भारतकोश
सचित्र ज्योतिष शिक्षा (प्रारम्भिक ज्ञान खण्ड) भाग १

सचित्र ज्योतिष शिक्षा (प्रारम्भिक ज्ञान खण्ड) भाग १

Sachitra Jyotisha Shiksha (Prarambhika Gyan Khand) Vol 1

बाबूलाल ठाकुर द्वारा

स्रोत: Motilal Banarsidass Edition · Motilal Banarsidass, Delhi (उद्गम)

DevanagariHindipublished288 पृष्ठ

पृष्ठ 77, कुल 288 में से

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अध्याय १३

सायन और निरयन

राशि ग्रह आदि २ प्रकार के हैं ( १ ) सायन movable ( २ ) निरयन fixed zodic

सायन—अयन सहित with Procession

निरयन—अयन रहित without Procession

अयनांश—अयन के अंश । हिन्दूमत से माना हुआ प्रथम बिन्दु और शरद सम्पात के बीच जो अन्तर है वह निश्चित बिन्दु से नापा जाता है, उसे अयनांश कहते हैं ।

अयन Procession of equinoxes

अयन क्या है ? यह जानने के लिए सम्पात बिन्दु का जानना आवश्यक है, जिसके विषय में पहिले अच्छी प्रकार समझा चुके हैं । माईवृत्त और कान्तिवृत्त एक दूसरे को जगह-जगह काटते हैं, वे ही सम्पात बिन्दु equinox ctial points हैं । इनमें १ शरद सम्पात दूसरा वसंत सम्पात है । इन्हीं दोनों बिन्दुओं को अयन भी कहते हैं । इन्हीं बिन्दुओं पर सूर्य आने से दिन रात बराबर होता है ।

इन सम्पात बिन्दुओं की वक्र गति होती है अर्थात् उल्टे चलते हैं । ( जिस प्रकार राहु केतु उल्टे चलते हैं ) । शरद सम्पात का बिन्दु अपनी पूर्व स्थिति से पीछे हटता जा रहा है इसी कारण इसे वक्र गति कहते हैं । पहिले बता चुके हैं कि अयन बिन्दु पश्चिम की ओर खिसक रहे हैं ।

इस सम्पात बिन्दु की पूर्व स्थिति, ज्योतिष शास्त्र में रेवती नक्षत्र से मानी है, परन्तु ज्योतिष चक्र ( भचक्र ) में सम्पात बिन्दु मेष के प्रथम अंश से माना गया है ।

इस सम्पात बिन्दु की वार्षिक गति होती है और यही गति अयन चलन कहलाता है । इसे विषुवत्कान्ति—बल्य पात चलन भी कहते हैं ।

जहाँ इस सायन का उपयोग होता है उसे सायन (चलित ग्रह) movable zodic कहते हैं । निरयन में स्थिर मेष के पहिले अंश से यह सम्पात बिन्दु आरम्भ होना मानते हैं और इसमें अयन का उपयोग नहीं होता इस कारण निरयन को स्थिर fixed zodic कहते हैं ।

इसी सम्पात की गति को अयनांश Procession कहते हैं । इस सम्पात का पूर्ण चक्र २५-६-८ वर्ष में अर्थात् लगभग २६०० वर्ष में पूरा होता है । इस कारण इस प्रमाण से इसकी गति १ अंश चलने को ७२ वर्ष लगते हैं । अर्थात् १ वर्ष में प्राय ५० विकला के हिसाब से अयन की गति होती है ।

अयनांश सहित ग्रह—चलित ग्रह—सायन ग्रह—सायन यत

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