भारतकोश
सचित्र ज्योतिष शिक्षा भाग २

सचित्र ज्योतिष शिक्षा भाग २

Sachitra Jyotisha Shiksha Vol 2

बाबूलाल ठाकुर द्वारा

स्रोत: Motilal Banarsidass Edition · Motilal Banarsidass, Delhi (उद्गम)

DevanagariHindipublished454 पृष्ठ

पृष्ठ 101, कुल 454 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 101

अष्टकवर्ग विचार : ९३

बिन्दु दारा गोचर फल का विचार होता है । (४) अष्टक वर्ग के त्रिकोण शोधन एवं ऐकाधिकत्व शोधन के पश्चात्‌ फल विचारने की विधि है । अष्टक वर्ग विचार

जन्म राशि के अनुसार गोचर का फल आगे बताया गया है। गोचर फल माँ स्थूलता है क्योंकि एक ही राशि के अनेकों मनुष्य होते हैं। इसलिए गोचर फल मे सूक्ष्मता लाने के लिए आचार्यो ने अष्टक वर्ग अंक कहा है । गोचर में चन्द्र राशि को प्रधान मानकर शुभ स्थान की गणना कर प्रत्येक ग्रह का शुभाशुभ जाना जाता है परन्तु अष्टक वर्ग में प्रत्येक ग्रह की राशि को प्रधान मान कर उससे शुभ स्थान की गणना की जाती है इसमें ७ ग्रह और लग्न सहित ८ हो जाते हैं यहाँ ८ प्रकार से शुभत्व की गणना की जाती है इस कारण अष्टक वर्गे द्वारा फल विचारने में सूक्ष्मता आ जाती है । इसके लिए प्रत्येक ग्रह का पृथक्‌ २ चक्र बनाना पड़ता है इस प्रकार ८ अष्टक वर्ग बन जाते हैं । इसमें शुभता सूचक रेखा और अशुभता सूचक ० शून्य वना दिया जाता है। कोई दो शुभ के लिए ० शून्य और अशुभ स्थान के लिए । रेखा का चिल्ल वना देते हैं । चिह्ल किसी प्रकार का हो वह तो अपनी इच्छानुसार बनाया जा सकता है जिससे शुभ या अशुभ स्थान प्रगट हो । पश्चात्‌ प्रत्येक चक्र में शुभ रेखा का योग किया जाता है ।

चक्र बनाने के लिए १२ राशियों को ऊपर लिख लो। जिस राशि पर लग्न हो वहाँ लग्न रिख दो जहाँ जो २ ग्रह हो सव ग्रह लिख देना । उसके नीचे ८ लकीर देना _ जिनके बाँई भोर ग्रहों के नाम लिखे हों और ग्रह से शुभ स्थान गिनते जाना यहाँ शुभ हो वहाँ रेखा जहां अशुभ हो शून्य लिख दो । पश्चात्‌ सव शुभ रेखाओं का योग

करो । इसके पश्चात्‌ प्रत्येक चक्र की शुभ रेखाओं का एक ओर चक्र बना लो ।

इसको सब अष्टक वर्ग चक्र कहेंगे उसमें भी सब शुभ रेखाओं का योग कर दो जिससे स्पष्ट हो जावे किस राशि ने सम्पूर्ण कितनीं शुभ रेखा पाई है ।

पहिले प्रत्येक ग्रहों का अष्टक वर्ग शुभ चक्र देते हैं पश्चात्‌ प्रत्येक का चक्र बनाना वतावेंगे ।

प्रत्येक ग्रहों का शुभ अष्टक वर्ग चक्र

(१) सूर्य का अष्टक वग (२) चन्द्र का अष्टक वग सूर्य चन्द्र मं० वु० गु० शु० श० लर्न | सूर्य चं० मं० बु० गु० शु० श० लग्न

१.३ १: ३-५. ६६ १ ये ३ १ रत वक ३ ३६३ २६२५६७२४1६३२३ ३०४७४५६ ४ ४ ६ ९ १२४ ६ | ७ ६ ५ ४ ७ ५ ६१० ७१० ७ ९ ११ ७ १० ८ ७ ६ ७ १ ७ ११ ११ द ११ ८ १० ८ ११ | १०१० ९ ८5११ ९

९ ९ ९१२ | ११ ११ ११ १० १२ ११ १० १० ११ १० ११ ११ १२ ११ ११ ११ १९