सचित्र ज्योतिष शिक्षा भाग २
Sachitra Jyotisha Shiksha Vol 2
बाबूलाल ठाकुर द्वारा
स्रोत: Motilal Banarsidass Edition · Motilal Banarsidass, Delhi (उद्गम)
पृष्ठ 140, कुल 454 में से
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दीर्घायु या राजा हो
१३२ : सचित्र ज्योतिष शिक्षा, तृतीय फलित खण्ड
पिता का अरिष्ट काल
( १ ) उक्त त्रिकोण में जब शनि जायगा उस समय यदि सूर्य से चतुर्थ स्थान में * राहु या वही शनि या मंगल आ जाय तो पिता की मृत्यु हो यदि उसपर गुरु शुक्र की दृष्टि न हो ।
(२) लग्न या चंद्र से नवम स्थान में शनि हो और पाप ग्रह से युक्त या दुष्ट हो तो पिता का निधन हो ।
( ३ ) लग्न से चतुथं भावेश अनिष्ट दशा में हो तो भी पिता का मरण होता है अनुकूल दशा में मरण नहीं होता ।
( ४ ) लग्न से चतुर्थ भाव के स्वामी का जो नवांश हो उसकी दशा में पिता आदि का मरण हो ।
पितु सुख योग-छग्न स्थान से चतुर्थेश की दशा में अधिक सुख लाभ की संभावना रहती है ।
पिता का आज्ञाकारो-सुखेश लग्न या एकादश भाव में होया चंद्र से ११ भाक में हो या दशरव भाव मे हो तो जातक पिता का आज्ञाकारी होता है। पिता के धन का सदुपयोग--पिता के जन्म लग्न या जन्म राशि से तृतीय लग्न या राशि में जन्म हो तो जातक पिता के धन का सदुपयोग करता हैया पिता के धन के आश्रय में रहे ।
पिता तुल्य गुण--पिता की जन्म राशि या लग्न से दसवीं राशि या लग्न में जन्म हो तो जातक पिता के तुल्य गुणवान् होता है ।
पिता से श्रेष्ठ--यदि अपने जन्म लग्न से दशम स्थान का स्वामी लग्न में होतो पिता से श्रेष्ठ होगा ।
शुभ कार्य विचार--सुर्य अष्टकवगं में जिस राशि में अधिक अशुभ बिन्दु हों अर्थात् शुभ रेखा न हो या अल्प रेखा हों उस राशि के मास में ( जब सूर्य उस राशि में जाय ) और उस राशि के सम्वत्सर में ( जब उस राशि में गुरु रहे ) तब विवाह आदि शुभ कार्य नहीं करना ।
जिस राशि में अधिक रेखा हों उस राशि में जबः सूर्य हो या उसमें गुरु रहे तो शुभ कार्य करना । .
पितृहा योग--पिता के जन्म लग्न से अष्टम राशि लग्न में जन्म होया पिता के जन्म लग्न से अष्टमेश अपने जन्म लग्न में हो तो जातक पिता की मृत्यु के बाद उस घर के सव कार्य भार को सम्हाल लेता है। रोगी हो-सूर्य शत्रु राशि या नीच नवांश में होकर लग्न में हो और ३-४ रेखा हों तो जातक रोगी हो ।
दीर्घायु या राजा-सूर्य उच्च स्वगृही आदि का लग्न में हो ५ आदि रेखा हों तो