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सचित्र ज्योतिष शिक्षा (प्रारम्भिक ज्ञान खण्ड) भाग १

सचित्र ज्योतिष शिक्षा (प्रारम्भिक ज्ञान खण्ड) भाग १

Sachitra Jyotisha Shiksha (Prarambhika Gyan Khand) Vol 1

बाबूलाल ठाकुर द्वारा

स्रोत: Motilal Banarsidass Edition · Motilal Banarsidass, Delhi (उद्गम)

DevanagariHindipublished288 पृष्ठ

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सम्पात : ५५

अस्त—सूर्य से अल्प गति वाले ग्रह ( मंगल, शुक्र, शनि ) सूर्य से, अपने कालांश के भीतर होने से पश्चिम दिशा में अस्त होते हैं और अधिक गति वाला ग्रह चंद्र अपने कालांश के भीतर सूर्य के समीप आ जाने पर पूर्व दिशा में अस्त होता है ।

वक्री बुध, शुक्र का कालांश १° कम लेना अर्थात् बुध का कालांश १२° है तो वक्री बुध का ११° लेना । शुक्र का ९° है तो वक्री शुक्र का ८° लेना । वक्रीग्रह होने के कारण कालांश कम लिया जाता है ।

अध्याय १२

सम्पात equinox

पहिले बता चुके हैं कि क्रांतिवृत्त और नाडीवृत्त दोनों पृथक्-पृथक् वृत्त हैं, जो एक दूसरे को २३° २८' का तिरछा कोण बनाते हुए दो स्थानों में काटते हैं, जिससे दो पृथक्-पृथक् भाग हो जाते हैं । देखें चित्र संख्या ६१ ।

चित्र संख्या ६१—सम्पात बिन्दु

भाग ( १ ) क्रांतिवृत्त का ऊपर का आधा भाग सं० ति० प० और नाडीवृत्त का नीचे का आधा भाग सं० दो० पा० ।

भाग ( २ ) क्रांतिवृत्त का नीचे का आधा भाग सं० का० पा० और नाडीवृत्त का ऊपर का आधा भाग सं० ना० पा० ।

जहाँ एक दूसरे को काटते हैं वे दो बिन्दु सं० और पा० संपात बिन्दु हैं ।

इनमें से १ सं० को अयन मेघ या सायन मेघ या वसंत सम्पात Autumnal equinox कहते हैं । दूसरे को अयनतुला या सायनतुला या शरद सम्पात Autumnal equinox कहते हैं ।

इस प्रकार सूर्य क्रांति वृत्त में घूमते हुए दो बार नाडीवृत्त को पार करता है, उस समय दिन रात बराबर होता है ।

क्रांतिवृत्त की बक़ता के ही कारण सूर्य ६ मास उत्तर और ६ मास दक्षिण को उदय होता है । इसी से सूर्य की उत्तरायण और दक्षिणायन संज्ञा होती हैं ।

ज्यों ज्यों अयन बिन्दु के आगे बढ़ते हुए सूर्य जाता है त्यों त्यों दिन बढ़ता जाता