सचित्र ज्योतिष शिक्षा (प्रारम्भिक ज्ञान खण्ड) भाग १
Sachitra Jyotisha Shiksha (Prarambhika Gyan Khand) Vol 1
बाबूलाल ठाकुर द्वारा
स्रोत: Motilal Banarsidass Edition · Motilal Banarsidass, Delhi (उद्गम)
पृष्ठ 85, कुल 288 में से
संदर्भ में पढ़ेंअध्याय १४ : ६७
जैसे सम्बत २००३+९=२०१२÷६०=शेष ३२+१=३३ विकारी सम्बत्सर । गुरु मध्यमगति जितने समय में १ राशि चलता है उसे सम्बत्सर कहते हैं । गुरु के १ अगण में १२ सम्बत्सर या ४३३२.३२०६ सावन दिन होते हैं । या १ सम्बत्सर में ३६१.०२६७२ सावन दिन होते हैं ।
[ ३ ] अयन
अयन २ होते हैं १ उत्तरायण २ दक्षिणायन
१ उत्तरायण=मकर संक्रांति से आरम्भ होता है और मिथुन संक्रांति की समाप्ति- तक रहता है । इसमें दिन क्रम-क्रम से बढ़ता है ।
२ दक्षिणायन—कर्क संक्रांति से लेकर धनु संक्रांति के अन्त तक दक्षिणायन सूर्य कहलाता है इसमें रात्रि क्रम-क्रम से बढ़ती है । इसमें, जो संक्रांति की राशियाँ बताई हैं वे सायन नहीं हैं अर्थात् निरयन हैं ।
[ ४ ] गोल
गोल २ हैं । आकाश के २ भाग इस प्रकार किए जाय कि ऊपर भाग के मध्य में आकाश का उत्तर ध्रुव हो और दूसरे भाग के मध्य में दक्षिण ध्रुव हो तो पहिले को उत्तर गोल और दूसरे को दक्षिण गोल कहेंगे ।
सायन, मेघ, वृष, मिथुन, कर्क, सिंह और कन्या ६ ये राशियाँ उत्तर गोल में हैं और शेष ६ राशियाँ सायन तुला, वृश्चिक, धन, मकर, कुंभ और मीन ये ६ राशियाँ दक्षिण गोल में हैं ।
[ ५ ] ऋतुएँ
१२ मास में ६ ऋतुएँ होती हैं ।
| अयन | ऋतु | सूर्य | चन्द्रमास |
|---|---|---|---|
| १ उत्तरायण | १ शिशिर | मकर-कुंभ | माघ-फाल्गुन |
| " | २ वसन्त | मीन-मेघ | चैत-वैशाख |
| " | ३ ग्रीष्म | वृष-मिथुन | ज्येष्ठ-अषाढ |
| २ दक्षिणायन | ४ वर्षा | कर्क-सिंह | भाद्रपद-आश्विन |
| " | ५ शरद | कन्या-तुला | कार्तिक |
| " | ६ हेमंत | वृश्चिक-धन | मार्गशीर्ष-पौष |
अध्याय १५
[ ६ ] मास और पक्ष विचार ( Month and fortnight )
मास ४ प्रकार के हैं—
१ चान्द्रमास = लुप्त प्रतिपदा से अमावस्या तक १ चान्द्रमास है ।
२ सौरमास = सूर्य की १ संक्रांति से दूसरी संक्रांति तक ।