भारतकोश
सचित्र ज्योतिष शिक्षा भाग २

सचित्र ज्योतिष शिक्षा भाग २

Sachitra Jyotisha Shiksha Vol 2

बाबूलाल ठाकुर द्वारा

स्रोत: Motilal Banarsidass Edition · Motilal Banarsidass, Delhi (उद्गम)

DevanagariHindipublished454 पृष्ठ

पृष्ठ 11, कुल 454 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 11

'* >...

ग्रहो की दृष्टि का फल : ३

वुध की-धातु क्रिया, काव्य कला और कथाओं का जानने वाला, श्रेष्ठ वाकय, श्रेष्ठ मंत्र आदि की विधि में चतुर, सत्पुरुषों की सम्मति सहित ।

गुरु की-राजा का मन्त्री, अपने कुल में राजा, कला की विधि जानने वाला, धन￾धान्य सहित, विद्वान्‌ ।

शुक्र की-सुगन्ध माला, सुगन्ध वस्त्र धारण करने वाला, सुन्दर स्त्री और आभूषणों

का सौख्य भोगता है ।

शनि की--पराये अन्न का भोगी, नीच पुरुषों में प्रवृत्ति, चौपायों से प्राति।

(७) शनि स्थानी ( १०-११ राशि के ) सूर्य पर दृष्टि

चन्द्र की दृष्टिस्त्री के संग से धन और सौख्य का नाश, माया में चतुर, चंचल

चित्त ।

मंगल की--शत्रु से झगड़ा कर धन नाग करने वाला, व्याधि, वैर से सन्तापित,

अत्यन्त व्याकुल देह वहुत चिन्ता ।

बुध की--हिजड़ों ऐसा स्वभाव, पराये चित्त को हरण करने वाला, साधुओं से

रहित, शूरवीर ।

गुरु की--श्रेष्ठ कमं कता, वृद्धिमान्‌, वहुत पुरुषों का पालने वाला ।

शुक्र की--शंख, मूँगा, निर्मेल रता, धन, सुन्दर, स्त्रियों से धन की प्राप्ति ।

शनि की--बड़े प्रताप से शत्रुओं को जीतने वाला, राजा की प्रीति से प्रसन्नता,

प्रसन्न मूर्ति । (८) सूर्यं को शुभ ग्रह देखे--राजा को सेवा से धन प्राप्त ।

सूर्य को शत्रु ग्रह देखे झगड़ा, दुःख, पेट और आँबों में रोग ।

सूर्य को मित्र ग्रह देखे--जय तथा वांधवों से लाभ ।

सूर्य को पाप ग्रह देखे--रोगी हो ।

(९) पंचम भाव में सूर्य हो और भिन्न-भिन्न ग्रहों से दुष्ट हो तो फल

पाप दुष्ट हो--बुद्धि स्थिर हो, अल्प सन्तान हो ।

पाप ग्रहों की दृष्टि हो-मृत सन्तान हो ।

शनि की दृष्टि हो-लोह अग्नि से उत्पन्न पीड़ा ओर सन्तान से उत्पन्न पीड़ा हो ।

मंगल की दृष्टि हो-शर्भ च्युत हो या पुत्र नाश हो ।

बुध की दृष्टि हो--२ पुत्र ५ कन्या हों ।

राहु की दृष्टि हो--गर्भपात हो या कस्या का मरण हो या निःसन्तान हो ।

केतु की दृष्टि हो-गर्भपात हो या काकवंध्या हो । ( जा० सं० )

२--चंद्र पर भिन्न-भिन्न ग्रहों को दुष्टि का फल

( १ ) मेष के चन्द्र पर दृष्ट

सूर्यं की--उग्र स्वभाव, नम्र जनों से नम्र, धैर्यवान्‌, राजा से गौरव, संग्राम में

डरपोक (जा० भ०)। गरीब (निर्धन) हो (फल दी०) (वृ० जा०) ( जा०पारि०) ।

सचित्र ज्योतिष शिक्षा भाग २ · पृष्ठ 11, कुल 454 में से · BharatKosha