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सचित्र ज्योतिष शिक्षा (प्रारम्भिक ज्ञान खण्ड) भाग १

सचित्र ज्योतिष शिक्षा (प्रारम्भिक ज्ञान खण्ड) भाग १

Sachitra Jyotisha Shiksha (Prarambhika Gyan Khand) Vol 1

बाबूलाल ठाकुर द्वारा

स्रोत: Motilal Banarsidass Edition · Motilal Banarsidass, Delhi (उद्गम)

DevanagariHindipublished288 पृष्ठ

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६८ • सचित्र ज्योतिष शिक्षा, प्रारम्भिक ज्ञान खण्ड

सूर्य जब १ राशि से दूसरी राशि में प्रवेश करता है उस समय दूसरी राशि की संक्रान्ति होती है। जैसे भेष राशि के बाद सूर्य वृष राशि में जिस दिन आया उसी दिन वृष की संक्रान्ति कहलायगी।

३ सावन-मास = ३० सावन दिन = सूर्य के एक उदय से दूसरे उदय तक के समय को १ सावन दिन कहते हैं। इस प्रकार ३० दिन का १ सावन मास होता है। सावन दिन यह नाक्षत्र दिन से ४ मिनट बड़ा होता है। सावन दिन का मान समान नहीं होता, इस कारण मध्यम सावन दिन का मान लिया जाता है और उसी का समय चक्रियों से जाना जाता है।

४ नाक्षत्र मास=आश्विनी आदि २७ नक्षत्रों में चन्द्र एक बार पूरा घूम लेता है तब चन्द्र मास होता है।

चन्द्र के बारह मास के नाम

१ चैत्र ( चैत )४ आषाढ़ ( आसाढ़ )७ आश्विन ( कुआर )१० पौष ( पूस )
२ वैशाख५ आषाढ़ ( सावन )८ कार्तिक ( कासिक )११ माघ
३ ज्येष्ठ ( जेठ )६ भाद्रपद ( भादों )९ मार्गशीर्ष ( अगहन )१२ फाल्गुन ( फागुन )

इन महीनों के उपरोक्त नाम पड़ने का कारण यह है कि इन महीनों की पूर्णिमा के लगभग ये नक्षत्र पड़ते हैं।

क्रमचन्द्रमासनक्षत्रक्रमचन्द्रमासनक्षत्रक्रमचन्द्रमासनक्षत्र
चैत्रचित्राआषाढ़श्रवणमार्गशीर्षभृगुशिरः
वैशाखविशाखाभाद्रपदभाद्रपद१०पौषपुष्य
ज्येष्ठज्येष्ठाआश्विनआश्विनी११माघमघा
आषाढ़आषाढ़ाकार्तिककृतिका१२फाल्गुनफाल्गुनी

चन्द्र मास २ प्रकार के हैं।

१ अमान्त मास=शुक्ल प्रतिपदा से अमावस्या तक १ मास होता है। यह दक्षिण में और महाराष्ट्र देश में चालू है।

२ पूर्णिमांत मास=कृष्ण प्रतिपदा से पूर्णिमा तक १ मास यह उत्तर भारत में चालू है।

दोनों प्रकार के मास में कोई अन्तर नहीं आता, क्योंकि एक जगह पूर्णिमा या अमावस्या हुई तो सबत्र ही उस दिन पूर्णिमा या अमावस्या अवश्य होगी। केवल मास गणना में कृष्ण पक्ष में अपने यहाँ १ मास का अन्तर पड़ जाता है। जैसे अपने यहाँ चैत्र कृष्णपक्ष हुआ तो महाराष्ट्र लोग उसे फाल्गुन कृष्ण पक्ष कहेंगे अर्थात् कृष्ण पक्ष में अपने मास से १ मास कम महाराष्ट्र लोगों का मास होता है। मराठी पंचांग मिले तो कृष्णपक्ष में १ मास बढ़ा कर लेना चाहिए। परन्तु शुक्ल पक्ष में दोनों प्रकार के पञ्चांग में कोई अन्तर नहीं पड़ता।