सचित्र ज्योतिष शिक्षा भाग २
Sachitra Jyotisha Shiksha Vol 2
बाबूलाल ठाकुर द्वारा
स्रोत: Motilal Banarsidass Edition · Motilal Banarsidass, Delhi (उद्गम)
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ग्रहो की दृष्टि का फल : ३
वुध की-धातु क्रिया, काव्य कला और कथाओं का जानने वाला, श्रेष्ठ वाकय, श्रेष्ठ मंत्र आदि की विधि में चतुर, सत्पुरुषों की सम्मति सहित ।
गुरु की-राजा का मन्त्री, अपने कुल में राजा, कला की विधि जानने वाला, धनधान्य सहित, विद्वान् ।
शुक्र की-सुगन्ध माला, सुगन्ध वस्त्र धारण करने वाला, सुन्दर स्त्री और आभूषणों
का सौख्य भोगता है ।
शनि की--पराये अन्न का भोगी, नीच पुरुषों में प्रवृत्ति, चौपायों से प्राति।
(७) शनि स्थानी ( १०-११ राशि के ) सूर्य पर दृष्टि
चन्द्र की दृष्टिस्त्री के संग से धन और सौख्य का नाश, माया में चतुर, चंचल
चित्त ।
मंगल की--शत्रु से झगड़ा कर धन नाग करने वाला, व्याधि, वैर से सन्तापित,
अत्यन्त व्याकुल देह वहुत चिन्ता ।
बुध की--हिजड़ों ऐसा स्वभाव, पराये चित्त को हरण करने वाला, साधुओं से
रहित, शूरवीर ।
गुरु की--श्रेष्ठ कमं कता, वृद्धिमान्, वहुत पुरुषों का पालने वाला ।
शुक्र की--शंख, मूँगा, निर्मेल रता, धन, सुन्दर, स्त्रियों से धन की प्राप्ति ।
शनि की--बड़े प्रताप से शत्रुओं को जीतने वाला, राजा की प्रीति से प्रसन्नता,
प्रसन्न मूर्ति । (८) सूर्यं को शुभ ग्रह देखे--राजा को सेवा से धन प्राप्त ।
सूर्य को शत्रु ग्रह देखे झगड़ा, दुःख, पेट और आँबों में रोग ।
सूर्य को मित्र ग्रह देखे--जय तथा वांधवों से लाभ ।
सूर्य को पाप ग्रह देखे--रोगी हो ।
(९) पंचम भाव में सूर्य हो और भिन्न-भिन्न ग्रहों से दुष्ट हो तो फल
पाप दुष्ट हो--बुद्धि स्थिर हो, अल्प सन्तान हो ।
पाप ग्रहों की दृष्टि हो-मृत सन्तान हो ।
शनि की दृष्टि हो-लोह अग्नि से उत्पन्न पीड़ा ओर सन्तान से उत्पन्न पीड़ा हो ।
मंगल की दृष्टि हो-शर्भ च्युत हो या पुत्र नाश हो ।
बुध की दृष्टि हो--२ पुत्र ५ कन्या हों ।
राहु की दृष्टि हो--गर्भपात हो या कस्या का मरण हो या निःसन्तान हो ।
केतु की दृष्टि हो-गर्भपात हो या काकवंध्या हो । ( जा० सं० )
२--चंद्र पर भिन्न-भिन्न ग्रहों को दुष्टि का फल
( १ ) मेष के चन्द्र पर दृष्ट
सूर्यं की--उग्र स्वभाव, नम्र जनों से नम्र, धैर्यवान्, राजा से गौरव, संग्राम में
डरपोक (जा० भ०)। गरीब (निर्धन) हो (फल दी०) (वृ० जा०) ( जा०पारि०) ।