सचित्र ज्योतिष शिक्षा भाग २
Sachitra Jyotisha Shiksha Vol 2
बाबूलाल ठाकुर द्वारा
स्रोत: Motilal Banarsidass Edition · Motilal Banarsidass, Delhi (उद्गम)
पृष्ठ 180, कुल 454 में से
संदर्भ में पढ़ें१७२ : सचित्र ज्योतिष शिक्षा, तृतीय फलित खण्ड
कहलाता है यह २॥ वर्ष शुभामुम. फळ करता है । शनि किसी को प्रारम्भ में, किसी
को मध्य में, किसी को अन्त में अनिष्ट करता है ।
गोचर में शनि का वार्षिक ( एक वर्ष का ) फल
शनि गुरु और राहु तीनों शीघ्रगामी नहीं है इन तीनों के फल का गोचर से
बहुत प्रभाव पड़ता है !
गोचर के अनुसार सूर्य मंगल और शुक्र से म्गस का फल कहा जाता है तव इन
बातों पर ध्यान देने की आवश्यकता है:
१-जब राशि का गोचर फल बुरा होता है तब अन्य शुभ फलों की हानि हो जाती
है अर्थात् जब गोचर का शनि अशुभ होता है तब उस वर्ष में प्रायः सभी ग्रह अशुभ
फल देते हैं ।
२-जिस वर्ष शनि अशुभ फलदायक होता है और गुरु का फल यदि शुभ हो तो
भी उस वर्ष में विशेष अशुभ ही होता है ।
-जिस वर्ष में शनि उत्तम फल दाता हो और गुरु का अशुभ फल हो तो उस
चर्ष य। उस समय में प्रायः शुभ ही फल होता है ।
४-जिस वर्ष या समय में शनि शुभ फलदाता हो परन्तु गुरु और राहु दोनों अशुभ
फल देवें तो उस वर्ष या समय में शुभ ही फल विशेष होता है ।
५-जिस वर्ष यो समय में शनि शुभ फल दायक हो ओर गुरु राहु भी शुभ फल
दायक हों तो सब प्रकार से शुभ होता है ।
६-यदि वर्ष का फल उत्तम हो फौर मास का फल खराब हो तो उस वर्ष में
उत्तम ही फल होगा ।
७-यदि वर्ष का फल खराव हो और मास का फल उत्तम हो तो उस मास में
उत्तम फल नहीं के बराबर होगा ।
८-यदि वर्ष का फल उत्तम हो और मास का भी फल उत्तम हो तो उस मांस में
समस्त शुभ फल होंगे ।
इसी प्रकार गोचर में वर्ष और मास का फल विचारना ।
लग्न या रवि को साढ़ेसाती
मनुष्य को शनि की साढ़ेसाती न होते हुए भी अनेक प्रकार के दुःख भोगने को
अवसर आ जाता है जिसका कारण लग्न रवि की साढ़ेसाती है ।
जिस प्रकार जन्म राशि के चन्द्र पर से व्यय स्थान जन्म स्थान और धन स्थान
में शनि के जाने से साढ़ेसाती होती है उसी प्रकार लग्न और सूर्य की राशि से भी
विचार होता है ।
१-लग्न को साढ़ेसाती-जन्म लग्न के व्यय स्थान में जव शनि आवे तो शि
की साढ़ेसाती सदृश यह भी साढ़ेसाती मानी जाती है लग्न स्थान और धन स्थान में
अब तक शनि रहेगा तब तक लग्न की साढेसाती रहेगी ।