सचित्र ज्योतिष शिक्षा भाग २
Sachitra Jyotisha Shiksha Vol 2
बाबूलाल ठाकुर द्वारा
स्रोत: Motilal Banarsidass Edition · Motilal Banarsidass, Delhi (उद्गम)
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अध्याय १
ग्रहों की दृष्टि का फल
( १) सूर्य पर भिन्त-भिन्त ग्रहों की दृष्टि का फल
(१) भौम स्थानी ( १-८ राशि के ) सूर्य पर दृष्टि
चन्द्र की दृष्टि--दान धर्म युक्त, बहुत नौकरों वाला, कोमल, निर्मेछ देह, अपना
घर उसको वडा प्यारा
मंगल की--कऋर, संग्राम में धीर, आंखे पैर लाळवणं, पूर्ण वलवान् ।
बुध की-- सुख और पराक्रम तथा धन से हीन, दूतों का काम करने वाला
परदेशवासी, सदा मलिन, शत्रु युक्त ।
गुरु की-राजा का मंत्री, दानी, दयावान्, बहुत धन वाला, अपने कुटुम्व में श्रेष्ठ ।
शुक्र की-हीन वर्ण की स्त्री का प्रेमी, अत्यन्त दीन, धनहीन, दुष्ट मित्रों वाला,
त्वचा में विकार ।
शनि की-उत्साह रहित, मलिन, अत्यन्त दीन, दुःख सहित, बुद्धि हीन ।
(२) शुक्र स्थानी (२-७ राशि के ) रवि पर दृष्टि
चन्द्र की दृष्टि-श्रेष्ठ स्त्रियों का प्रेमी, बहुत स्त्रियों वाला, जळ सम्बन्धी पदार्थ के
व्यापार से जीविका करने वाला ।
मंगल की-संग्राम में धीरज, अत्यन्त तेज, श्रेष्ठ, साहस से धन प्राप्त, यशवान् ।
बुध की-संगीत विद्या और सत्काव्य की कलाओं का प्रेमी, लेखन कला में कुशल,
प्रसन्त चित्त ।
गुरु की-अपने वंश के समान, राजा का प्रधान मंत्री, श्रोष्ठ रत्न आभूषण तथा
धन सहित, डरपोक ।
शुक्र की-सुन्दर नेत्र, शो मायमान देह व प्रधान होता है, शत्रु-मित्र सहित, चिता
युक्त ।
शनि की-दीन, धनहीन, आळसी, स्त्रियों के साथ भिन्त मन वाला, दुष्ट आजी-
विका करने वाला रोग युक्त ।
(३) वुध स्थानी ३-६ राशि के ) सूर्य पर दृष्टि
चन्द्र की दृष्टि-मित्र और शत्रुओं से परिपीडित, परदेश जाने वाला, धनहीन,
सदा उदास !
मंगल की-शत्रुओं से भयभीत, कलह आदि से युक्त, अत्यन्त दीन, संग्राम में हारने
वाला, अत्यन्त लज्जालु, आलसी ।