सचित्र ज्योतिष शिक्षा भाग २
Sachitra Jyotisha Shiksha Vol 2
बाबूलाल ठाकुर द्वारा
स्रोत: Motilal Banarsidass Edition · Motilal Banarsidass, Delhi (उद्गम)
पृष्ठ 10, कुल 454 में से
संदर्भ में पढ़ें२ : सचित्र ज्योतिष शिक्षा, तृतीय फलित खण्ड
बुध की--राजा की कृपा, पुत्रों से ऐश्वर्य, उसके मित्र और शत्रु सदा सन्ताप को
प्राप्त हों । i
गुरु की--छिपे हुए मन्त्र वाला, अत्यन्त स्वत त्र, स्त्री पुत्रोदि के गवं सहित ।
शुक्र की -परदेशवासी, चपल, विलासी, देह अग्नि या शस्त्र से अंकित हो, राजा
का दूत हो ।
शनि की-धूतं, बहुत नोकरों वाला बुद्धिहीन, उद्विग्न चित्त ।
(४) ककं के रवि पर दृष्टि
चन्द्र की--जल सम्बन्धी व्यापार करके वड़ा धनवान, राजा का राजमंत्री, वड़ा
उग्र ।
मंगल की-अपने वन्धुओं से चित्त को दूर करने वाळा, सूजन का रोग व भगन्दर
से पीडित ।
बुध की-विद्या यश तथा मान से विराजित, राजा की कूपा से मन की अभिलाषा
को प्राप्त, शत्रु रहित
गुरु की-अपने कुल में श्रेष्ठ, निर्मल यश, राजा से बड़ा पद प्राप्त ।
शुक्र की=स्त्री के आश्रय से वस्त्र और धन प्राप्त, पराये काम में हृदय से विषाद
पैदा करता है।
शनि की-कफ ओर वात से दुःखी और पराये कार्य में विघ्न डालने वाळा, चपल
स्वभाव, कलेशी ।
(५) स्वस्थानी सूर्यं पर दृष्टि
चन्द्र की-धूतं और गम्भीर, राजा से मान प्राप्त, धन की प्राप्ति से धनवान,
प्रसिद्ध ।
मंगल की-अनेक स्त्रियों से प्रीति करने वाला, अत्यन्त धूते, कफ प्रकृति, वड़ा शूर
चीर, उदासी।
बुध की-धूतं, राजा की आज्ञा में चलने वाला, पंडितों से प्रीति, लेख कंरने में
तत्पर ।
गुरु को-देव स्थान और तालाव वावड़ी का बनाने वाला, स्वजनों से प्रीति ।
शुक्र की--त्वचा फे दोष वाला, क्रोधी, अपयश का भागी, उत्सव रहित, स्वजनों का त्यागा हुआ, सत्य और दया रहित ।
शनि की-शठ, काम को बिगाड़ने वाला, स्वजनों से सन्ताप को प्राप्त ।
(६) गुरु स्थानी (६-१२ राशि के ) सूर्य पर दृष्टि
चन्द्र की दृष्टि-शोभायमान देह, पुत्र सौख्य युक्त, वाणी के विलास में कुशल, कुलवान् ।
मंगल की-संग्राम में विशेष यश, वक्ता, स्वजनों के संग से रहित, स्थिर आजी- विका करने वाला, प्रचंड ।
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