वैशाख कृष्ण १३ (ता० १३ अप्रैल) को मेष संक्रांति हुई। ज्येष्ठ कृष्ण १४ को (ता० १४ मई) वृष की संक्रांति हुई। इसके उपरान्त फिर (ता० १४ जून) शुद्ध ज्येष्ठ शुक्ल प्रतिपदा को मिथुन राशि पर सूर्य गया अर्थात् मिथुन की संक्रांति हुई। वृषार्क शुद्ध ज्येष्ठ कृष्ण पक्ष की १४ तिथि को था, उसके बाद अधिक ज्येष्ठ शुक्ल पक्ष और फिर अधिक ज्येष्ठ कृष्ण पक्ष बीत गया, परन्तु इन दोनों के बीच संक्रांति नहीं हुई। इस कारण ये दोनों पक्ष अधिक मास माने गये। इसके पहिले का ज्येष्ठ कृष्ण शुद्ध माना गया और फिर उसके बाद जो अधिक २ पक्ष बड़े उनमें से १ का नाम अधिक ज्येष्ठ शुक्ल पक्ष पड़ा और उसके आगे फिर अधिक ज्येष्ठ कृष्ण पक्ष माना गया। ये दोनों अधिक पक्ष व्यतीत हो जाने पर शुद्ध ज्येष्ठ शुक्ल प्रतिपदा को मिथुन की संक्रांति हुई। इससे वह शुद्ध ज्येष्ठ मास माना गया।
३२ मास १६ दिन ४ घड़ी बीतने पर अधिक मास होता है। अर्थात् तीसरे वर्ष अधिक मास होता है और उस वर्ष में १३ मास हो जाते हैं।
अधिक मास को मल्ल मास या पुष्पोत्सव मास कहते हैं। चन्द्र मास के गणित से वर्ष में ३५४ दिन ९ घंटे और सूर्य मास के वर्ष में ३६५ दिन ६ घंटे प्रायः होते हैं। इस कारण सूर्य और चन्द्र के दिनों का अन्तर अधिक मास होने से बराबर हो जाता है।
क्षय मास
जिस चान्द्र मास के २ पक्ष में २ संक्रांति होती है उसे क्षयमास कहते हैं। क्षय मास केवल कार्तिक आदि ३ महीनों में पड़ता है और महीनों में नहीं पड़ता। जिस वर्ष क्षय मास होता है उस वर्ष एक वर्ष के भीतर २ अधिक मास होते हैं।
यह कई वर्षों में पड़ता है। यदि भाद्रपद अधिकमास होगा तो सूर्य की गति अधिक होने से मार्ग शीर्ष में २ संक्रांति वाला क्षयमास होगा और सूर्य की गति अल्प हो जाने के कारण चैत्र मास भी अधिक होगा।
जिस सम्बत् में क्षयमास होता है उसके १४१ या १९ वर्ष उपरान्त पुनः क्षयमास होना सम्भव होता है अर्थात् कभी १४१ वर्ष में कभी १९ वर्ष में संभव होता है।
जैसे सम्बत् १७४ में क्षयमास होकर पुनः आगे सम्बत् (१७४ + १४१) = १११५ में और (१११५ + १४१) = १२५६ सम्बत् में क्षय मास होगा, इसी प्रकार आगे और भी जानें। शविष्य में सम्बत् २०२० में क्षय मास होगा।