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सचित्र ज्योतिष शिक्षा (प्रारम्भिक ज्ञान खण्ड) भाग १

सचित्र ज्योतिष शिक्षा (प्रारम्भिक ज्ञान खण्ड) भाग १

Sachitra Jyotisha Shiksha (Prarambhika Gyan Khand) Vol 1

बाबूलाल ठाकुर द्वारा

स्रोत: Motilal Banarsidass Edition · Motilal Banarsidass, Delhi (उद्गम)

DevanagariHindipublished288 पृष्ठ

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१६ : सचित्र ज्योतिष शिक्षा, प्रारम्भिक ज्ञान खण्ड

वर्ष मान—वर्ष ४ प्रकार के हैं

दि० घ० पल = सूर्य १२ राशियों में १ बार घूम ( १ ) सौर वर्ष = ३६५ १५ ३० लेने से होता है। इस प्रकार १२ सौर मास का १ वर्ष होता है।

दि० घ० पल = शुक्ल प्रतिपदा से अमावस तक १२ ( २ ) चांद्र वर्ष = ३५४ ३० ० मास का या मलमास होने से १३ मास का एक वर्ष होता है।

( ३ ) सावन वर्ष = ३६० सावन दिन का=१२ सावन मास का दि० घ० पल=१२ नाक्षत्र मास का १ वर्ष

( ४ ) नाक्षत्र वर्ष= ३२४ ० ०

सम्बत्सर

पंचांग में सम्बत्सर का नाम दिया रहता है। संकल्प तर्पण आदि में जिसका उपयोग होता है और इससे फल भी बिचारते हैं

सम्बत्सर ६० होते हैं। किसी शाका में २४ जोड़कर ६० का भाग देने से जो शेष बचे उसी क्रमानुसार सम्बत्सर का नाम होता है। जैसे शाका १८५६+२४÷६०= १६० शेष २०=२० व्यय नाम का सम्बत्सर हुआ या सम्बत्+९÷६०= शेष सम्बत्सर। जैसे सम्बत् १९९९+९=२०००=शेष २० व्यय सम्बत्सर।

इसके अनुसार सम्बत्सर होता है, परन्तु कभी २ एक सम्बत् में २ सम्बत् आ जाते हैं। सम्बत् १९९३ में २२ वाँ सर्वधारी सम्बत्सर के उपरान्त २३ वाँ विरोधी सम्बत्सर भी उसी वर्ष लग गया था, जिससे १ अधिक हो जाता है। वास्तव में गुरु की गति के अनुसार गणित से सम्बत्सर निकाले जाते हैं। यहाँ तो सम्बत्सर निकालने की मोटी रीति दी है।

सम्बत्सर के नाम

१ प्रभव१६ चित्रभानु३१ हेमलम्बी४६ परिधावी
२ विभव१७ सुभानु३२ विलंबी४७ प्रमादी
३ शुक्ल१८ तारण३३ विकारी४८ आनन्द
४ प्रमोद१९ पाथिब३४ श्रावरी४९ राक्षस
५ प्रजापति२० व्यय३५ प्लव५० नल
६ अंगिरा२१ सर्वजित्३६ शुभकृत्५१ पिंगल
७ श्रीमुख२२ सर्वधारी३७ शोभन५२ कालयुक्त
८ भाव२३ विरोधी३८ क्रोधी५३ सिद्धार्थ
९ युवा२४ विकृति३९ विश्वावसु५४ रौद्र
१० घाता२५ खर४० पराभव५५ दुर्मति
११ ईश्वर२६ नन्दन४१ प्लवंग५६ दुर्दुभि
१२ बहुधान्य२७ विजय४२ कीलक५७ संधिरोदगारी
१३ प्रमाथी२८ जय४३ होम्य५८ रक्ताक्षी
१४ विक्रम२९ मन्मथ४४ साधारण५९ क्रोधन
१५ वृष३० दुर्मुख४५ विरोधकृत्६० क्षय