भारतकोश
सचित्र ज्योतिष शिक्षा भाग २

सचित्र ज्योतिष शिक्षा भाग २

Sachitra Jyotisha Shiksha Vol 2

बाबूलाल ठाकुर द्वारा

स्रोत: Motilal Banarsidass Edition · Motilal Banarsidass, Delhi (उद्गम)

DevanagariHindipublished454 पृष्ठ

पृष्ठ 9, कुल 454 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 9

ड्र

अध्याय १

ग्रहों की दृष्टि का फल

( १) सूर्य पर भिन्त-भिन्त ग्रहों की दृष्टि का फल

(१) भौम स्थानी ( १-८ राशि के ) सूर्य पर दृष्टि

चन्द्र की दृष्टि--दान धर्म युक्त, बहुत नौकरों वाला, कोमल, निर्मेछ देह, अपना

घर उसको वडा प्यारा

मंगल की--कऋर, संग्राम में धीर, आंखे पैर लाळवणं, पूर्ण वलवान्‌ ।

बुध की-- सुख और पराक्रम तथा धन से हीन, दूतों का काम करने वाला

परदेशवासी, सदा मलिन, शत्रु युक्त ।

गुरु की-राजा का मंत्री, दानी, दयावान्‌, बहुत धन वाला, अपने कुटुम्व में श्रेष्ठ ।

शुक्र की-हीन वर्ण की स्त्री का प्रेमी, अत्यन्त दीन, धनहीन, दुष्ट मित्रों वाला,

त्वचा में विकार ।

शनि की-उत्साह रहित, मलिन, अत्यन्त दीन, दुःख सहित, बुद्धि हीन ।

(२) शुक्र स्थानी (२-७ राशि के ) रवि पर दृष्टि

चन्द्र की दृष्टि-श्रेष्ठ स्त्रियों का प्रेमी, बहुत स्त्रियों वाला, जळ सम्बन्धी पदार्थ के

व्यापार से जीविका करने वाला ।

मंगल की-संग्राम में धीरज, अत्यन्त तेज, श्रेष्ठ, साहस से धन प्राप्त, यशवान्‌ ।

बुध की-संगीत विद्या और सत्काव्य की कलाओं का प्रेमी, लेखन कला में कुशल,

प्रसन्त चित्त ।

गुरु की-अपने वंश के समान, राजा का प्रधान मंत्री, श्रोष्ठ रत्न आभूषण तथा

धन सहित, डरपोक ।

शुक्र की-सुन्दर नेत्र, शो मायमान देह व प्रधान होता है, शत्रु-मित्र सहित, चिता

युक्त ।

शनि की-दीन, धनहीन, आळसी, स्त्रियों के साथ भिन्त मन वाला, दुष्ट आजी-

विका करने वाला रोग युक्त ।

(३) वुध स्थानी ३-६ राशि के ) सूर्य पर दृष्टि

चन्द्र की दृष्टि-मित्र और शत्रुओं से परिपीडित, परदेश जाने वाला, धनहीन,

सदा उदास !

मंगल की-शत्रुओं से भयभीत, कलह आदि से युक्त, अत्यन्त दीन, संग्राम में हारने

वाला, अत्यन्त लज्जालु, आलसी ।