सचित्र ज्योतिष शिक्षा (प्रारम्भिक ज्ञान खण्ड) भाग १
Sachitra Jyotisha Shiksha (Prarambhika Gyan Khand) Vol 1
बाबूलाल ठाकुर द्वारा
स्रोत: Motilal Banarsidass Edition · Motilal Banarsidass, Delhi (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें७० : सचित्र ज्योतिष शिक्षा, प्रारम्भिक ज्ञान खण्ड
जैसे धन का अन्त होने पर सूर्य मकरराशि में जाता है तो वह मकर-संक्रांति कहलावेगी। अर्थात् सूर्य ने मकर राशि में संक्रमण किया ऐसा कहेंगे।
मेष से तुला संक्रांति को विषुव संक्रांति कहते हैं।
कर्क से मकर संक्रांति को अयन संक्रांति कहते हैं।
अधिक मास
जिस चान्द्र मास में सूर्य की संक्रांति नहीं होती उसे अधिक मास कहते हैं। अर्थात् जब दो पक्ष में संक्रांति नहीं होती तो उसे अधिक मास कहते हैं। जैसे सम्बत् १९९९ में वैशाख कृष्ण १३ (ता० १३ अप्रैल) को मेष संक्रांति हुई। ज्येष्ठ कृष्ण १४ को (ता० १४ मई) वृष की संक्रांति हुई। इसके उपरान्त फिर (ता० १४ जून) शुद्ध ज्येष्ठ शुक्ल प्रतिपदा को मिथुन राशि पर सूर्य गया अर्थात् मिथुन की संक्रांति हुई। वृषार्क शुद्ध ज्येष्ठ कृष्ण पक्ष की १४ तिथि को था, उसके बाद अधिक ज्येष्ठ शुक्ल पक्ष और फिर अधिक ज्येष्ठ कृष्ण पक्ष बीत गया, परन्तु इन दोनों के बीच संक्रांति नहीं हुई। इस कारण ये दोनों पक्ष अधिक मास माने गये। इसके पहिले का ज्येष्ठ कृष्ण शुद्ध माना गया और फिर उसके बाद जो अधिक २ पक्ष बड़े उनमें से १ का नाम अधिक ज्येष्ठ शुक्ल पक्ष पड़ा और उसके आगे फिर अधिक ज्येष्ठ कृष्ण पक्ष माना गया। ये दोनों अधिक पक्ष व्यतीत हो जाने पर शुद्ध ज्येष्ठ शुक्ल प्रतिपदा को मिथुन की संक्रांति हुई। इससे वह शुद्ध ज्येष्ठ मास माना गया।
३२ मास १६ दिन ४ घड़ी बीतने पर अधिक मास होता है। अर्थात् तीसरे वर्ष अधिक मास होता है और उस वर्ष में १३ मास हो जाते हैं।
अधिक मास को मल्ल मास या पुष्पोत्सव मास कहते हैं। चन्द्र मास के गणित से वर्ष में ३५४ दिन ९ घंटे और सूर्य मास के वर्ष में ३६५ दिन ६ घंटे प्रायः होते हैं। इस कारण सूर्य और चन्द्र के दिनों का अन्तर अधिक मास होने से बराबर हो जाता है।
क्षय मास
जिस चान्द्र मास के २ पक्ष में २ संक्रांति होती है उसे क्षयमास कहते हैं। क्षय मास केवल कार्तिक आदि ३ महीनों में पड़ता है और महीनों में नहीं पड़ता। जिस वर्ष क्षय मास होता है उस वर्ष एक वर्ष के भीतर २ अधिक मास होते हैं।
यह कई वर्षों में पड़ता है। यदि भाद्रपद अधिकमास होगा तो सूर्य की गति अधिक होने से मार्ग शीर्ष में २ संक्रांति वाला क्षयमास होगा और सूर्य की गति अल्प हो जाने के कारण चैत्र मास भी अधिक होगा।
जिस सम्बत् में क्षयमास होता है उसके १४१ या १९ वर्ष उपरान्त पुनः क्षयमास होना सम्भव होता है अर्थात् कभी १४१ वर्ष में कभी १९ वर्ष में संभव होता है।
जैसे सम्बत् १७४ में क्षयमास होकर पुनः आगे सम्बत् (१७४ + १४१) = १११५ में और (१११५ + १४१) = १२५६ सम्बत् में क्षय मास होगा, इसी प्रकार आगे और भी जानें। शविष्य में सम्बत् २०२० में क्षय मास होगा।