सचित्र ज्योतिष शिक्षा (प्रारम्भिक ज्ञान खण्ड) भाग १
Sachitra Jyotisha Shiksha (Prarambhika Gyan Khand) Vol 1
बाबूलाल ठाकुर द्वारा
स्रोत: Motilal Banarsidass Edition · Motilal Banarsidass, Delhi (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें६० : सचित्र ज्योतिष शिक्षा, प्रारम्भिक ज्ञान खण्ड
अयनांश रहित ग्रह—स्थिर ग्रह—निरयन ग्रह—निरयन मत
सायन मत को पाश्चात्य लोग भविष्य कथन में उपयोग करते हैं और उनके पंचांग में सायन ग्रह दिये रहते हैं, परन्तु हिन्दू लोग प्रायः निरयन मत से ही भविष्य कथन करते हैं। कहीं कहीं महाराष्ट्र में भी सायन मत का उपयोग करते हैं।
जो कोई ग्रह में अयनांश मिलाकर ग्रह को सायन बनाकर सायन ग्रह का उपयोग करते हैं वे सायन मत के हैं और जो सायन में से अयनांश निकाल कर ( घटा कर ) उसे निरयन बनाकर या निरयन ग्रह हो तो बिना अयनांश मिलाए ही ग्रह का बहुधा उपयोग करते हैं वे निरयन मत के हैं।
सायन मतवालों का कहना है कि ग्रह को सायन बनाकर सायन ग्रह की स्थिति पर से जो फल कहा जायगा वह सच्चा निकलेगा। निरयन मतवालों का कहना है कि बिना अयनांश मिलाए ही ग्रह की स्थिति पर से जो फल कहा जायगा वह सच्चा उतरेगा। यही सायन और निरयन वाद है अर्थात् दोनों मतवालों में इस प्रकार मतभेद है।
अयनांश का उपयोग निरयन मत में भी कई जगह होता है। जैसे भाव स्पष्ट करने के लिए निरयन सूर्य में अयनांश मिलाकर उसे सायन सूर्य बनाकर उस पर से लग्न साधन करते हैं और फिर सायन लग्न निकलने पर अयनांश घटाकर निरयन ग्रहण करते हैं। अयनांश का उपयोग आगे जन्म कुंडली आदि बनाने के गणित में काम पड़ेगा इस लिए इसको जानना आवश्यक है।
किसी वर्ष के अयनांश निकालने की ग्रह छाषण मत के अनुसार सरल रीति :— शाके ४४४ में रेवती का तारा सम्पात बिन्दु पर था। उस समय पर से किसी वर्ष का अयनांश निकालने के लिए इष्ट, शाका में ४४४ घटाना, इसके घटाने से जो शेष बचे वही अयनांश की कला होती है। उनमें ६० का भाग देकर उनके अंश बनालें तो वही अयनांश वर्ष आरम्भ का होगा।
अयनांश— ( इष्ट शाका—४४४ ) : ६० = अयनांश
जैसे शाका १७६९ का अयनांश निकालना है तो शाका में ४४४ घटा कर शेष में ६० का भाग दिया तो उत्तर अंश कला में अयनांश आता है।
| इष्ट शाका | १७६९ | ६०) | १३२५ | (२२° | उत्तर | २२-६ अंश कला यह वर्ष |
|---|---|---|---|---|---|---|
| ४४४ | १२० | आरम्भ का अयनांश हुआ। | ||||
| शेष | १३२५ | १२५ | ||||
| १२० | ||||||
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अध्याय १४
कुछ प्रारम्भिक ज्ञान होने के उपरान्त यही इच्छा होती है कि हमें पंचाङ्ग देखना आ जावे। पंचाङ्ग के मुख्य ५ अंग ( १ ) तिथि, ( २ ) वार, ( ३ ) नक्षत्र, ( ४ )