भारतकोश
सचित्र ज्योतिष शिक्षा भाग २

सचित्र ज्योतिष शिक्षा भाग २

Sachitra Jyotisha Shiksha Vol 2

बाबूलाल ठाकुर द्वारा

स्रोत: Motilal Banarsidass Edition · Motilal Banarsidass, Delhi (उद्गम)

DevanagariHindipublished454 पृष्ठ

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९८ : सचित्र ज्योतिष शिक्षा, तृतीय फलित खण्ड

(८) लग्न का अष्टक वर्ग चक्र

राशि ३ ४ ५ ६ ७ ८ ९ १० ११ १२१ २

अह लर्‌ ० श० ० ० मं० के० गु० चं० सू० ० ०

रा० बु० शु०

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७ रे

प्रत्येक ग्रह का अष्टक वर्ग चक्र बनाने में कई लोग कुण्डली बनाकर उसमे रेखा भर देते हैं यह ठीक नहीं है उसमें कभी भूल हो जाती है । उपरोक्त प्रकार से चक्र चना कर उसमें शुभ रेखा एवं अशुभ का शून्य भी लिख दिया जावे तो भूल नहीं हो सकती और उसकी जाँच में सुविधा होती है ।

यहाँ उदाहरण में शुभ के स्थान में रेखा ओर अशुभ के स्थान में बिन्दु दिया है कई ग्रंथकार विन्दु को शुभ सूचक मानकर रेखा को अशुभ का चिल्ल मानते हैं । परन्तु रेखा को शुभत्व का चिह्न मान लेना उचित जेंचता है । ;

कोई ग्रन्थकार रेखा के स्थान में रेखा न बनाकर उसी ग्रह का सूचक संकेत अक्षर बना देते हैं जैसे रवि के लिए र० चंद्र के लिए चं इत्यादि इसको यहाँ उदाहरण देकर बताया है :--

सूर्ये का अष्टक वर्ग चक्र अन्य प्रकार

राशि ३ ४ ५ ६ ७ ८ ९ १० ११ १२१ २

ग्रह्‌ लग्न ० श० ० ० मृ» के० गु० चं० सु० ० ०

रा० बु० शु०

१ शनि श० ० श० श० ७ श० ० ० श० श० श० ए०

२ गुरु गु० ० ० गु० ० गुण 09 oo o ° ० गु०

३ मंगल मं० सं० मं० मं) ० -मं० मं० ० मं० ० ० मं०

४ सुय सू ० ० सू० सु० सु० सु० सू० ० सू० सु० ०

५ शुक्र ० २ शु० शु० ० ० ० ० शु० ० ० ०

६ बुध बु० बु० ० ० बु० बु० बु० बु० ० ० बु० ०

७ चन्द्र ० च० ० ० ० चूं०चूं० ० ० ७० 'चं० ०

झू ० ० ल० रलू० ० लढ ० ० ० ० छ० ल०

शुभयोग५ ३ ४ ६ २ ७ ४ २३ ३५ ४

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