सचित्र ज्योतिष शिक्षा (प्रारम्भिक ज्ञान खण्ड) भाग १
Sachitra Jyotisha Shiksha (Prarambhika Gyan Khand) Vol 1
बाबूलाल ठाकुर द्वारा
स्रोत: Motilal Banarsidass Edition · Motilal Banarsidass, Delhi (उद्गम)
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राहु केतु सदा बक्ती रहते हैं। सूर्य और चन्द्रमा कभी बक्ती नहीं होते। शेष ग्रह बक्ती मार्गी होते रहते हैं।
उदय अस्त ज्ञान Heliacal rising and setting of planets
सूर्य के पास कोई ग्रह आ जाने से उस ग्रह को अस्त होना कहते हैं। यदि वह ग्रह सूर्य के आगे चला जावे तो उसे उदय होना कहते हैं।
सूर्य के पास ग्रह आ जाने से ग्रह नहीं दिखता इस कारण उसे अस्त कहते हैं। जब सूर्य के दूर चले जाने के कारण वह ग्रह दिखने लगता है तो उसे उदय होना कहते हैं।
सूर्य को छोड़कर शेष ग्रहों का उदय अस्त होता है। इसमें भी यह प्रमाण है कि सूर्य से विशेष अंश दूर हो जाने पर कोई ग्रह दिखने लगता है कोई नहीं दिखता।
सूर्य के कितने अन्तर पर ग्रह चले जाने पर दिखने लगता है अर्थात् उदय होता है, नीचे दिया है। सूर्य से इतने अंशों के भीतर ग्रह हो तो वह ग्रह अस्त ही समझा जायेगा। जैसे सूर्य से चन्द्र का अन्तर १२ अंश के भीतर रहने तक चन्द्र अस्त ही रहेगा ( नहीं दिखेगा ) परन्तु १२° हो जाने पर चन्द्र उदय होगा ( दिखने लगेगा )। इसी प्रकार सब ग्रहों के विषय में समझना।
ग्रहों का कालांश
| ग्रह | चन्द्र | मंगल | बुध | गुरु | शुक्र | शनि |
|---|---|---|---|---|---|---|
| सूर्य से अंतर-कालांश ( अंशोंमें ) | १२ | १७ | १३ | ११ | ९ | १५ |
इस अन्तर को कलांश भी कहते हैं।
अस्तोदय—२ प्रकार का है। एक तो प्रति दिन ग्रह उदय होते हैं और अस्त होते हैं। यहाँ जो बताया गया है वह इससे भिन्न है अर्थात् सूर्य के पास जब ग्रह होता है तो अस्त होना कहा जाता है। जब सूर्य के पास ग्रह होता है तो उसे सूर्य संनिध भी कहते हैं। उदय अस्त को और भी अच्छी तरह समझाते हैं।
उदय—सूर्य से अल्प गति वाले ग्रह ( मंगल, गुरु, शनि ) सूर्य से कालांश तुल्य अंतर पर ( कालांश अंतर जो ऊपर बताया है ) पूर्व दिशा में और थोड़ी रात्रि रहने पर उदय होते हैं सूर्य से अधिक गति वाला ग्रह चंद्र है। यह सूर्य से, अपने कालांश से अधिक होने पर पश्चिम दिशा में संध्या को उदय होता है। बुध, शुक्र, के लिये विशेष बात यह है कि ये सूर्य के अधिक पास हैं। ये दोनों दिशाओं ( पूर्व और पश्चिम ) से उदय और अस्त होते हैं। क्योंकि ये दोनों ग्रह वक्र होकर फिर सूर्य के कालांश तुल्य अंतर में आ जाने से इनका अस्त और उदय होता है अर्थात् दोनों ग्रह सूर्य से अधिक गति वाले होने के कारण अपने कालांश अन्तर होने पर सूर्य के आगे पश्चिम में संध्या को उदय होते हैं फिर वक्र होकर सूर्य के पास आकर पश्चिम में ही इनका अस्त होता है। फिर वक्र गति ही से सूर्य के पीछे होकर अपने कालांश अन्तर पर पूर्व दिशा में थोड़ी रात्रि रहने पर उदय होते हैं फिर मार्गी होकर पूर्व में ही अस्त होते हैं।